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Tuesday, 13 January 2026

बिहार की सियासत में 'दही-चूड़ा' की मिठास या नए गठबंधन की कड़वाहट? खरमास बाद बड़े बदलाव के संकेत

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चेहरा पुराना, तेवर नए: क्या समृद्धि यात्रा से नीतीश फिर से 'बड़े भाई' की भूमिका में लौटेंगे?"

बिहार की राजनीति में 16 जनवरी से बड़े बदलाव के संकेत! जानें नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा, PK और RCP सिंह की वापसी और भाजपा-जदयू के बीच जारी खींचतान का पूरा विश्लेषण।

Tarun Kumar Kanchan

 In Bihar politics, "Kharmas" (a month considered inauspicious for auspicious activities) isn't just confined to the calendar, it also symbolizes a political silence. But this silence is about to be broken with Makar Sankranti on January 14th.


 मौसम बदला, अब मिजाज बदलेगा

बिहार की राजनीति में 'खरमास' (एक ऐसा महीना जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है) सिर्फ पंचांग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह राजनीतिक सन्नाटे का भी प्रतीक होता है। लेकिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ ही यह सन्नाटा टूटने वाला है। 16 जनवरी से बिहार की राजनीति में जो हलचल शुरू होने वाली है, उसके केंद्र में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। चर्चाएं आम हैं कि क्या नीतीश कुमार फिर से पाला बदलने की तैयारी में हैं? क्या भाजपा के साथ उनका 'हनीमून पीरियड' खत्म हो गया है? और क्या प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह जैसे पुराने रणनीतिकार फिर से नीतीश के 'थिंक टैंक' का हिस्सा बनने जा रहे हैं? तो ऐसा कह सकते हैं-
"हवाओं ने फिर अपना रुख बदला है, सियासत के आंगन में नया मंजर ढला है, यहाँ मकर संक्रांति पर सिर्फ तिलकुट नहीं कुटता, यहाँ तो कुर्सियों के लिए नया गठबंधन पला है।"
 

 समृद्धि यात्रा : जनमत टटोलने की कवायद या शक्ति प्रदर्शन?

नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'यात्राएँ' रही हैं। जब भी वे किसी बड़े राजनीतिक संकट में होते हैं या किसी बड़े फैसले की दहलीज पर खड़े होते हैं, वे जनता के बीच निकल जाते हैं। 16 जनवरी से शुरू हो रही *'समृद्धि यात्रा'* इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।
 चंपारण से शुरुआत: ऐतिहासिक रूप से चंपारण गांधी जी की कर्मभूमि रही है और नीतीश कुमार के लिए भी यह हमेशा से लकी रहा है। यहाँ से यात्रा शुरू करने का सीधा संदेश है कि वे अपनी 'सेकुलर' और 'विकास पुरुष' वाली छवि को फिर से धार देना चाहते हैं।
मूल्यांकन का दौर: राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस यात्रा के जरिए नीतीश कुमार दो मुख्य बातों का परीक्षण (Testing) करना चाहते हैं। पहला, क्या आज भी बिहार की जनता के बीच उनका 'क्रेज' बरकरार है? दूसरा, भाजपा के साथ गठबंधन के बाद जनता की उनके प्रति क्या सोच है? क्या जनता भाजपा के बढ़ते प्रभाव को पसंद कर रही है या फिर वे अब भी नीतीश को ही अपना निर्विवाद नेता मानते हैं?

 
भाजपा का दबाव और 'मंत्रिमंडल'
की खींचतान

ऐसा लग रहा है कि भाजपा और जदयू के बीच पिछले कुछ हफ्तों से सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश कुमार पर मंत्रिमंडल विस्तार के लिए जबरदस्त दबाव बनाया है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने अपने कोटे से मंत्रियों के नाम तय करके नीतीश कुमार को सौंप दिए हैं। लेकिन, नीतीश कुमार इस विस्तार को टालते आ रहे हैं।
बिहार के सियासत को जाननेवाले बरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार सिंह कहते हैं कि यह देरी महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। नीतीश कुमार जानते हैं कि अगर उन्होंने भाजपा की शर्तों पर मंत्रिमंडल विस्तार किया, तो सरकार में उनकी पकड़ ढीली हो सकती है। समृद्धि यात्रा पर निकलकर उन्होंने भाजपा को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता सरकार का विस्तार नहीं, बल्कि जनता का मूड समझना है।
 

