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Saturday, 13 June 2026

असम विमान हादसा: देश सेवा में बिहार के दो वीर सपूत शहीद, पूरे राज्य में शोक

 


असम के जोरहाट में वायुसेना का AN-32 विमान दुर्घटनाग्रस्त। हादसे में बिहार के दो जांबाज सपूत—भोजपुर के अग्निवीर दानिश आलम और जहानाबाद के फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार शहीद। पूरे राज्य में शोक की लहर। पूरी खबर पढ़ें।

कंचनवाणी रिपोर्टर

पटना : असम के जोरहाट में शनिवार को वायुसेना का AN-32 विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया। इस बेहद दर्दनाक हादसे में वायुसेना के 5 जवान शहीद हो गए, जिनमें बिहार के दो जांबाज सपूत भी शामिल हैं। शहीदों में भोजपुर के वायु अग्निवीर दानिश आलम और जहानाबाद के फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार शामिल हैं। इन दोनों वीरों की शहादत की खबर मिलते ही पूरे बिहार में शोक की लहर दौड़ गई है।

22 साल के अग्निवीर दानिश आलम ने देश पर किया सर्वस्व न्योछावर


हादसे में शहीद हुए वायु अग्निवीर दानिश आलम (22 वर्ष) भोजपुर जिले के कोईलवर प्रखंड के कायमनगर के रहने वाले थे। उनके पिता का नाम मोहम्मद फारूक आलम है। दानिश अपने पिता के इकलौते पुत्र थे। वह अभी अक्टूबर 2025 में ही वायु अग्निवीर के रूप में भारतीय वायुसेना का हिस्सा बने थे और उनकी पहली पोस्टिंग असम के जोरहाट में ही हुई थी।

परिजनों ने बताया कि दानिश बीते 23 मई को ही छुट्टी पर घर आए थे और 30 मई को वापस जोरहाट के लिए रवाना हुए थे। किसे पता था कि चंद दिनों बाद ही देश सेवा करते हुए दानिश हमेशा के लिए अमर हो जाएंगे। इकलौते बेटे की शहादत से माता-पिता का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं पूरे गांव को अपने लाडले की शहादत पर गर्व भी है।



हादसे से 1 घंटे पहले फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम ने मां से की थी वीडियो कॉल


इस हादसे ने जहानाबाद के बिलासपुर प्रखंड के बावरिया गांव के रहने वाले फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार (26 वर्ष) को भी हमसे छीन लिया। शुभम के शहादत की सूचना मिलते ही उनका परिवार पूरी तरह टूट गया है।

 परिजनों ने बताया कि हादसे से महज 1 घंटे पहले ही शुभम ने अपनी मां से वीडियो कॉल पर बात की थी। उस वक्त किसे अंदाजा था कि मां और बेटे की यह बातचीत आखिरी साबित होगी। शुभम की असमय शहादत से बावरिया गांव सहित पूरे जिले में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ है और हर आंख नम है।

मुख्यमंत्री और दिग्गजों ने जताया शोक

बिहार के दोनों सपूतों की शहादत पर राज्य के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में गहरा दुख व्यक्त किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग नम आंखों से शहीदों को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। देश की संप्रभुता और सुरक्षा की खातिर अपनी जान गवाने वाले इन दोनों वीर सपूतों को पूरा देश नमन कर रहा है।

देश की सेवा में अपना सर्वोच्च बलिदान देने वाले वीर शहीद दानिश आलम और फ्लाइट लेफ्टिनेंट शुभम कुमार को शत-शत नमन। ईश्वर शोक संतप्त परिजनों को यह अपार दुख सहने की शक्ति दे।

 

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Thursday, 4 June 2026

कंचनवाणी विशेष: सुशासन का ढोंग और धधकती लाशें—मुजफ्फरपुर अस्पताल अग्निकांड ने खोली बिहार की पोल


मुजफ्फरपुर के प्रसाद हॉस्पिटल में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने बिहार की प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। कंचनवाणी की इस विशेष रिपोर्ट में जानिए कैसे सुशासन के दावों के बीच आम जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है। पूरी सच्चाई पढ़ने के लिए क्लिक करें।
मुजफ्फरपुर
बिहार में 'शासन' और 'प्रशासन' जैसे शब्द अब केवल कागजी बहसों और चुनावी भाषणों तक सीमित रह गए हैं। हकीकत की जमीन पर जो बच गया है, वह है—आम जनता की बेबसी और व्यवस्था की जानलेवा लापरवाही। आज बिहार की जनता एक बार फिर त्राहिमाम करने को मजबूर है। सुशासन का कथित लबादा ओढ़ाकर सूबे की सत्ता की चाबी भले ही बदल दी गई हो, लेकिन जमीन पर बदहाली का वही पुराना दौर जारी है।
मुजफ्फरपुर से आई एक बेहद निराशाजनक और रूह कंपा देने वाली खबर ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह सिर्फ एक हादसा नहीं, बल्कि उस समूचे तंत्र की नाकामी है जो नागरिकों की सुरक्षा का दंभ भरता है।


