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Friday, 13 February 2026

संत कुमार माट्साब: स्मृतियों के झरोखे से एक निश्छल व्यक्तित्व

 
शिक्षक दिवस विशेष संस्मरण कंचनवाणी

यह एक अत्यंत भावुक और जीवंत संस्मरण है। डॉ. रोहिताश्व दुबे जी ने संत कुमार दुबे उर्फ माट्साब के व्यक्तित्व को जिस बारीकी और आत्मीयता से उकेरा है, वह दिल को छू लिया। समर्पित शिक्षक, जिनके 'कंगारू खेल', लोकगीत और ताश की महफिलों के किस्से आज भी जीवंत हैं। कंचनवाणी पर पढ़िए जीवन के अनछुए पहलुओं को समेटती यह अनूठी कहानी।

डॉ रोहिताश्व दुबे 

लेखक: डॉ. रोहिताश्व दुबे (अवकाश प्राप्त अध्यापक, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय)

जमुई । संत कुमार माट्साब के स्मरण मात्र से ही एक ऐसा संपूर्ण जीवन वृत्त स्मृति पटल पर कौंध जाता है, जिसे याद कर मन सुकून से भर जाता है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जिसने जीवन भर सबको हंसाया, कभी किसी को रुलाया नहीं।


बचपन की यादें और शिक्षा का सफर
मुझे याद है जब वे दसवीं-ग्यारहवीं के छात्र थे और मैं प्राथमिक कक्षा में था। उन्हें खाकी पैंट पहनकर हाई स्कूल जाते देखना आज भी याद है। मैट्रिक पास करने के बाद ही वे गांव के मिडिल स्कूल में शिक्षक के रूप में सेवा देने लगे। अरुण के घर में सुबह-सुबह बच्चों को पढ़ाना। मां मुझे भी भेज देती थी। मेरा वहां पढ़ने जाना, जीवन के वे शुरुआती पाठ थे जो आज भी जेहन में ताजा हैं। उनकी शादी की थोड़ी थोड़ी याद है। संभवतः 1959-60 में उनकी शादी हुई थी।
अभी हाल में गिद्धौर होते हुए देवघर जा रहा था तो मेरा ध्यान एक पुराने परित्यक्त विद्यालय भवन पर गया। सहसा स्मरण हो आया, अरे वह वही शिक्षक शिक्षा स्कूल है जहां एक जमाने में उमेश माट्साब और संत कुमार माट्साब ने ट्रेनिंग किया था। हमलोग किसी समारोह में लोटन (उनकी ससुराल, जो जमुई जिला में है) गए हुए थे, वहीं से प्लान बना कि वह स्कूल चला जाए जहां ये लोग उस समय ट्रेनिंग कर रहे थे। क्लास होते, खाना बनते सब देखा था।
मैं 1963-64 में मिडल स्कूल में था। स्वाभाविक था उस दौर की 'नई तालीम' और अनुभव से लैस होकर जब वे लौटे, तो स्कूल का परिवेश ही बदल गया। उन्हें खेल-कूद का इंचार्ज बनाया गया और फिर शुरू हुआ गतिविधियों का एक अनूठा दौर।


खेल, प्रहसन और 'कंगारू' की छलांग
माट्साब बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि खेल-खेल में जीवन सिखाते थे। उनके सिखाए खेल जैसे 'रुमाल झपट्टा' जिसमें चारों तरफ गोल बैठकर एक लड़के को किसी के पीछे रुमाल रखने कहा जाता। उसके इंटेलीजेंस पर निर्भर करता था यह जानना कि उसके पीछे ही रुमाल रखा गया है और वह उठ जाए, वरना उसकी पीठ पर धम धम (हल्के से) होने लगता। दूसरा खेल वृत्त में बैठे रहकर ही एक बढ़िया सा गाना गाते। उनके गाए गीत आज भी कानों में गूंजते हैं:
"लंबे-लंबे ताड़ के पेड़ लागे हैं हजार रे... धड़ है इसका मोटा धड़, झुपे हनुमान रे..."
उनका एक प्रहसन तो मैं आज भी अपने मित्रों को सुनाता हूं:
"मुक्का मार बताशा फोड़ूं, तोड़ूं कच्चा सूत।
मक्खी का भुजदण्ड उखारूं, मैं सच्चा रजपूत।।"
मनोरंजन का आलम यह था कि वे स्वयं 'कंगारू' बनकर बच्चों को छलांग लगाना सिखाते थे। जैसा कि बतलाया जा चुका है ट्रेनिंग से लौटने के बाद माट्साब तरह के खेल छात्रों को खेलाया करते। उनमें से एक ऑस्ट्रेलियन पशु कंगारू से संबंधित था। वे स्वयं कंगारू बनकर छात्रों को बताते कि कंगारू कैसे छलांग लगाता है। इसके लिए क्लास रूम में ही दो टेबल का प्रबन्ध किया जाता। एक टेबल से दूसरे टेबल पर छलांग लगाते थे। हमलोगों का खूब मनोरंजन होता था।
इसी सिलसिले में एक बार स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर मिडल स्कूल के गेट के बाहर केरवा आम के नीचे आयोजन में मास्टर साहब ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत कंगारू का खेल दिखाया था, जिसमें एक टेबल से दूसरे टेबल पर कूदने पर टेबल के उलटने की नौबत आ गई थी। खैर बाल -बाल बच गए थे।
कर्तव्यनिष्ठा और सहजता
वे काम के प्रति भी उतने ही समर्पित थे। मुझे याद है, उन दिनों इंटरनल असेसमेंट सिस्टम लागू था। संपूर्ण परीक्षा का आधा अंक असेस्मेंट पर आधारित होता था। स्कूल में रिज़ल्ट निकालना था, मगर टेबुलेशन का काम अभी हो नहीं पाया था। संत कुमार माट्साब मुझे रात का खाना खाकर स्कूल चलने कहा। एक बजे रात तक असेस्मेंट के अंकों का टेबुलेशन सम्पन्न किया था।
खेल के मैदान पर भी उनकी सहजता देखते ही बनती थी। माट्साब नियमित रूप से ढिबरा पर फुटबाल खेल में भी शामिल होते थे। एकबार गेंद के बजाय देवनारायण भगत ने उनके पैर में जोर से मार दिया था। माट्साब ' है ...' कहते पैर पकड़ते हुए बैठ गए थे। फणींद्र ने कहा था," चोटा (चोट) जोर से लगले"। हम लोगों को अन्दर से हँसी भी आ रही थी। देवनारायण अफसोस व्यक्त करने लगा। जानबूझकर तो उसने नहीं ही मारा था। माट्साब अगले ही पल उतनी ही सहजता से उठ खड़े हुए। उनके भीतर किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं था।