प्रशांत किशोर (PK) की 'घर वापसी' की पटकथा

बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा 'प्रशांत किशोर' (PK) की भूमिका को लेकर है। जनसुराज के माध्यम से बिहार के गांवों की खाक छान रहे PK को लेकर खबर है कि वे फिर से नीतीश कुमार के लिए 'बड़ी भूमिका' निभा सकते हैं।
"कहते हैं कि पुरानी डायरी के पन्ने चाहे कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं, रणनीतिकार उन्हें फिर से पढ़ना नहीं भूलते। पीके और नीतीश का रिश्ता भी उस उलझी हुई रील की तरह है, जिसे सुलझाने की कोशिश में हर बार एक नई फिल्म बन जाती है।"
 
पीके की रणनीति : कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को यह डेटा और फीडबैक दिया है कि अगले चुनाव में महागठबंधन (राजद और कांग्रेस) का असर खत्म होने वाला है। पीके का मानना है कि बिहार की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है।
गठबंधन का भविष्य: यदि पीके और नीतीश फिर से एक साथ आते हैं, तो यह बिहार में एक 'तीसरे मोर्चे' या जदयू को नए सिरे से विशाल बनाने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इसे कुछ लोग भाजपा के खिलाफ एक बड़ा 'षड्यंत्र' भी मान रहे हैं, ताकि नीतीश को भाजपा के प्रभाव से मुक्त किया जा सके।
 

आरसीपी सिंह: "रिश्ते कभी टूटे ही नहीं थे"

 इस पूरी कहानी में सबसे चौंकाने वाला मोड़ आरसीपी सिंह का बयान है। एक समय में नीतीश कुमार के 'हनुमान' कहे जाने वाले आरसीपी सिंह, जिन्होंने भाजपा के करीब जाने के चक्कर में जदयू से नाता तोड़ लिया था, अब फिर से नीतीश के गुणगान कर रहे हैं।
आरसीपी सिंह ने हाल ही में स्पष्ट रूप से कहा कि "मेरे और नीतीश जी के बीच कभी कोई वास्तविक दूरी थी ही नहीं। हम 25 सालों से साथ हैं और हम एक-दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं।" इस बयान के तीन बड़े राजनीतिक मायने हैं:
 
जदयू में वापसी का संकेत: आरसीपी सिंह का यह कहना कि 'रास्ते कभी अलग नहीं हुए', यह इशारा है कि खरमास के बाद वे औपचारिक रूप से जदयू में वापस आ सकते हैं।
पुराने कुनबे को जोड़ना: नीतीश कुमार समझ चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए उन्हें अपने उन पुराने साथियों की जरूरत है जो संगठन को समझते हैं। आरसीपी सिंह संगठन के आदमी रहे हैं।
भाजपा के लिए चेतावनी: आरसीपी सिंह जो कभी भाजपा के करीब थे, अगर वे वापस नीतीश के पाले में आते हैं, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका होगा।
जहाँ आरसीपी सिंह का जिक्र है, वहां यह व्यंग्य सटीक बैठेगा:
"सियासत में 'हनुमान' भी बदलते हैं और 'राम' भी। जो कल तक अपनों की कतार से बाहर थे, आज वही वफादारी का सर्टिफिकेट लेकर सबसे आगे खड़े हैं। आखिर दही-चूड़ा की मिठास कड़वे रिश्तों को भी चाशनी में डुबो ही देती है।
 

क्या राजद और महागठबंधन का पत्ता साफ होगा?

प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह के सक्रिय होने के पीछे एक और बड़ी संभावना छिपी है— राजद (RJD) को अलग-थलग करना। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार अब राजद के साथ जाने के बजाय अपने पुराने कैडर को मजबूत करना चाहते हैं। पीके का नीतीश को यह समझाना कि 'राजद खत्म हो जाएगी', एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि नीतीश कुमार को एक 'स्वतंत्र ताकत' के रूप में पेश किया जा सके।
 

 भविष्य के गर्भ में क्या है?