थाना नाक के नीचे, और अस्पताल बन गया 'कब्रगाह'
मामला मुजफ्फरपुर के ब्रह्मपुरा इलाके का है। मुख्य सड़क पर स्थित 'प्रसाद हॉस्पिटल' शहर के नामचीन और सर्वसुविधायुक्त अस्पतालों में गिना जाता था। इस अस्पताल की संवेदनशीलता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि यहाँ से महज 100 गज की दूरी पर ही ब्रह्मपुरा थाना स्थित है। लेकिन सुरक्षा और सतर्कता का आलम देखिए—रात के करीब साढ़े तीन बजे इस अस्पताल में भीषण आग लग जाती है और व्यवस्था को भनक तक नहीं लगती।
इस दर्दनाक हादसे में देखते ही देखते कई जिंदगियां खाक हो गईं। हालांकि, जिला प्रशासन और आधिकारिक आंकड़े केवल चार मौतों की पुष्टि कर रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत और चश्मदीदों का दावा है कि 10 से 12 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और दर्जनों लोग गंभीर रूप से झुलस चुके हैं।


गायब होते मरीज और बदबू मारती व्यवस्था
इस त्रासदी का सबसे हृदयविदारक पहलू वह है जो पीड़ित परिजनों के बयानों से सामने आ रहा है। तीमारदारों का गंभीर आरोप है कि हादसे के बाद से उनके मरीज लापता हैं। अपनों को स्वस्थ कराने की उम्मीद में अस्पताल लाए लोग अब उनकी लाशें ढूंढने को मजबूर हैं। अस्पताल परिसर और आसपास से आती दुर्गंध इस बात की गवाही दे रही है कि सच्चाई को दबाने की कोशिश की जा रही है।
"एक व्यक्ति जो अस्पताल में ठीक होने आता है, वह अचानक गायब हो जाता है और प्रशासन के पास कोई जवाब नहीं है। बिहार वासियों को जिला प्रशासन और पुलिस की ऐसी सड़ी-गली और संवेदनहीन व्यवस्था बिल्कुल नहीं चाहिए।"
जवाबदेही से भागती 'डबल इंजन' सरकार
यह घटना सिर्फ एक अस्पताल प्रबंधन की लापरवाही नहीं है, बल्कि पूरी राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न है। जनता आज यह सवाल पूछने को मजबूर है कि हम ऐसी 'दुर्गंध वाली सरकार' और निकम्मे तंत्र को क्यों स्वीकार करें?
इस बदहाली के लिए जितने जिम्मेदार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं, उतने ही दोषी उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भी है। जब सत्ता के गलियारों में योग्यता को दरकिनार कर केवल 'जातिगत समीकरणों' और तुष्टिकरण के आधार पर कुर्सियां बांटी जाएंगी, तो जमीन पर ऐसा ही हाहाकार मचेगा। आज पूरे सूबे में भ्रष्टाचार का घुन लग चुका है, अन्यथा पुलिस थाने के ठीक बगल में इतना बड़ा हादसा हो जाए और प्रशासन को खबर तक न हो, यह मुमकिन नहीं है।
चमचमाती गाड़ियां और खोखला तंत्र
आज बिहार के प्रशासनिक अमले का पूरा ध्यान केवल अपनी गाड़ियां चमकाने, वीआईपी कल्चर का लुत्फ उठाने और राजनीतिक आकाओं के इशारे पर विरोधी नेताओं पर कार्रवाई करने में लगा है। जिसे जनता की सुरक्षा और सुख-सुविधाओं की चिंता होनी चाहिए, वह तंत्र पूरी तरह से संवेदनशून्य हो चुका है।
कंचनवाणी का स्पष्ट मत:
बिहार के हुक्मरान यह न भूलें कि सूबे की जनता सोई नहीं है। वक्त आने पर इस दुर्गति, इस लापरवाही और अपनों को खोने के इस दर्द का हिसाब यही जनता करेगी। इस पूरी त्रासदी के लिए सिर्फ और सिर्फ बिहार का संवेदनहीन प्रशासन और दिशाहीन नेतृत्व जिम्मेदार है।
आप इस रिपोर्ताज पर क्या सोचते हैं? नीचे कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर साझा करें और निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए 'कंचनवाणी' को सपोर्ट करें।

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Monday, 1 June 2026

पत्रकारिता : 35 वर्षों के सफरनामे और 'सिंगल-डीसी' के खेल को आखिरी सलाम



आज मैं पत्रकारिता से संन्यास ले रहा हूँ।" 'हिन्दुस्तान' अखबार के अपने लंबे सफर, मीडिया की बदलती दुनिया और इस बड़े फैसले के पीछे की पूरी सच्चाई जानिए सोशल मीडिया के इस खास और बेहद भावुक आलेख में।


तरुण कुमार कंचन

मुजफ्फरपुर। आज मन के एक कोने में एक अजीब सी खामोशी है, और आंखों के कोरों में यादों का पूरा समंदर उमड़ आया है। आज जीवन के 35 वर्षों की उस अनवरत दौड़ पर एक पूर्णविराम लग गया, जिसे दुनिया 'सार्वजनिक पत्रकारिता' कहती है। हां, आज मैंने खबरों के इस वृहद संसार से, इसके हर रोज के तनाव से औपचारिक रूप से संन्यास ले लिया। अब मुझे रोज की उस 'सिंगल-डीसी' Deadlines/Daily Copy की रस्साकशी से नहीं जूझना होगा। खेल अब बंद हुआ, पर यादों का कारवां हमेशा के लिए जेहन में दर्ज हो गया।