आस्था और विश्वास का संबल
माट्साब को कुछ पारंपरिक मंत्र-विद्या की भी जानकारी थी। यद्यपि मैं इन चीजों पर व्यक्तिगत रूप से बहुत भरोसा नहीं करता, लेकिन जैसा कि कहा गया है—'विश्वासो फलदायकम्'। मेरे बेटे सोनू (अभिनव आनन्द) का प्रारम्भिक 2-3 वर्ष गांव में बीता। जब थोड़ा ज्यादा रोया तो मैया (मां ) परेशान हो जाती थी और वह संत कुमार माट्साब के पास दौड़े-दौड़े जाती और अपनी व्यथा सुनाती। माट्साब आकर कुछ मंत्र पढ़ते हुए माथा पर हाथ रख देते बस सब बलैया रफूचक्कर। मैया की सब चिंता दूर। यह क्रम बराबर चलता रहता। सोनू से चर्चा करते हुए हमलोग आज भी आनंदित हो जाते हैं। इससे माँ को परम शांति मिलती थी।
ताश की महफ़िल और 'घी में मूंछ'
संत कुमार माट्साब की चर्चा हो और ताश की चर्चा नहीं हो ऐसा हो नहीं सकता। सबल बीघा में ताश के वे केंद्र थे। ताश के खेल में बहुत लोग शामिल होते थे जैसे - नुनुभाई (डॉ छेदी दुबे), महेन्द्र दुबे, रामदेव दुबे, जयकांत दुबे, त्रिपुरारी दुबे, राजेन्द्र मिश्र आदि। हमारी पीढ़ी के लोग भी शामिल होते थे। गर्मी में किसी के बंगले पर, जाड़े में धूप में चटाई बिछाकर या पुआल पर। माट्साब खा पीकर ताश लेकर खिलाड़ियों की तलाश में निकल पड़ते। उस दिन उनकी स्थिति दयनीय सी दिखती जिस दिन लोग जमा नहीं होते। ताश खेलने का तरीका भी उनका अजूबा था। सिर्फ दो रंग के भरोसे 22-23 की बोली लगा बैठते। काला पान की तिग्गी का सीट निकल जाता। जब उनका गोधा (खेल का साथी) खीज व्यक्त करता तो कहते, जमीन बिक रही है क्या? जब रंग की तीन पत्ती आ जाती तो हाल पूछने पर मूंछ पर ताव देते हुए कहते,"घी में मूंछ है '। सुना है, किसी की प्रिय वस्तु को उसकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध में तर्पण किया जाता है। क्या बानो ( माट्साब का बेटा) ऐसा करेगा?
अंतिम मुलाकात: स्मृतियों का धुंधलका
अक्टूबर 2023 में जब मैं उनसे मिलने गया, वे होश-बेहोश की स्थिति में थे। देवघर में सुरेश दुबे के श्राद्ध के दिन (उसी दिन मिथिलेश, कमलेश की मां का भी निधन हुआ था) मैं माट्साब से मिलने गया था। कभी होश में रहते कभी बेसुध हो जाते। जब मैं मिलने पहुंचा तो वे होश में नहीं थे। मगर बात करते -करते वे होश में आ गए। उन्हीं का गाना "लम्बे लंबे ताड़ के पेड़... सुनाने पर उन्होंने आगे का हिस्सा स्वयं पूरा कर दिया ।
उनकी आंखों में सुनहरे अतीत की चमक थी, पर होंठों पर एक दर्द भरी सच्चाई— "अब उ जमाना नै लौटते हो" (अब वह जमाना नहीं लौटेगा)
गत 30 नवम्बर 2025 को मैं फिर उनसे मिलने गया था। धूप में बैठे ठीक लग रहे थे। उनकी जीवनसंगिनी (भौजी) भी वहीं पास बैठी थीं। मगर माट्साब चेतना शून्य थे। लिखकर अपना नाम दिया तब भी पहचान नहीं पाए। बहुत पीड़ा हुई। पास में बैठी भौजी झुंझला गईं। उस झुंझलाहट में भी एक गहरा दुख और रुदन छिपा था। मुझे इतना संतोष है कि उनसे अंतिम दर्शन मेरा हो गया।
शायर की ये पंक्तियां उन पर सटीक बैठती हैं:
कल तो कहते थे कि उठकर चल नहीं सकते।
आज हिम्मत यह कि आप दुनिया से उठकर चल दिए।।
संत कुमार माट्साब भौतिक रूप से भले ही चले गए हों, पर उनकी निश्छलता, वे खेल, वे गीत और वह 'घी में मूंछ' वाली मुस्कान हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगी। उनकी स्मृति को कोटिश: नमन 🌹 🙏