बिहार की राजनीति 'संभावनाओं का खेल' है। खरमास खत्म होने के बाद 16 जनवरी से 31 जनवरी के बीच बिहार में कुछ बड़े घटनाक्रम हो सकते हैं। जैसे-
 नीतीश कुमार अपनी यात्रा के बाद भाजपा के साथ नए सिरे से सौदेबाजी (Bargaining) करेंगे।
आरसीपी सिंह और संभवतः प्रशांत किशोर की टीम जदयू के रणनीतिक ढांचे में शामिल होगी।
 और बिहार सरकार का स्वरूप बदल सकता है, जहाँ नीतीश कुमार खुद को 'छोटा भाई' मानने के बजाय 'बड़े भाई' की भूमिका में फिर से स्थापित करेंगे।
सच्चाई क्या है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि नीतीश कुमार ने अपनी 'समृद्धि यात्रा' और पुराने साथियों से संपर्क साधकर भाजपा और विपक्षी दलों, दोनों की नींद उड़ा दी है। भाजपा विरोधी खेमा इसे एक मास्टरस्ट्रोक मान रहा है, जबकि भाजपा इसे नीतीश कुमार की 'दबाव की राजनीति' देख रही है।
माना जा रहा है कि बिहार के सियासी मंच पर पर्दे उठ चुके हैं, पात्र तैयार हैं, और मकर संक्रांति के बाद 'महाभारत' शुरू होने वाला है।
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आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है (Engagement Questions):

1.     पलटीमार या मास्टरस्ट्रोक? क्या नीतीश कुमार का पुराने साथियों की ओर मुड़ना भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति है?

2.     भाजपा बनाम नीतीश: मंत्रिमंडल विस्तार में देरी का असली कारण क्या है?

3.     PK का प्रभाव: क्या आप सहमत हैं कि बिहार की जनता अब तीसरे विकल्प की तलाश में है?

4.     समृद्धि यात्रा: क्या 2025 में भी नीतीश की 'विकास पुरुष' वाली छवि वोट दिला पाएगी?

5.     भविष्य की खिचड़ी: मकर संक्रांति के बाद आप किसकी सरकार बनते देख रहे हैं?

अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

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Wednesday, 29 October 2025

Bihar Election 2025 : बिहार का तेजस्वी प्रण पर भाजपा का विज्ञापन वार | BJP's advertisement war on Bihar's Tejashwi's pledge


 

The BJP has launched an advertising attack on Tejashwi's pledge to form Bihar. Releasing the India Mahagathbandhan (INDIA Alliance) manifesto, Tejashwi said, "We will not only build a government, we will build a new Bihar. We don't make broken promises; we will fulfill what we have promised."

बिहार का तेजस्वी प्रण (Bihar ka Tejaswi Pran) पर भाजपा ने विज्ञापन वार किया है ।तेजस्वी ने इंडिया महागठबंधन का घोषणा पत्र जारी करते हुए कहा- हम सरकार ही नहीं, नया बिहार बनाएंगे। हम टूटे-फूटे वादे नहीं करते, जो कहा है उसे पूरा करेंगे। कल यानी मंगलवार को इंडिया गठबंधन की ओर से घोषणा पत्र जारी किया गया। इस घोषणा पत्र को अक्षरशः लागू किया जाए, तो वास्तव में रामराज आ जाएगा। महागठबंधन के इन लोक लुभावने वादों से पूरा एनडीए खेमा  ही बिल- बिला गया है।

तेजस्वी ने दिखाया अच्छे दिनों के मानचित्र

इंडिया महागठबंधन का घोषणापत्र जारी करते
राजद नेता तेजस्वी यादव, माले के दीपंकर

इंडिया गठबंधन की ओर से राजद के नेता तेजस्वी प्रसाद यादव ने इंडिया महागठबंधन का घोषणा पत्र जारी कर ऐसी सुविधा बिहार के आवाम को देने की घोषणा की कि एक बार लगने लगा अब बिहारवासियों के अच्छे दिन आ रहे हैं ।  घोषणा पत्र में कहां गया कि हर परिवार से एक सदस्य को सरकारी नौकरी देंगे। एक दिसंबर से महिलाओं को हर महीने ढाई हजार रुपए मिलेंगे। मालूम हो कि सरकार बनने के एक पखवाड़े में ही इतना बड़ा फैसला लेने की घोषणा की है, जो आधी आबादी है। इस वोट बैंक पर अब तक नीतीश कुमार का राज है।