सफर की शुरुआत 
सफर की शुरुआत याद आती है, तो पैर ठिठक जाते हैं। ग्रेजुएशन के बाद, साल 1992-93 का वह दौर जब आँखों में कुछ कर गुजरने के सपने थे। 'सच्चिदानंद सिन्हा पत्रकारिता संस्थान, पटना' में बी.जे. (बैचलर ऑफ जर्नलिज्म) में दाखिला लिया और वहीं से इस जादुई मगर निष्ठुर दुनिया में मेरा पहला कदम पड़ा था। तब कहाँ मालूम था कि यह राह इतनी लंबी, इतनी उतार-चढ़ाव भरी और इतनी खूबसूरत होगी। इन साढ़े तीन दशकों में मैंने कई शहरों की पत्रकारिता को जिया, कई घाटों का पानी पिया और हर शहर की आबो-हवा को महसूस किया। हर जगह की अपनी एक दास्तान थी, अपनी एक तासीर थी।


मुजफ्फरपुर में पदार्पण
आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुजफ्फरपुर का वह दौर बरबस याद आता है। जब बिहार और झारखंड का बंटवारा हो रहा था, तब नियति मुझे 'दैनिक जागरण' के मुजफ्फरपुर ब्यूरो की कमान सौंप रही थी। आदरणीय श्री देवेंद्र सिंह जी को झारखंड में दैनिक जागरण की नींव मजबूत करने के लिए रांची भेजा गया, और मुझे पटना की व्यस्तता से निकालकर मुजफ्फरपुर की इस ऊर्जस्वित धरती पर आना पड़ा।
यहीं से साल 2001 में 'हिन्दुस्तान' के साथ मेरा एक नया और अटूट अध्याय शुरू हुआ। तब मुजफ्फरपुर में 'हिन्दुस्तान' नया-नया लॉन्च हो रहा था। हम सब युवा थे, रगों में गर्म खून था और अखबार को शीर्ष पर ले जाने की एक जिद थी। हम सबने अपनी जी-जान लगा दी।


मेरठ में 14 साल

6 साल तक मुजफ्फरपुर में 'हिन्दुस्तान' को सींचने के बाद, सफर मुझे 'अमर उजाला' के साथ गोरखपुर ले गया। वहां करीब डेढ़ साल बिताने के बाद, आदरणीय श्री राजीव मित्तल जी के कुशल नेतृत्व में मेरा रुख मेरठ 'हिन्दुस्तान' की तरफ हुआ। मेरठ में बिताए वह 14 साल... जहां मैं बेहद सुरक्षित और सहज महसूस करता था। वह मेरा 'कंफर्ट जोन' बन चुका था। पर कहते हैं न, अपनी मिट्टी और घर का मोह इंसान को कभी चैन से बैठने नहीं देता। वही मोह मुझे भागलपुर खींच लाया। 

जीवन चक्र में राहु और शनि

कुछ दिन तो सब कुछ ठीक रहा, पर शायद वक्त को कुछ और मंजूर था। जीवन चक्र में राहु और शनि का ऐसा क्रूर प्रभाव पड़ा कि जो कुछ संजोया था, वह बिखरने लगा। एक ऐसा कठिन दौर भी आया जब 'हिन्दुस्तान' भागलपुर से मुझे अलग होना पड़ा। वह मेरी व्यावसायिक और मानसिक परीक्षा की घड़ी थी।

मुजफ्फरपुर: अंधेरे के बाद उजाला

लेकिन, अंधेरे के बाद उजाला अवश्य आता है। संकट के उस दौर में आदरणीय प्रधान संपादक श्री शशिशेखर जी की असीम सदाशयता और आदरणीय श्री तीरविजय सिंह जी के स्नेहिल सान्निध्य ने मुझे संबल दिया। उनके आशीर्वाद से 15 फरवरी 2025 को मुझे दोबारा मुजफ्फरपुर 'हिन्दुस्तान' के आँचल में आने का सौभाग्य मिला। यहाँ के स्थानीय संपादक श्री आलोक कुमार मिश्र जी के नेतृत्व में पूरी टीम न केवल सुशिक्षित है, बल्कि सुसंस्कारित भी है। इस टीम के साथ काम करते हुए मुझे कभी यह अहसास नहीं हुआ कि मैं किसी कठिन दौर से गुजर कर आया हूँ।
आज जब मैं इस कमान को सौंप रहा हूँ, तो मुजफ्फरपुर 'हिन्दुस्तान' की इस सुसंस्कारित टीम को, उन तमाम मार्गदर्शकों को जिन्होंने मुझे उंगली पकड़कर साथ लाया, और उन अनगिनत पाठकों को, जिन्होंने 35 साल तक मेरे शब्दों पर भरोसा किया, हृदय की गहराइयों से नमन करता हूँ।
पत्रकारिता के इस सार्वजनिक जीवन से भले ही मैं विदा ले रहा हूँ, लेकिन शब्दों से मेरा नाता कभी नहीं टूटेगा। अब 'डेडलाइन' का दबाव नहीं होगा, पर यादों की स्याही हमेशा पन्नों पर बिखरती रहेगी।
आप सभी के स्नेह और साथ के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद।