 
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संत कुमार माट्साब संस्मरण, कंचनवाणी, Kanchanwani Blog, डॉ. रोहिताश्व दुबे
भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर, शिक्षक की यादें, पुराने दिनों के खेल, संस्मरण लेखन, सबल बीघा की यादें, ग्रामीण शिक्षक का जीवन, प्रेरणादायक जीवन गाथा।
संत कुमार माट्साब: एक शिक्षक और मार्गदर्शक


Tuesday, 10 February 2026

वह 'भरोसा' अब मौन है: एक पिता, एक गुरु और वो आखिरी हुंकार

Sant Kumar Dubey Jamui Teacher Obituary"

मेरे पिता और आदर्श शिक्षक श्री संत कुमार दुबे का 86 वर्ष की आयु में निधन। जमुई के सिकंदरा क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने वाले एक मानिंद व्यक्तित्व के प्रेरक जीवन, अनुशासन और अंतिम संघर्ष की भावुक कहानी। पढ़िए कंचनवाणी पर एक विशेष संस्मरण।

तरुण कुमार कंचन
ओम व्यास की पंक्तियां — "पिता हैं तो दुनिया के सारे खिलौने अपने हैं।" आज जब पिता श्री संत कुमार दुबे जी का साया सिर से उठा है, तो अहसास हो रहा है कि खिलौने तो दूर, यह पूरी दुनिया ही अब पराई और असुरक्षित लगने लगी है। वह भरोसा, जो उनके होने मात्र से मिलता था, अब एक गहरे सन्नाटे में तब्दील हो गया है।


विपदा की घड़ी और पिता का वो 'चमत्कार'
अभी कुछ ही समय बीता है जब मैं अपने जीवन के सबसे काले दौर से गुजर रहा था। लाखों की कोशिश और दिन-रात की भाग-दौड़ के बावजूद मेरी पत्नी रीना कंचन कैंसर की बेरहम पकड़ से दूर होती जा रही थी। घर में मातम जैसा सन्नाटा था। पिता जी स्वयं अल्जाइमर और ढलती उम्र की व्याधियों से जूझ रहे थे। वे सुध-बुध खो चुके थे।
लेकिन एक दिन जो हुआ, वह ईश्वर के साक्षात दर्शन जैसा था। बेसुध पड़े पिता जी अचानक बिस्तर से उठ बैठे। उनकी आँखों में वही पुरानी चमक और आवाज़ में वही शिक्षक वाली खनक लौटी।

 
उन्होंने मुझे देखा और दृढ़ता से कहा— "तुम चिंता मत करो। मैं अभी जिंदा हूँ। तुम्हें जो जरूरत होगी, मैं पूरी करूँगा।"
इतना कहकर वे फिर बिस्तर पर लेट गए। कमरे में बैठे सगे-संबंधी और मैं, सब अवाक थे। वह इंसान जो खुद चलने में असमर्थ था, वह अपने बेटे को पूरी दुनिया से लड़ने का हौसला दे रहा था। आज देवघर के अस्पताल में उनकी अंतिम सांस के साथ मेरा वही 'अंतिम भरोसा' भी चला गया। अब कौन कहेगा कि 'मैं अभी जिंदा हूँ'?



अनुशासन का वो दिव्य ज्ञान
पिता जी केवल पिता नहीं, एक कालजयी शिक्षक भी थे। उनके प्यार की थपकियाँ जितनी कोमल थीं, उनके शब्दों के वाण उतने ही सटीक। बात 1982-83 की है, जब मैं सिकंदरा हाईस्कूल का अल्हड़ किशोर था। 15 जनवरी का दिन था, कुंडग्राम (भगवान महावीर की जन्मस्थली) की पहाड़ियों पर मेला लगा था।
गांव की एक महिला जो रिश्ते में दादी लगती थीं । उनके साथ निकलते वक्त मैंने उत्साह में सब्जी का बर्तन थाम लिया था। मेले की भीड़ में दादी बिछड़ गईं और मैं अपने साथियों के साथ 'जन्मस्थान' के जंगलों में चला गया। घंटों इंतजार के बाद, जब भूख लगी, तो हम साथियों ने मिलकर वह सब्जी चट कर दी। शाम को जब घर लौटा, तो रास्ते में पिता जी मिले। उन्होंने कोई डांट-फटकार नहीं की, बस मेरी आँखों में आँखें डालकर एक वाक्य कहा:
"तुमसे ऐसी उम्मीद ना थी और ना है।"

वे शब्द आज 40 साल बाद भी मेरे कानों में गूँजते हैं। उन सात शब्दों ने मुझे वह अनुशासन और नैतिक बोध दिया, जिसे दुनिया की कोई किताब नहीं सिखा सकती थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि जिम्मेदारी का अर्थ केवल बर्तन उठाना नहीं, बल्कि उस भरोसे को निभाना है जो किसी ने आप पर किया है।