सबके हाथ में अशर्फी की आस

 इंडिया महागठबंधन की ओर से  घोषणाओं का ऐसा पिटारा खुला कि सब के हाथ में अशर्फी आने की उम्मीद बढ़ गई है। संविदाकर्मी और जीविका समन्वयक खुशी से झूम उठे। संविदाकर्मी और जीविका समन्वयक को स्थाई करने का वादा किया। इसके साथ हर परिवार को 200 यूनिट तक मुक्त बिजली की सुविधा देने की बात कही। ऐसा लग रहा है कि हर घर चमचमा उठा है। अभी चुनाव की घोषणा से कुछ दिन पहले ही नीतीश कुमार की नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने बिहार के हर परिवार को 125 यूनिट बिजली फ्री में दे दी है। इसी को तेजस्वी यादव 200 यूनिट करने की बात कही।

बिहार में बहार के सपने

अभी चुनाव की जो घोषणा हुई उससे ऐसा लग रहा है कि वास्तव में  बिहार में बहार आने वाली है।  इसके सपने नीतीश कुमार ने दिखाए थे। अब नीतीश कुमार घूम घूम कर बहार का नजारा दिखा रहे है। मुख्यमंत्री नीतीश अपने किए हुए कार्यों का पिटारा लोगों को दिखा रहे हैं और बिहार की जनता को सावधान कर  रहे हैं कि इंडिया गठबंधन के भ्रामक घोषणाओं से सतर्क रहें । इस दौरान आगे काम करने के की सूची भी अपने भाषण में लोगों को थमा रहे हैं । उनकी मुख्य घोषणा है, अगले 5 साल में बिहार में एक करोड़ नौकरी - रोजगार देंगे। वह यह बात करना भूल नहीं रहे हैं कि पिछले 5 साल में 10 लाख युवाओं को नौकरी और 40 लाख लोगों को रोजगार दिया जा चुका है।

2005 से पहले कुछ हुआ था जी

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार
हर संबोधन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जनता को 2005 से पहले के बिहार की याद दिलाना नहीं भूलते हैं । वह कहते हैं, 1990 से 2005 के बीच बिहार में कुछ हुआ था जी। अशिक्षा और पलायन हमारी नीति बन गई थी। बिहार में जंगलराज था। उसके बाद कोर्ट में चल रहे जॉब के बदले जमीन का मामला भी उठते रहते हैं । नीतीश कुमार ने तेजस्वी के घोषणा पत्र के बाद कहा कि उनके माता-पिता 15 वर्षों तक बिहार में राज किया था । तब क्या हुआ था? हमेशा प्रश्न के लहजे में बात करते हैं और सवाल उठाते हैं । या यह कहें कि लालू- राबड़ी राज के काल को याद करा कर बिहार की जनता को डरा कर अपने पक्ष में मतदान करने की मांग कर रहे हैं । उन्होंने कहा कि वर्ष 2005 से पहले बिहार के युवाओं को दूसरे राज्यों में ही रोजगार ढूंढना पड़ता था।  उन्हें बिहार के नाम पर अपमान झेलना पड़ता था। नौकरियों के लिए वैकेंसी ना के बराबर निकलती थी।  कुछ पदों पर बहाली निकलते भी थे तो सत्ता के संरक्षण में नौकरी का सौदा होता था। इसके बाद फिर जनता से करते हैं, क्या जी आज ऐसा होता है क्या?

व्यक्तिगत टारगेट पर तेजस्वी

इसी तरह केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने इंडिया महागठबंधन के घोषणा पत्र पर वार किया । उन्होंने तेजस्वी को सपने बेचने की कोशिश करने की बात कही। उन्होंने कहा बिहार के लोग जंगलराज के नायक को नहीं भूले हैं। उनसे बिहार की जनता को सावधान रहना है । इसी तरह केंद्रीय मंत्री लोजपा (रामविलास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने कहा कि बिहार में जंगलराज को लौटने नहीं देंगे । यह बात उन्होंने बख्तियारपुर में पार्टी के उम्मीदवार अरुण कुमार के प्रचार काफिले पर हमले के संदर्भ में कही थी। केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव के साथ-साथ महागठबंधन पर निशाना साधते हैं। उन्होंने कहा, संभावित हार को देखते हुए तेजस्वी यादव घबराहट में हैं।