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* क्या तरुण कुमार कंचन संन्यास ले रहे हैं?
* वरिष्ठ पत्रकार का बड़ा फैसला
* हिन्दुस्तान अखबार से संन्यास?
* कंचनवाणी का सबसे बड़ा खुलासा
* सोशल मीडिया टीचर का आखिरी फैसला
* पत्रकारिता का सफर और संन्यास की सच्चाई
* Kanchanvani Big Reveal

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Sunday, 31 May 2026

उजड़े बाग, खामोश शहर: मुजफ्फरपुर की 'शाही' लाडली की विदाई


तरुण कुमार कंचन

"मुजफ्फरपुर की शाही लीची के बागान इस बार सूने क्यों हैं? जानिए मौसम की मार, आसमान छूती कीमतों और किसानों के दर्द की एक मर्मस्पर्शी रिपोर्ट।"

मायके में ही पराई हुई लीची


मुजफ्फरपुर (बिहार) ।
मुजफ्फरपुर और लीची का रिश्ता महज एक फल और शहर का रिश्ता नहीं है। यह प्रेम, मिठास और एक गहरे अहसास का नाम है। यूं कहें तो मुजफ्फरपुर लीची का मायका है और यहां की 'शाही लीची' अपने बेमिसाल स्वाद और रुतबे के कारण इस साम्राज्य की निर्विवाद राजा है। लेकिन इस बार हवाओं का मिजाज बदला हुआ है। नियति की क्रूर विडंबना देखिए कि जिस शहर की मिट्टी पूरी दुनिया का मुंह मीठा कराती है, आज उसी शहर के लोग अपनी ही थाती को चखने के लिए लालायित हैं। मायके से इस बार 'शाही' बेटी की विदाई का अहसास हो रहा है।


बाज़ारों का सन्नाटा और कड़वे दाम
आमतौर पर जेठ के इस महीने में कंपनीबाग, रेलवे स्टेशन के सामने, अघोरिया बाजार, बैरिया और शहर के निकास द्वार रामदयालु नगर की सड़कें लीची की लालिमा से गुलजार रहा करती थीं। इस बार भी वहां चंद दुकानें सजी हैं, लेकिन कीमतों में वह 'कड़वाहट' है कि आम आदमी का जायका बिगड़ जाए।
जब मैंने खुद एक आम शहरी की तरह कंपनीबाग और बैरिया के दुकानदारों से मोल-भाव किया, तो उन्होंने 320 रुपए में 100 लीची का भाव सुनाया। दिल धक से रह गया। पिछले साल तक जो उम्दा लीची ₹150 से ₹200 के बीच झोली में आ जाया करती थी, उसकी कीमत दोगुनी कैसे हो सकती है? मन को भरोसा नहीं हुआ, सो दिल थामकर बिना लीची लिए ही आगे बढ़ गया।


अंकल पोजर की यादें...
कदमों को समेटते हुए मैं लक्ष्मी चौक स्थित बृज बिहारी गली की तरफ निकल गया। वहां एशियन स्कूल के पास दो ठेले दिखे। मानों तपती धूप में थोड़ी छांव मिली। वहां भाव कुछ नरम था 250 रुपए की 100 लीची। राहत की एक सांस ली। अब मैंने वहां से कितनी लीची खरीदी, यह राज ही रहने दीजिए। वरना मेरी माली हालत का सरेबाजार खुलासा हो जाएगा और आप भी जेरोम के उस मशहूर किरदार की तरह हंसते हुए कहेंगे- अंकल पोजर ने केले खरीदे थे और इन्होंने लीची!


सूने बागान: जैसे विदा हो गई घर की लाडली
जब मैंने ठेले वाले से इस बेताहाशा महंगाई का सबब पूछा, तो उसका जवाब किसी लोक-गीत के विरह जैसा था। उसने कहा— बाबूजी, इस बार पेड़ों में लीची आई ही नहीं। बागान के बागान खाली पड़े हैं।
सचमुच, इस बार मुजफ्फरपुर के बागानों को देखकर ऐसा लगता है जैसे शादी के बाद घर की लाडली बेटी ससुराल चली गई हो और पीछे पूरे घर-मुहल्ले में एक अंतहीन नीरवता, एक सूनापन पसर गया हो। जो कुछ लीची पेड़ों पर बची भी हैं, वे मौसम की बेरुखी से सुकड़ गई हैं; उनका आकार छोटा है और वो पारंपरिक मिठास भी गायब है।