विदाई एक युग की
31 जनवरी को फर्श पर गिरने के बाद से वे संघर्ष कर रहे थे। आज सोमवार को 86 वर्ष की आयु में उन्होंने विष्णुलोक की यात्रा प्रारंभ की। जमुई और सिकंदरा में उन्होंने हज़ारों बच्चों का भविष्य संवारा। लछुआड़ मध्य विद्यालय से उनकी सेवानिवृत्ति केवल कागजी थी, वे आजीवन शिक्षक रहे।
मेरे भाई यतीन्द्र, सत्येंद्र व अमरेंद्र और हमारी बहनें बिंदु, सिंधु और निधि उसी संस्कार की पूंजी पर खड़ी हैं जो उन्होंने हमें दी।
पिता जी, आपकी शारीरिक कमी हमेशा खलेगी, लेकिन विपदा में आपकी वह आवाज— "मैं अभी जिंदा हूँ"— ताउम्र मेरा संबल बनी रहेगी।
श्रद्धांजलि:
पूज्य पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को शांति प्रदान करे।


विवरण:
नाम: श्री संत कुमार दुबे
परिचय: अवकाश प्राप्त शिक्षक, समाजसेवी
आयु: 86 वर्ष
निधन तिथि: सोमवार
निधन स्थान: सदर अस्पताल, देवघर

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Keywords
श्री संत कुमार दुबे निधन
तरुण कुमार कंचन कंचनवाणी
जमुई समाचार (Jamui News)
सिकंदरा जमुई शिक्षक निधन
Sant Kumar Dubey Obituary
वरिष्ठ पत्रकार तरुण कुमार कंचन के पिता
सबल बीघा मध्य विद्यालय जमुई
लछुआड़ मध्य विद्यालय सेवानिवृत्त शिक्षक
जमुई के आदर्श शिक्षक
पिता पर भावुक संस्मरण
अमरेंद्र कुमार दुबे पत्रकार
देवघर सदर अस्पताल समाचार 



Tuesday, 3 February 2026

बिहार के आसमान पर खतरनाक संकट, बर्ड फ्लू का साया: भागलपुर में पुष्टि के बाद कटिहार में हड़कंप

 

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बिहार में बर्ड फ्लू का अलर्ट! भागलपुर के बाद अब कटिहार में भी कौवों की रहस्यमयी मौत। क्या H5N1 वायरस से बढ़ रहा है खतरा? कंचनवाणी की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें पूरी सच्चाई, बचाव के उपाय और प्रशासन की तैयारी।

"मुजफ्फरपुर : बिहार के आसमान पर इस समय संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भागलपुर के नवगछिया में पिछले दिनों हुई 150 से अधिक कौवों की रहस्यमयी मौत ने अब एक डरावनी सच्चाई का रूप ले लिया है। भोपाल और पटना की हाई-टेक लैब से आई रिपोर्टों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इन मौतों के पीछे H5N1 वायरस (Avian Influenza) है। भागलपुर में संक्रमण की पुष्टि होने के तुरंत बाद अब पड़ोसी जिले कटिहार में भी पक्षियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है, जिससे पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मच गई है।

भागलपुर से शुरू हुआ मौत का सिलसिला
घटना की शुरुआत 11 जनवरी को हुई थी, जब नवगछिया अनुमंडल परिसर में कचहरी और आसपास के पेड़ों के नीचे सैकड़ों कौवे मृत पाए गए थे। उस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, इसलिए विशेषज्ञों का एक समूह इसे 'कोल्ड स्ट्रेस' मान रहा था। पक्षी विशेषज्ञ ज्ञानचंद ज्ञानू ने भी संभावना जताई थी कि भोजन की कमी और रसायनों के प्रभाव से ऐसा हो सकता है।
हालांकि, जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. अंजली कुमारी ने कोई जोखिम न लेते हुए सैंपल जांच के लिए भेजे। अब लैब रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि यह सामान्य मौतें नहीं बल्कि एक संक्रामक महामारी की आहट थी।


कटिहार में बढ़ता खतरा: कुरसेला बना नया केंद्र
भागलपुर के बाद अब कटिहार जिले की कुरसेला नगर पंचायत और उत्तरी मुरादपुर पंचायत से भी चिंताजनक खबरें आ रही हैं। स्टेट हाईवे 77 के पास बड़ी संख्या में कौवों के शव मिले हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई: पशुपालन विभाग की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर रसायनों का छिड़काव किया है।
मृत पक्षियों को गहरे गड्ढे खोदकर सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया गया है ताकि संक्रमण आगे न फैले।


क्या है H5N1 वायरस और यह कितना घातक है?
बर्ड फ्लू, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एवियन इन्फ्लूएंजा कहा जाता है, मुख्य रूप से पक्षियों में फैलने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है।
संक्रमण का तरीका: यह वायरस संक्रमित पक्षियों के मल, लार और नाक के स्राव के माध्यम से फैलता है।
मनुष्यों को खतरा: H5N1 एक ज़ूनोटिक (Zoonotic) वायरस है, जिसका अर्थ है कि यह पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। यदि कोई व्यक्ति संक्रमित पक्षी के सीधे संपर्क में आता है, तो उसे गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
इकोसिस्टम पर असर: कौवे हमारे पर्यावरण के 'सफाईकर्मी' माने जाते हैं। इनकी बड़ी संख्या में मौत पर्यावरण के संतुलन को भी बिगाड़ सकती है।


प्रशासन की 'किलिंग ज़ोन' और सर्विलांस रणनीति
H5N1 की पुष्टि के बाद प्रशासन ने 'जीरो सर्विलांस' नीति अपनाई है:
10 KM का घेरा: संक्रमित क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे को हाई-अलर्ट ज़ोन घोषित कर दिया गया है।
सैनिटाइजेशन: प्रभावित इलाकों में लगातार सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसे रसायनों का छिड़काव किया जा रहा है।
पोल्ट्री जांच: आसपास के सभी पोल्ट्री फार्मों से मुर्गियों के सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संक्रमण व्यावसायिक पक्षियों तक न पहुंचे।