 तेजस्वी से उम्मीद

इंडिया महागठबंधन के समर्थकों का कहना है कि हम तेजस्वी के उपमुख्यमंत्री काल को देख रहे हैं । उन्होंने 17 महीने में रोजगार देने के लिए जितने कदम उठाए थे, वह हमें सुंदर भविष्य की ओर ले जाने के लिए काफी है। आज बुधवार सुबह की बात है। एमआईटी ग्राउंड में कुछ लोग टहल रहे थे और इंडिया महागठबंधन के घोषणा पत्र की चर्चा कर रहे थे। उनकी चर्चाओं में जो मुख्य मुद्दा थे, उस पर हम थोड़ी बात कर लेते हैं।  वे कह रहे थे कि सरकारी कर्मचारी,  बुजुर्ग के अलावा सोशल इंजीनियरिंग पर भी घोषणा पत्र में  फोकस किया गया है। सबसे बड़ी बात यह रही की इंडिया महागठबंधन की घोषणा पत्र में मूल रूप से बिहारी को आर्थिक रूप से मजबूत करने की बात कही गई है। इसमें उन्होंने सरकारी कर्मियों को पुरानी पेंशन देने और सामाजिक सुरक्षा पेंशन ₹1500 करने के साथ हर साल उसमें ₹200 की वृद्धि करने का भी वादा किया गया है। राज्य में विधि व्यवस्था ठीक हो इसके लिए एसपी और थानेदार का कार्यकाल भी तय करने का फैसला लिया जाएगा। उन्होंने सबसे बड़ा गेम वक्फ बोर्ड संशोधन कानून को लेकर खेला है। उन्होंने कहा वक्फ संशोधन विधेयक पर रोक लगाई जाएगी। इसका मुस्लिम कम्युनिटी से सीधे ताल्लुक है। खासकर मुसलमान की भावना को जोड़ने के लिए इस बात को उद्धृत किया गया है । तेजस्वी ने कहा कि मजदूर श्रमिकों की गणना होगी और प्रवासी श्रमिकों के लिए सरकार में एक समर्पित विभाग होगा । इसी तरह पंचायत प्रतिनिधियों का भत्ता दोगुना करने और पूर्व सदस्यों को पेंशन की सुविधा देने का वादा किया।

निचले तबकों की आर्थिक तरक्की

बिहार में निचले तबकों में रहने वाले नाई, कुम्हार,  बढ़ाई, लोहार,  मोची और  माली को 5 साल के लिए 5 लाख रुपए देने की बात कही।  दिव्यांगों के लिए भी विकास कार्यक्रम को लागू करने का ऐलान किया। भूमिहीनों को ग्रामीण क्षेत्र में पांच और शहरी इलाके में तीन डिसमिल जमीन देने का भी वादा किया।

एनडीए ने लिया विज्ञापन का सहारा

निश्चित रूप से इंडिया गठबंधन  का घोषणा पत्र बिहार में रामराज लागू होने जैसी स्थिति पैदा करने वाले घोषणाओं को देखकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए ) में घबराहट पड़ा हो गई और आनन फानन में विज्ञापन से पलटवार किया है। उसने अपने विज्ञापन में अखबारों की सुर्खियों को कोलाज के रूप में प्रस्तुत किया है। उनमें कुछ कांग्रेस शासित राज्यों की सुर्खियां हां तो कुछ बिहार की पुरानी सुर्खियां।

हिमाचल और कर्नाटक की बात को रखा है, जिसमें कांग्रेस के वादे और कार्य की एक झलक दिखती है। हिमाचल में हजारों कर्मचारियों को सुक्खू सरकार ने दिया झटका , 10 से 20 K तक कम हो सकता है वेतन। उसी जगह दूसरी बात भी कही गई है कि हिमाचल में वेतन और पेंशन पर भी संकट आ गया है । कर्नाटक पर विज्ञापन में कहा गया है कि कर्नाटक सरकार ने चुनाव में किए थे 59 वादे 1 साल में केवल दो पूरे कर पाए ।