मौसम की मार: आंकड़ों की जुबानी
यह सिर्फ एक भावुक अहसास नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुदरत के बदलते मिजाज के कठोर आंकड़े हैं। मुजफ्फरपुर की शाही लीची का भूगोल मीनापुर, मुसहरी, बोचहा और कांटी जैसे समृद्ध अंचलों में फैला है, जहां लगभग 12,000 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती होती है। पूरे बिहार के कुल लीची उत्पादन का 40 प्रतिशत अकेले मुजफ्फरपुर संभालता है। लेकिन इस साल की हकीकत डराने वाली है:
अकेले मुजफ्फरपुर जिला से देश दुनिया में हर वर्ष 1 लाख 25 हजार टन शाही लीची भेजी जाती थी, इस वर्ष मौसम अनुकूल नहीं होने के कारण लीची का उत्पादन बहुत कम मात्रा में हुआ है, जिससे इस बार उम्मीद जताई जा रही है कि 30 हजार टन के आसपास लीची का उत्पादन हुआ है।
इस भारी गिरावट के कारण जहां एक तरफ देश-दुनिया को स्वाद परोसने वाले किसानों की कमर टूट गई है और उन्हें भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ आम मुजफ्फरपुरवासी महंगाई की आंच में तपते हुए अपनी ही 'शाही' पहचान से दूर होता जा रहा है।


इस बार मुजफ्फरपुर की लीची आई तो है, पर खुशियां लेकर नहीं, बल्कि पर्यावरण के बदलते मिजाज की एक चेतावनी और सूने बागानों की एक मूक सिसकी बनकर।

Tuesday, 14 April 2026

विकास के पर्याय: एक 'कर्मयोगी' के युग का समापन और मेरी पत्रकारिता के कुछ अनछुए पन्ने और नीतीश कुमार


बिहार की राजनीति के एक युग का समापन! मेरे संस्मरणों के जरिए जानिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'मुन्ना' से 'कर्मयोगी' बनने का सफर। रेलवे सुधार, मरीन ड्राइव और मेट्रो जैसे विकास कार्यों से लेकर 10 बार शपथ लेने के बेदाग रिकॉर्ड तक, बिहार के पुनर्जागरण की अनकही कहानी।"

तरुण कुमार कंचन

बिहार की सियासत में आज एक अध्याय नहीं, बल्कि एक युग का समापन हो रहा है। राजनीति की बिसात पर शह और मात के खेल तो चलते रहेंगे, लेकिन जो विरासत पीछे छूट रही है, उसकी गूंज आने वाली कई सदियों तक सुनाई देगी। आज जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पद से विदा ले रहे हैं, तो मेरी आँखों के सामने एक 'नेता' नहीं, बल्कि एक *'कर्मयोगी'* का अक्स उभर रहा है। यह रिपोर्ट उस राजनेता के नाम है जिसने बिहार की मिट्टी को विकास के सपनों से सींचा।

स्मृतियों के झरोखे से: 'प्रभात खबर' के वे दिन और 'मुन्ना' का विजन

एक पत्रकार के रूप में मेरा सफर कई ऐतिहासिक क्षणों का गवाह रहा है। मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं *'प्रभात खबर'* पटना में एक युवा रिपोर्टर के रूप में अपनी कलम को धार दे रहा था। वह दौर था जब नीतीश जी श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में रेल मंत्री बनकर पहली बार बिहार आए थे।

मुझे सौभाग्य मिला पटना से लेकर उनके पैतृक क्षेत्र *बाढ़ और बख्तियारपुर* तक के कार्यक्रमों को कवर करने का। उसी यात्रा के दौरान मैंने जाना कि बख्तियारपुर की गलियां उन्हें आज भी प्यार से 'मुन्ना' कहती हैं। लेकिन उस 'मुन्ना' के इरादों में हिमालय जैसी अडिगता थी।

 रेलवे में क्रांति: उस दौर में रेल डकैतियां और असुरक्षा बिहार की पहचान बन चुकी थी। नीतीश जी ने न केवल सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि इस्लामपुर रेल लाइन को पुनर्जीवित कर और बाढ़ में NTPC जैसे विशाल प्रोजेक्ट लाकर यह साबित कर दिया कि 'विजन' किसे कहते हैं।

 विकास का महापथ: सड़क से मेट्रो तक का सफर

नीतीश कुमार के शासनकाल को भविष्य में 'बिहार के बुनियादी ढांचे के पुनर्जीगरण' के रूप में पढ़ा जाएगा। उन्होंने सिर्फ फाइलें नहीं दौड़ाईं, बल्कि जमीन पर लकीरें खींचीं।

 सड़कों का जाल: बिहार के सुदूर गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। राजद के कार्यकाल में जहां सड़कों पर बोर्ड टांग दिया गया था कि यह सड़क केंद्र सरकार की है, आज वहां चमचमाती सड़क पर सरपट गाड़ियां दौड़ रही हैं।

 गंगा पथ (मरीन ड्राइव): पटना की जिस गंगा के किनारे कभी सन्नाटा पसरा रहता था, आज वहां का 'मरीन ड्राइव' शहर की लाइफलाइन बन चुका है। यह उनके आधुनिक बिहार का हस्ताक्षर है।

 मेट्रो रेल: पटना की सड़कों पर मेट्रो का सपना आज उन्हीं की जिजीविषा के कारण हकीकत में बदल रहा है।