कंचनवाणी की अपील: क्या करें और क्या न करें?
बिहार में बढ़ते खतरे को देखते हुए कंचनवाणी अपने पाठकों से सावधानियां बरतने की अपील करते हैं:
सीधे संपर्क से बचें: यदि आपको सड़क या आंगन में कोई मृत पक्षी दिखे, तो उसे न छुएं।
स्वच्छता का ध्यान: यदि आप चिकन या अंडे का सेवन करते हैं, तो उन्हें 70°C से अधिक तापमान पर अच्छी तरह पकाकर ही खाएं।
सूचना दें: किसी भी असामान्य घटना की जानकारी तुरंत पशु चिकित्सा हेल्पलाइन या स्थानीय थाने को दें।
अफवाहों से बचें: केवल आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन पर ही भरोसा करें। अफवाहों पर ध्यान ना दें । सुनी सुनाई बात इधर से उधर ना करें।

ध्यान रखें 

1. "पक्षियों की अचानक मौत, खतरे का संकेत है। बर्ड फ्लू से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक बनें।

2. "सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है! पक्षियों से दूरी रखें, सफाई का ध्यान दें। बर्ड फ्लू के खिलाफ जंग में सहयोग करें। -

3. "प्रकृति का संदेश समझें, संक्रमण को फैलने से रोकें। किसी भी मृत पक्षी की सूचना तुरंत विशेषज्ञों को दें।

अक्सर पाठकों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) और बचाव के विस्तृत दिशा-निर्देश

पाठकों की सुविधा के लिए हमने विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुछ प्रमुख सवालों के जवाब यहाँ तैयार किए हैं:
1. क्या बर्ड फ्लू इंसानों के लिए जानलेवा है?
हाँ, H5N1 वायरस इंसानों को संक्रमित कर सकता है। हालांकि इसके मामले दुर्लभ हैं, लेकिन यदि संक्रमण हो जाए तो यह गंभीर निमोनिया और श्वसन तंत्र की विफलता का कारण बन सकता है, जो घातक हो सकता है।
2. क्या इस दौरान चिकन और अंडे खाना सुरक्षित है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, चिकन और अंडों को अच्छी तरह पकाकर (70°C से अधिक तापमान पर) खाना सुरक्षित है। वायरस गर्मी में जीवित नहीं रह पाता। हालांकि, कच्चा या अधपका मांस खाने से बचें।
3. यदि घर के पास मृत पक्षी मिले तो क्या करें?
उसे भूलकर भी न छुएं। तुरंत स्थानीय पशुपालन विभाग या नगर निगम को सूचित करें। बच्चों और पालतू जानवरों को उस स्थान से दूर रखें।
4. बर्ड फ्लू के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
इंसानों में इसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं— जैसे तेज बुखार, खांसी, गले में खराश, मांसपेशियों में दर्द और सांस लेने में तकलीफ।

सावधानी के लिए चेकलिस्ट
बिहार के मौजूदा हालातों को देखते हुए इन 5 बातों का विशेष ध्यान रखें:
* मास्क का प्रयोग: यदि आप पक्षियों के बसेरे वाले इलाके में जा रहे हैं, तो मास्क और दस्ताने जरूर पहनें।
* हाथों की सफाई: बाहर से आने के बाद हाथों को साबुन या सैनिटाइजर से अच्छी तरह साफ करें।
* बाजार में सावधानी: चिकन या मछली मार्केट जाते समय विशेष सतर्कता बरतें और वहां की गंदगी के सीधे संपर्क में न आएं।
* पक्षियों को दाना: फिलहाल खुले स्थानों पर पक्षियों को दाना डालने से बचें जहाँ पक्षियों का जमावड़ा अधिक हो।
* त्वरित रिपोर्टिंग: अपने क्षेत्र में एक भी पक्षी की संदिग्ध मौत को नजरअंदाज न करें।
निष्कर्ष
भागलपुर और कटिहार की घटनाएं महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं। प्रशासन अपना काम कर रहा है, लेकिन एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अफवाहों को न फैलने दें और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सावधानी बरतें।
कंचनवाणी लगातार इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आपको हर अपडेट से रूबरू कराता रहेगा।

> "सतर्क बिहार, सुरक्षित बिहार! बर्ड फ्लू की आहट को हल्के में न लें। आपकी छोटी सी सावधानी एक बड़ी महामारी को रोक सकती है। - कंचनवाणी (Kanchanwani)"

 


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Saturday, 31 January 2026

CBI की दहलीज पर NEET छात्रा केस : ऐसे में बेटियाँ 'रूपम पाठक' बनने को मजबूर होंगी? पढ़ें विस्तृत व्याख्या

 

"NEET student suspicious death Patna CBI case"

पटना में NEET छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब CBI के पास है। क्या यह न्याय की शुरुआत है या रसूखदारों को बचाने की कोशिश? जानें रूपम पाठक कांड से लेकर नवरुणा केस तक, बिहार में न्यायिक विफलता का पूरा सच। पढ़ें Kanchanwani की विशेष रिपोर्ट।

 The case of the suspicious death of a NEET student in Patna is now with the CBI. Is this the beginning of justice or an attempt to protect influential individuals?  Learn the complete truth about judicial failures in Bihar, from the Rupam Pathak case to the Navruna case.