बिहार की सुर्खियों की झलक

एनडीए के इस विज्ञापन में बिहार में जंगल राज को दर्शाया गया है। उनमें जहानाबाद में उग्रवादियों ने 100 लोगों को भून डाला। बिहार में अब तक का सबसे बड़ा नरसंहार 75 की हत्या । सिवान में एक ही परिवार के 12 लोगों को गोलियों से भूना । बारा गांव में 37 लोगों की सामूहिक हत्या।  हिंसा- लूट और बम के धमाकों के बीच चौथे चरण का पंचायत चुनाव संपन्न। समस्तीपुर में तीन व्यापारियों समेत चार का अपहरण,  पैसा दो डॉक्टरी की डिग्री लो। इस तरह बिहार के अपराधी के इतिहास और भ्रष्टाचार के हाल को बयान करते हुए दिखाया गया है । विज्ञापन में कोर्ट की टिप्पणी को भी रखा गया है जिसमें हाईकोर्ट ने कहा था बिहार जंगलराज से भी बदतर। राज्य में 14 साल से प्राथमिक शिक्षा ध्वस्त।  सबसे बड़ी दिलचस्प बात यह है कि इस विज्ञापन कोलाज में गौतम - शिल्पी हत्याकांड का जिक्र नहीं है,  जो एक माह पहले तक जोर - शोर से उठाया जा रहा था। जब से जनसुराज का सूत्रधार प्रशांत किशोर ने इस मामले में भाजपा नेता और उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का नाम घसीटा है, तब से  एनडीए नेताओं के मुंह ताले लग गए हैं।

चाचा - भतीजा के बीच तलवारबाजी

दोनों खेमों के कर्ताधर्ता अपने तीर - तलवार लेकर मैदान में रंग जमा रहे हैं। चाचा - भतीजा का तमाशा जारी है। मदारी की  डुगडुगी बज रही है।  बिहार की पब्लिक न्यारी है। सबको बरोबर मौका दे रही है। सबको सुन रही है, पर प्रतिक्रिया नहीं दे रही है।  अब देखना है वार पलटवार में कौन जनता को अपने पक्ष में कर पाता है। इतना तो सच है कि इंडिया महागठबंधन को लालू-राबड़ी काल के कारनामे परेशान कर रहा है और सशंकित हैं, वहीं एनडीए को बिहार का तेजस्वी प्रण परेशानी में डाल रखा है।

धन्यवाद।

तरुण कुमार कंचन

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Wednesday, 15 October 2025

मौथिली को राजनीति कहीं ले न डूबे! | Politics should not drown Maithili!

 


                      भाजपा के बिहार के प्रदेश अध्यक्ष के साथ लोकगायिका मैथिली ठाकुर 

मैथिली ठाकुर #maithili thakur  एक गायिका है और वह बिहार का ब्रांड बन गईं। वह पूरे बिहार के लिए गौरव की बात है। वह देश से विदेश तक एक बिहारी के रूप में जानी पहचानी जा रही थीं। पूरा बिहार उन्हें अपना मान रही थीं। जैसे भी उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी भारतीय जनता पार्टी को ज्वाइन की, वैसे ही वह तबकों में बांट गईं। अब होगा यह कि पहले 100 प्रतिशत बिहारियों का उन्हें समर्थन मिलता था। अब 60 प्रतिशत से अधिक बिहारी उनसे अलग हो गए। किसी न किसी मंच पर विरोध भी होगा। हो सकता है विधायक बन जाएं मगर टैग हो जाएगा भाजपा विधायक। खैर, यह उनका अपना फैसला है। मुझे जो लगता था, कह दिया। हेमा मालिनी भाजपा की सांसद हैं और लगातार सांसद हैं, लेकिन जो शौहरत उन्हें अभिनय की दुनिया में मिला था, क्या अब वह उस बुलंदी पर हैं? मुझे लगता है, नहीं। इस कारण मुझे डर है कि मैथिली को राजनीति कहीं ले न डूबे ( maithilee ko raajaneeti kaheen le na doobe) !


         

भाजपा के पट्टे के साथ मैथिली
लता जी भी रहीं सांसद 

लता मंगेशकर जी हमेशा भाजपा का समर्थन की हैं, मगर कभी पार्टी मंच का उपयोग नहीं किया। विष्णुलोक वासी होने के बाद भी आज उन्हें 100 प्रतिशत लोग प्यार करते हैं । आपको पता होगा कि लता मंगेशकर राज्यसभा में मनोनीत सदस्य के रूप में रही थीं। वह नवंबर 1999 से लेकर नवंबर 2005 तक संसद (राज्यसभा) की सदस्य रहीं। वह किसी राजनीतिक पार्टी से नहीं थीं। उन्हें राष्ट्रपति द्वारा कला क्षेत्र से मनोनीत सांसद (Nominated MP) बनाया गया था, जैसा कि भारतीय संविधान के तहत प्रावधान है। हालांकि, उन्हें तत्कालीन बीजेपी (BJP) समर्थित सरकार द्वारा मनोनीत किया गया था। और सबसे बड़ी बात यह कि उन्होंने अपने छह साल के कार्यकाल में सांसद के तौर पर कोई वेतन या भत्ता स्वीकार नहीं किया था।