सुशासन और बेदाग व्यक्तित्व: रिकॉर्ड 10 बार शपथ

भारतीय राजनीति के इतिहास में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना कोई सामान्य घटना नहीं है। सत्ता के शीर्ष पर इतने लंबे समय तक रहने के बाद भी, उनके दामन पर भ्रष्टाचार का एक छींटा तक न होना उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। उनकी शुचिता और ईमानदारी आज के दौर में दुर्लभ है।

"पद तो आते-जाते रहते हैं, पर जो कार्य पत्थर की लकीर बन जाएं, वही इतिहास में दर्ज होते हैं।"

 अंतिम क्षण तक कर्तव्यनिष्ठा: 'कर्मयोगी' का विदाई संदेश

आज जब उनके इस्तीफे की खबरें चारों ओर हैं, तब भी नीतीश जी का 'कर्मयोगी' स्वरूप अडिग दिखा। आज की सुबह भी उन्होंने सबसे पहले *बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर* की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और तुरंत कैबिनेट की बैठक में जुट गए। यह दर्शाता है कि उनके लिए समय का हर एक कतरा बिहार की सेवा के लिए है, विदाई के शोक के लिए नहीं।

बिहार का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, वह नीतीश कुमार के जिक्र के बिना अधूरा होगा। उन्होंने एक पिछड़े राज्य की पहचान को बदलकर उसे विकास की मुख्यधारा में खड़ा किया। उनकी कार्यक्षमता और सोच को मेरा शत-शत नमन।

धन्य है उनकी सोच और वंदनीय है उनकी कार्यक्षमता!

जय हिंद, जय बिहार!


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Wednesday, 1 April 2026

बिहारशरीफ भगदड़: लालच और मनमानी से उपजा अपराध है जिसने छीनी 8 जानें

 



आस्था के नाम पर अत्याचार! बिहारशरीफ के शीतला मंदिर हादसे में 8 मौतें: चढ़ावे के लालच में पंडा-पुजारियों की मनमानी और श्रद्धालुओं पर अमानुषिक व्यवहार। जानें व्यवस्था पर चोट करती पूरी रपट।

Tarun Kumar Kanchan

मुजफ्फरपुर ।  मंदिर वह पवित्र स्थान जहाँ मनुष्य शांति और आस्था की तलाश में आता है। मंगलवार को बिहारशरीफ के शीतला मंदिर में हुए हृदयविदारक हादसे ने इस पवित्र भावना पर गहरी चोट की है। यह घटना स्पष्ट करती है कि मंदिर को जब धर्मस्थल से बदलकर ‘कमाई का स्थान’ बना दिया जाता है, तो इसके भयंकर परिणाम सामने आते हैं। कल की घटना में जो वीभत्स सच्चाई सामने आई है, उसने पंडा-पुजारी की गरिमा को तार-तार कर दिया है और सनातन आस्था में यकीन रखने वाले हर व्यक्ति को परेशान किया है।

व्यवस्था बनाने वालों ने ही बिगाड़ी व्यवस्था





हादसे की असल जड़ भगदड़ नहीं, बल्कि मंदिर की व्यवस्था में किया गया घिनौना व्यवधान और अमानुषिक व्यवहार था। पुलिस की एफआईआर और चश्मदीदों के बयान पंडा समाज के लोगों पर सीधे उंगली उठाते हैं:

बांस का बैरियर और वसूली: गर्भगृह में जाने के मार्ग पर एक बांस बांध दिया गया था, जिसका एकमात्र उद्देश्य कथित तौर पर रुपये लेकर विशेष पूजा करवाना था। यह अवरोध ‘चढ़ावे’ के लिए लगाया गया था, जिसने लोगों को मजबूर किया। जब श्रद्धालु इस बांस को उठाकर अंदर घुसने का प्रयास कर रहे थे, तो महिलाओं के साथ मारपीट की गई। तभी सीढ़ियों पर महिलाएं बेहोश होकर गिर गईं।

महिलाओं पर बर्बरता: सबसे शर्मनाक पहलू वह है कि सीसीटीवी फुटेज में कुछ पंडा श्रद्धालुओं पर डंडा चलाते हुए भी दिखे हैं। पूजा के नाम पर वसूली और भीड़ प्रबंधन के नाम पर डंडे का इस्तेमाल आस्था पर किया गया क्रूरतम प्रहार है और देश के सभी मंदिरों से यह बंद होनी चाहिए।

जानबूझकर अवरोध: एफआईआर में साफ दर्ज है कि पुजारियों द्वारा जान-बूझकर मंदिर परिसर में चढ़ावा के लिए लगाए गए अवरोध के कारण यह हादसा हुआ। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लालच और मनमानी से उपजा अपराध है, जिसने आठ निर्दोष श्रद्धालुओं की जान ले ली।