 मुजफ्फरपुर/पटना। । बिहार की राजधानी पटना में नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब सीबीआई (CBI) की दहलीज पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सिफारिश के बाद राज्य सरकार ने जांच का जिम्मा केंद्र को सौंपने का आग्रह किया है। लेकिन यह सवाल हवा में तैर रहा है— क्या सीबीआई जांच वाकई न्याय दिलाएगी या यह महज 'त्वरित बवालको शांत करने का एक राजनीतिक झुनझुना है?

अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने वाली पुलिस की नैतिक हार

डिप्टी सीएम और प्रदेश के गृह मंत्री सम्राट चौधरी, जो अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने का दावा करते थे, आज उनकी अपनी पुलिस 'जमीर' हार चुकी है। पटना पुलिस की लापरवाही और साक्ष्यों के साथ की गई 'लीपापोती' ने बिहार के सुशासन के दावों की पोल खोल दी है।

आरोपः डीजीपी ने आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया

जहानाबाद की रहने वाली छात्रा 5 जनवरी को पटना हॉस्टल आती है और 6 जनवरी को उसे बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। 11 जनवरी को मेदांता में उसकी मौत हो जाती है। पुलिस ने इसे पहले दिन से 'आत्महत्या' का रंग देने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब थाना प्रभारी ने जांच के बजाय ड्राइवर को हॉस्टल पता करने भेज दिया।

इस मामले में  जबर्दस्त मोड़ तब आया जब पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट ने पुलिस के दावों को ध्वस्त कर दिया। जब छात्रा के कपड़ों पर पुरुष वीर्य मिला और सामूहिक दुष्कर्म की आशंका जताई गई, तब पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था। परिजनों का आरोप है कि खुद डीजीपी ने उन पर आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया।

 किसके सामने नतमस्तक है व्यवस्था

क्या मनीष रंजन और नीलम अग्रवाल जैसे नामों को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था नतमस्तक है? एम्स को पूरे दस्तावेज क्यों नहीं दिए गए? विसरा रिपोर्ट में देरी क्यों? क्या सम्राट चौधरी की पुलिस अब सिर्फ 'सरेंडर' करना जानती है? ये वो सवाल हैं जो बिहार की हर बेटी आज सत्ता से पूछ रही है। क्योंकि इतिहास के आइने में कई अनसुलझी 'इंसाफ' की दास्तां सीबीआई की फाइलों में गुम हो गईं।

रूपम पाठक: जब व्यवस्था ने मजबूर किया

पूर्णिया की इस शिक्षिका का मामला बिहार की न्यायिक विफलता का सबसे डरावना उदाहरण है। आरोप था कि तत्कालीन विधायक राजकिशोर सिंह ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। जब हर जगह से न्याय की उम्मीद खत्म हो गई, तो रूपम पाठक ने सरेआम विधायक पर चाकू से हमला कर दिया, जिससे बाद में उनकी मौत हो गई। यह कांड याद दिलाता है कि जब तंत्र बहरा हो जाए, तो 'प्रतिशोध' जन्म लेता है।

शिल्पी जैन-गौतम हत्याकांड (1999)

पटना के इस हाई-प्रोफाइल केस ने तत्कालीन सरकार की चूलें हिला दी थीं। पटना के एक गैरेज में दो शव मिले थे। रसूखदारों के नाम आने के बाद केस सीबीआई को गया, लेकिन नतीजा 'सिफर' रहा। साक्ष्यों के अभाव में यह केस आज भी बिहार की पुलिसिया और सीबीआई जांच पर एक काला धब्बा है।

बॉबी हत्याकांड: सत्ता का रसूख और रहस्य

श्वेतनिशा उर्फ बॉबी की मौत का मामला दशकों बाद भी अनसुलझा है। इसमें सचिवालय और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के नाम उछले थे। शव को कब्र से निकालकर जांच की गई, लेकिन अंत में केस बंद हो गया। यह दिखाता है कि रसूखदारों के आगे सीबीआई के हाथ भी बंध जाते हैं।

नवरुणा चक्रवर्ती (2012) और अन्य बेटियां

मुजफ्फरपुर की नवरुणा को उसके घर से सोते समय अगवा कर लिया गया था। बरसों तक सीबीआई जांच चली, सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, लेकिन नवरुणा का क्या हुआ? कोई नहीं जानता। ठीक यही हश्र खुशी (2021) और यशी (2022) के मामलों का भी दिख रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि विश्वास करें तो किस पर?

पटना पुलिस की विफलता के बाद सीबीआई को केस सौंपना यह दर्शाता है कि राज्य की कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। यदि सीबीआई भी नवरुणा या शिल्पी जैन केस की तरह इसे फाइलों में दबा देती है, तो बिहार की बेटियों के पास 'रूपम पाठक' बनने के अलावा क्या विकल्प बचेगा? गृह मंत्री सम्राट चौधरी को जवाब देना होगा कि उनकी 'खुली छूट' क्या सिर्फ पुलिस को अपराधियों को बचाने के लिए मिली है?