      


                                                  नई उड़ान या कैरियर पर दाव


भारतीय पारंपरिक साड़ी में मैथिली

मेरा कहना यह था कि कोई व्यक्ति एक दिन में महान नहीं होता है। उसे इसके लिए तप और साधना करनी पड़ती है। मैथिली आपको माता सरस्वती ने गोद ले रखा है। आपके कंठ में माता स्वयं विराजमान हैं। आप इतनी अच्छी गाती हैं। आपका गायन कर्णप्रिय है। सब आपको प्यार करते हैं। सोशल मीडिया पर आपके करोड़ों फॉलोवर्स हैं। नई पीढ़ी की आप से उदीयमान गायक हैं, जो सभ्यता और संस्कृति को साथ लेकर चल रही हैं। अपने सनातन का पालन कर रही हैं, तो ऐसी क्या मजबूरी थी, जो आपने भाजपा में शामिल होकर चुनाव लड़ने जा रही हैं। कहीं इससे आपका कैरियर दाव पर नहीं लग जाएगा? हो सकता है कि आपको एक नई उड़ान मिले?

मगर मुझे ऐसा लगता है कि कहीं आप भाजपा का मोहरा न बन कर रह जाएं। आपको सिर्फ मंच की शोभा न बना कर रख लें? यह मेरी सिर्फ आशंका है। इसमें सच्चाई क्या है? यह भविष्य के गर्भ में है। उसके बारे बारे में सिर्फ अनुमान लगाया जा सकता है।

अब समाज सेवा का मौका 

मुझे लगता मैथिली जब आपने इतना बड़ा फैसला लिया है तो विचार जरूर किया होगा? आपने सोचा होगा कि राजनीति में जाएंगे तो हम बिहार के लिए समाज सेवा करेंगे? आपने कुछ सोचा होगा? आपने कुछ सर्वेक्षण किया होगा? अपने कुछ लक्ष्य तय किया होगा क्योंकि आपका जो पारिवारिक बैकग्राउंड है वह निश्चित रूप से आपको फैसले पर विवेचना करने के लिए मजबूर किया होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मैथिली ठाकुर

आइए अब देखते हैं मैथिली ठाकुर का संघर्ष इतिहास

मैथिली ठाकुर भारत की एक लोकप्रिय गायिका हैं, जो मुख्य रूप से शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत के लिए जानी जाती हैं।

मैथिली मुख्य रूप से मैथिली, भोजपुरी और हिंदी में लोक गीत और भक्ति गीत/भजन गाती हैं। इनमें छठ गीत और कजरी भी शामिल हैं। वह विभिन्न भाषाओं में बॉलीवुड कवर और अन्य पारंपरिक लोक संगीत भी गाती हैं।

मैथिली का जन्म 25 जुलाई 2000 को बिहार के मधुबनी जिले के बेनीपट्टी गाँव में हुआ था। उनके पिता रमेश ठाकुर उनके संगीत गुरु भी हैं, और उनकी माँ का नाम भारती ठाकुर है। उनके दो छोटे भाई, ऋषभ ठाकुर (तबला वादक) और अयाची ठाकुर (गायक), भी उनके साथ संगीत में सहयोग करते हैं।

मैथिली ने 2017 में भारतीय गायन रियलिटी कार्यक्रम 'राइजिंग स्टार' के पहले सीज़न में भाग लिया और फिनाले तक पहुँची थीं। इसके बाद उन्होंने 'इंडियन आइडल जूनियर' में भी हिस्सा लिया था। उन्हें यूट्यूब और सोशल मीडिया पर अपनी वीडियो के माध्यम से जबरदस्त लोकप्रियता मिली।

मैथिली को राष्ट्रीय रचनाकार पुरस्कार (2024) से सम्मानित किया गया है। उन्हें बिहार राज्य खादी, हैंडीक्राफ्ट्स और टूरिज्म का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया गया है।

उनके कुछ प्रसिद्ध गानों में 'महिषासुरमर्दिनी स्त्रोतम' और त्योहारों से जुड़े गीत शामिल हैं। उन्होंने यह भी बताया है कि वह बॉलीवुड में गाने के खिलाफ हैं। इस कारण उनकी अलग पहचान है। फिर राजनीति में आने की जरूरत क्या थी? 

:-  तरुण कुमार कंचन 

                                  * सभी तस्वीर सोशल मीडिया से

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