गरिमा का पतन और आस्था का संकट

 पंडा-पुजारियों का काम भगवान और भक्त के बीच सेतु बनना होता है, न कि बाज़ार लगाना। जब वे खुद पैसे लेकर पूजा कराने और भक्तों को डंडे मारने जैसे कृत्यों में शामिल होते हैं, तो उनकी गरिमा पूरी तरह खत्म हो जाती है। यदि लोग भगवान के आसपास ऐसे अमानुषिक व्यवहार और जबरदस्ती देखेंगे, तो आस्थावान लोग मंदिर से दूर हो जाएंगे। मंदिर को कमाई का केंद्र बनाकर, इन लोगों ने सनातन धर्म की मूल भावना को ठेस पहुंचाई है।

सरकार को सख्त कदम उठाने की ज़रूरत

इस दर्दनाक घटना ने व्यवस्था पर गंभीर चोट की है। सरकार और मंदिर प्रशासन को अब निर्णायक कदम उठाने होंगे।

वीआईपी दर्शन तुरंत बंद हो : सबसे पहले, वीआईपी दर्शन की व्यवस्था को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए। भगवान के दरबार में सभी समान हैं, और यह वीआईपी कल्चर ही ऐसी अव्यवस्थाओं को जन्म देता है।

भ्रष्टाचार पर नकेल: मंदिर प्रबंधन को पूर्णतः पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जाना चाहिए। ‘चढ़ावे’ के नाम पर की जाने वाली किसी भी प्रकार की जबरन वसूली या मनमानी पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

कानून का डंडा: मघड़ा हादसे में चार पुजारियों की गिरफ्तारी और 20 नामजद पर केस दर्ज होना केवल शुरुआत है। इस जघन्य कृत्य के जिम्मेदार सभी लोगों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि आस्था के केंद्र में अत्याचार स्वीकार्य नहीं है।

मंदिरों को धर्मस्थल रहने दीजिए। उन्हें पैसे कमाने और सत्ता का प्रदर्शन करने का स्थान मत बनाइए। यही समय है कि आस्था के नाम पर हुए इस अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए और सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी भक्त को ऐसे भयावह हादसे का शिकार न होना पड़े।

 


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Tuesday, 24 March 2026

स्कूल की बेंच पर मौत का तांडव: शिक्षिकाएं सोती रहीं और मर गई स्मृति; कंचनवाणी की विशेष रिपोर्ट


 
सीतामढ़ी के सोनबरसा में एक 'पंखेके विवाद ने ली 11 साल की मासूम स्मृति की जान। क्या हमारे स्कूल सुरक्षित हैं? 'कंचनवाणीकी इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें घटना का पूरा सचशिक्षकों की लापरवाही और बच्चों में बढ़ती हिंसा पर मनोवैज्ञानिकों का बड़ा विश्लेषण।

Tarun Kumar Kanchan

मुजफ्फरपुर। बिहार के सीतामढ़ी से एक ऐसी खबर आई है, जिसने न केवल शिक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी हैं, बल्कि सभ्य समाज की आत्मा को भी झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ हम बच्चों को देश का भविष्य कहते हैं, उन्हें 'कलम' पकड़ना सिखाते हैं, लेकिन सीतामढ़ी के सोनबरसा स्थित एक सरकारी स्कूल में जो हुआ, वह बताता है कि हमारे बच्चे अब 'कत्ल' की भाषा सीखने लगे हैं।

यह महज एक झगड़ा नहीं था, यह एक मासूम की उसके ही सहपाठियों द्वारा की गई 'संस्थागत हत्या' है, जहाँ स्कूल के शिक्षक मूकदर्शक बने रहे।

एक पंखा, दो गुट और एक मासूम की मौत

मामला सोनबरसा थाना क्षेत्र के सहोरबा मध्य विद्यालय का है। सोमवार की दोपहर, क्लासरूम का माहौल सामान्य था, लेकिन तभी कक्षा चौथी और पांचवीं की छात्राओं के बीच 'पंखा चलाने' को लेकर विवाद शुरू हो गया।

·       मामूली विवाद, भयानक अंत: गर्मी के मौसम में पंखे की हवा किसे मिले, यह बहस इतनी बढ़ी कि पांचवीं कक्षा की दो छात्राओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने चौथी कक्षा की 11 वर्षीय स्मृति कुमारी पर हमला बोल दिया।

·       बर्बरता की हद: यह कोई साधारण धक्का-मुक्की नहीं थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे बताते हैं कि स्मृति के सिर, गले और बांह पर गहरे जख्म थे। आशंका है कि उसे दीवार से दे मारा गया या किसी घातक वस्तु से सिर पर वार किया गया। मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, मासूम स्मृति की नाक से खून बह रहा था।

·       सिस्टम की नींद: जब यह सब हो रहा था, स्कूल की शिक्षिकाएं कहाँ थीं? एफआईआर के अनुसार, शिक्षकों ने कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया। क्या क्लासरूम में कोई सुपरविजन नहीं था?