दरक गया बिहार में न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा

 पटना में NEET की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत अब महज एक आपराधिक घटना नहीं रही। यह मामला धीरे-धीरे बिहार की कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर एक व्याख्यात्मक टिप्पणी बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मामले को CBI को सौंपने की सिफारिश और उसी समय पीड़ित परिवार का पटना हाईकोर्ट पहुँच जाना, इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि राज्य के भीतर न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा दरक चुका है।

आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश

सरकार का तर्क है कि CBI जांच से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन सवाल यह है कि यह फैसला शुरुआत में क्यों नहीं लिया गया। जब छात्रा 6 जनवरी को बेहोशी की हालत में अस्पताल लाई गई और 11 जनवरी को उसकी मौत हुई, तब तक पुलिस ने जिस तरह से मामले को ‘आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, उसने जांच की मंशा पर गंभीर संदेह खड़े किए। पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट आने से पहले ही निष्कर्ष तय कर लेना, और बाद में उन्हीं निष्कर्षों का बचाव करना, यह बताता है कि या तो पुलिस ने जल्दबाजी में काम किया या फिर जांच को एक निश्चित दिशा में मोड़ने की कोशिश हुई।

सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में

यही वह बिंदु है जहाँ सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में आती है। जब स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठे, जब साक्ष्य मिटाने के आरोप में थाना प्रभारी निलंबित हुई, तब CBI को केस सौंपना एक निर्णायक कदम कम और दबाव प्रबंधन ज्यादा प्रतीत होता है। इस फैसले को विपक्ष ने सरकार की हार करार दिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहना है कि जिस प्रशासनिक ढांचे पर सरकार को भरोसा होना चाहिए था, उसी की विफलता ने CBI जांच को अनिवार्य बना दिया। तेजस्वी का हमला केवल राजनीतिक नहीं है। उन्होंने नवरुणा चक्रवर्ती कांड का उदाहरण देकर उस सामूहिक स्मृति को याद दिलाया है जिसमें बिहार की कई बेटियों के मामले वर्षों तक जांच एजेंसियों के बीच घूमते रहे और अंततः फाइलों में दफन हो गए।

पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया

 यही आशंका इस मामले में भी परिजनों को सता रही है, और शायद इसी कारण उन्होंने सरकार और पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट में दायर याचिका इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम मोड़ है। इसमें सिर्फ पुलिस या सरकार ही नहीं, बल्कि हॉस्टल प्रबंधन, निजी अस्पताल, डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों को भी कटघरे में खड़ा किया गया है। यह बताता है कि परिवार को डर है कि कहीं सच्चाई कई परतों के नीचे दबा न दी जाए। एक आम नागरिक के लिए हाईकोर्ट पहुँचना आसान फैसला नहीं होता; यह तब होता है जब व्यवस्था के भीतर के सारे रास्ते बंद दिखने लगते हैं।

सबसे ज्यादा बेचैन करती पुलिस की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका सबसे ज्यादा बेचैन करती है। जांच के शुरुआती दिनों में जो लापरवाही दिखी, वह सिर्फ तकनीकी भूल नहीं कही जा सकती। जब कपड़ों पर पुरुष के स्पर्म मिलने और दुष्कर्म की आशंका सामने आई, तब तक पुलिस का शुरुआती नैरेटिव पूरी तरह ढह चुका था। इसके बावजूद जिम्मेदारी तय करने के बजाय, ध्यान जांच एजेंसी बदलने पर केंद्रित हो गया।

CBI कोई जादुई समाधान नहीं

यहाँ यह समझना जरूरी है कि CBI कोई जादुई समाधान नहीं है। वह भी सबूतों पर ही काम करती है, और अगर शुरुआती दौर में साक्ष्य कमजोर या दूषित हो चुके हों, तो किसी भी एजेंसी के हाथ बंध जाते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जांच किस एजेंसी के पास है, बल्कि यह है कि क्या राज्य अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है और पुलिस की जवाबदेही तय करता है।

न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता

इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू इसका सामाजिक संदेश है। जब पीड़ित परिवार को न्याय के लिए सड़क से लेकर हाईकोर्ट तक भटकना पड़े, और सरकार जांच एजेंसी बदलकर संतोष जताए, तो समाज में यह धारणा मजबूत होती है कि न्याय अनिश्चित है। इतिहास गवाह है कि जब न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता है। रूपम पाठक का मामला इसी विफलता का प्रतीक था, किसी आदर्श का नहीं।

 

यह राज्य की नैतिक पराजय है

पटना की यह NEET छात्रा एक नाम भर नहीं है। वह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जो मेहनत और प्रतियोगिता के दम पर आगे बढ़ना चाहती है, न कि डर और असुरक्षा के साये में जीना। यदि यह मामला भी समय के साथ एक और ‘अनसुलझा कांड’ बन जाता है, तो यह केवल एक परिवार की हार नहीं होगी, बल्कि राज्य की नैतिक पराजय होगी।

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Thursday, 29 January 2026

#SocialInjustice: जब दबंगों ने रोका श्मशान का रास्ता, दलित समाज ने 'चौराहे' को बनाया मुक्ति धाम - मार्मिक रिपोर्ट Video समेत

 

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श्मशान के रास्ते पर अमानवीय ताला: समाज में बढ़ती वो वहशीपन, जहां मुर्दे को भी दो गज जमीन नसीब नहीं | जब दलित समाज ने सड़क पर चिता सजाकर मानवता को जगाया - हाजीपुर की हृदय विदारक रिपोर्ट।

हाजीपुर में अतिक्रमण के चलते श्मशान का रास्ता रोके जाने पर दलित समाज ने सड़क पर किया वृद्ध महिला का दाह संस्कार। पढ़ें यह मार्मिक रिपोर्ट, जो सामाजिक अन्याय और अतिक्रमण की समस्या को उजागर करती है।

In Hajipur, the Dalit community performed the last rites of an elderly woman on the street after encroachment blocked the way to the cremation ground. Read this poignant report, which highlights the problem of social injustice and encroachment.