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: घायल बच्ची को कंधे पर उठाकर ले गए सहपाठी



इस घटना का सबसे काला अध्याय मारपीट के बाद शुरू हुआ। स्कूल प्रशासन ने घायल स्मृति को तुरंत अस्पताल पहुँचाने की जहमत नहीं उठाई।

जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) राघवेन्द्र मणि त्रिपाठी ने माना है कि यह गंभीर लापरवाही है। घायल स्मृति को प्राथमिक उपचार देने के बजाय, शिक्षकों ने उसे अन्य बच्चों के साथ घर भेज दिया। परिजन जब स्कूल पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि अन्य बच्चे घायल स्मृति को कंधे पर उठाकर ला रहे थे। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को रुला देने के लिए काफी है।

परिजन उसे सीतामढ़ी ले गए, जहाँ से उसे पीएमसीएच, पटना रेफर कर दिया गया। लेकिन, तकदीर को कुछ और ही मंजूर था, पटना पहुँचने से पहले ही स्मृति ने रास्ते में दम तोड़ दिया। मंगलवार को पिता ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद हड़कंप मचा।

एक पिता की चीख और न्याय की गुहार

मृतका के पिता जितेंद्र राय ने दो छात्राओं के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई है। एफएसएल (FSL) की टीम और पुलिस जांच में जुटी है। लेकिन सवाल वही खड़ा है— क्या एफआईआर और जांच उस मासूम की जान वापस ला पाएगी? क्या स्मृति की मौत के बाद भी स्कूल और समाज अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे?

मनोवैज्ञानिक पक्ष: मासूम हाथों में इतनी हिंसा क्यों?

'कंचनवाणी' ने इस खौफनाक व्यवहार की तह तक जाने के लिए प्रमुख मनोवैज्ञानिकों से बात की। आखिर 10-12 साल की बच्चियां इतनी हिंसक कैसे हो सकती हैं?

1. 'इम्पल्स कंट्रोल' और डिजिटल पॉइजनिंग:

"आजकल के बच्चे डिजिटल युग में जी रहे हैं। मोबाइल गेम्स और अनियंत्रित सोशल मीडिया कंटेंट ने हिंसा को 'नॉर्मलाइज' (सामान्य) कर दिया है। बच्चों के दिमाग में आवेग को नियंत्रित करने (Impulse Control) की क्षमता कम हो रही है। उन्हें लगता है कि गुस्सा आने पर हिंसा करना ही एकमात्र समाधान है।"डॉ. अनीता वर्मा, वरिष्ठ बाल मनोवैज्ञानिक

2. भावनात्मक अशिक्षा और Conflict Resolution का अभाव:

"हम बच्चों को गणित और विज्ञान तो सिखा रहे हैं, लेकिन भावनाओं को संभालना नहीं सिखाते। Conflict Resolution (विवाद सुलझाना) हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। जब स्कूल और घर में संवाद (Communication) की कमी होती है, तो बच्चे अपनी हताशा को शारीरिक हिंसा के रूप में व्यक्त करते हैं।"डॉ. आर. के. सिन्हा, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह घटना दर्शाती है कि समाज और शिक्षा तंत्र बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को संभालने में पूरी तरह विफल रहा है।

बच्चों के इस व्यवहार के पीछे 3 मुख्य कारण:

1.     स्क्रीन एडिक्शन: हिंसक कार्टून और वीडियो गेम्स का असर।

2.     संवाद की कमी: माता-पिता और शिक्षकों का बच्चों की भावनाओं को न समझ पाना।

3.     Conflict Resolution का अभाव: बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि बिना लड़े अपनी बात कैसे मनवाएं या विवाद कैसे सुलझाएं।

दोषियों पर शिकंजा और उठते सवाल

·       कानूनी कार्रवाई: सदर एसडीपीओ आशीष आनंद के नेतृत्व में पुलिस और एफएसएल (FSL) की टीम ने स्कूल पहुंचकर जांच की है। मृतका के पिता जितेंद्र राय ने दो नामजद छात्राओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है।

·       प्रशासनिक कार्रवाई: डीईओ ने प्रधानाध्यापक समेत सभी शिक्षकों से 24 घंटे में स्पष्टीकरण मांगा है। एक तीन सदस्यीय जांच समिति (डीपीओ स्थापना मनीष कुमार सिंह की अध्यक्षता में) गठित की गई है, जो लापरवाही और सूचना न देने के कारणों की जांच करेगी।

कंचनवाणी का नजरिया

सीतामढ़ी की यह घटना एक रेड सिग्नल है। यह केवल एक स्कूल की कहानी नहीं है, यह हमारे घर, हमारे समाज और हमारी शिक्षा नीति का आईना है। अगर हम आज नहीं जागे, अगर हमने बच्चों के बैग के बोझ के साथ-साथ उनके मानसिक बोझ को कम करने का प्रयास नहीं किया, और अगर स्कूलों को केवल परीक्षा केंद्र के बजाय भावनात्मक केंद्र नहीं बनाया, तो ऐसी और 'स्मृतियाँ' व्यवस्था की भेंट चढ़ती रहेंगी।

आज जरूरत है कि स्कूलों में 'काउंसलिंग' अनिवार्य हो, शिक्षकों को संवेदनशील बनाया जाए और बच्चों को 'पंखा' चलाने के लिए नहीं, बल्कि 'इंसानियत' चलाने के लिए प्रेरित किया जाए।


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सीतामढ़ी स्कूल में छात्रा की मौत का सच, क्यों हिंसक हो रहे हैं स्कूली बच्चे, सहोरबा मध्य विद्यालय घटना जांच।


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