सोंधो अंधारी गाछी चौक, गोरोल (हाजीपुर, बिहार) की यह घटना सिर्फ एक दाह संस्कार की कहानी नहीं है; यह हमारे समाज की आत्मा पर लगे एक गहरे घाव का प्रमाण है। यह सवाल उठाती है कि कैसी वैनस्यता हमारे दिलों में घर कर गई है कि एक मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए अपने ही गाँव के श्मशान घाट तक ले जाने का रास्ता भी छीन लिया जाता है। दलित समाज की वृद्ध महिला झपसी देवी की मौत के बाद जो दृश्य दुनिया के सामने आया, वह न केवल अत्यंत मार्मिक खबर है, बल्कि सामाजिक न्याय की विफलताओं पर एक करारा प्रहार भी है।

इस घटना की पृष्ठभूमि में है अतिक्रमण की बेमानी और मन में बसी संकीर्णता। एक ओर वह ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर सालों से गांव के श्मशान तक जाने का रास्ता था, और दूसरी ओर कुछ लोगों की निजी ज़मीन हथियाने की लालसा। जब मानवता और ज़मीन के स्वामित्व के बीच चुनाव आया, तो ज़मीन ने क्रूरता की चादर ओढ़ ली।

मार्मिक घटनाक्रम: गुरुवार की दोपहर, जब श्मशान की राह अवरुद्ध हुई

गुरुवार की दोपहर सोंधो गांव के दहौर मांझी की वृद्ध पत्नी झपसी देवी (Jhapasi Devi) का निधन हो गया। हर गुजरते क्षण के साथ, परिवार का दुख गहराता जा रहा था। मांझी टोला के लोगों ने, हृदय में भारीपन लिए, गांव के सदियों पुराने श्मशान घाट की ओर शव यात्रा शुरू की। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि रीति-रिवाजों और पूर्वजों की परंपरा का पालन था।

जब दुख आक्रोश में बदल गया

लेकिन, श्मशान तक पहुंचने से ठीक पहले, वह मंज़र सामने आया जिसने उनके दुख को आक्रोश में बदल दिया। मुख्य सड़क से श्मशान तक जाने का रास्ता पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया गया था। रास्ते में पड़ने वाली ज़मीन के मालिकों ने अपनी 'निजी संपत्ति' की आड़ में एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे लाश भी पार नहीं कर सकती थी।

'जब भी लोग शव ले जाने का प्रयास करते हैं, तो श्मशान जाने के रास्ते में पड़ने वाले ज़मीन के मालिक इस पर रोक लगा देते हैं।' यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है, यह वर्षों से चली आ रही पीड़ा का निचोड़ है।

चौराहे पर चिता: आक्रोश, लाचारी और सामाजिक कलंक का प्रतीक

रास्ता रोके जाने से शव यात्रा में शामिल लोग स्तब्ध रह गए। उनके सामने दो विकल्प थे: या तो अपमान सहकर वापस लौट जाएं, या इस सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएं। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। यह निर्णय क्षणिक आवेश का नहीं था, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहे जा रहे तिरस्कार और लाचारी का विस्फोटक परिणाम था।

दलित समाज के लोगों ने फैसला किया कि अब वे दबेंगे नहीं। आक्रोशित लोगों ने शव को वापस मोड़ लिया और उसे सीधे सोंधो अंधारी गाछी चौक पर शिवमंदिर के सामने बीच सड़क पर रख दिया।

असीम अपमान, लाचारी और क्रोध

क्या आपने कभी सोचा है कि एक बेटे या बेटी के लिए अपने माता-पिता के शव का दाह संस्कार सड़क पर करने का मतलब क्या होता है? यह असीम अपमान, लाचारी और क्रोध का मिश्रण था। बीच सड़क पर, जहाँ लोगों की चहल-पहल होती है, वहीं चिता सजाकर दाह संस्कार किया गया। धुएं का वह गुबार सिर्फ लकड़ी के जलने का नहीं था, वह जलते हुए सामाजिक ताने-बाने और नष्ट होती मानवता का धुआँ था।

यह दृश्य न केवल हाजीपुर के इतिहास में, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष की कहानियों में भी दर्ज हो गया।

पीढ़ीगत पीड़ा और न्याय की अधूरी लड़ाई

आक्रोशित समुदाय के सदस्यों ने अपनी व्यथा व्यक्त की। भिखन मांझी, गजेंद्र मांझी, जगदीश मांझी, राम मांझी, किशन मांझी, देवकी मांझी और अन्य लोगों ने एक स्वर में कहा कि जब भी हम लोगों के साथ इस तरह की घटना घटती है, श्मशान जाने का रास्ता रोक दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी शंभू मांझी की मां चनरी देवी के शव को लेकर लोग इसी रास्ते से जा रहे थे, तब भी उन्हें जाने नहीं दिया गया था। इस तरह का मामला कई बार हो चुका है।

शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं

यह बयान दिखाता है कि यह एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है—दलित समाज के प्रति सामाजिक दुर्व्यवहार का एक व्यवस्थित सिलसिला। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ जीवित रहते हुए तो सम्मान से वंचित रखा ही गया, लेकिन मरने के बाद भी शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं दिया गया। श्मशान घाट का रास्ता रोकना सिर्फ एक भौतिक बाधा नहीं है, यह सामाजिक समरसता के मार्ग पर लगाया गया अवरोध है।

कानून और व्यवस्था की चुप्पी: अतिक्रमण का काला साया

यह अत्यंत दुखद है कि यह समस्या इतनी पुरानी होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन द्वारा इसका स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। अतिक्रमण की यह बेमानी इतनी गहरी है कि वह कानून की चौखट को भी पार कर जाती है।

शासन की निष्क्रियता और उदासीनता

सवाल यह है कि एक श्मशान घाट का रास्ता कोई व्यक्ति या समूह कैसे अवरुद्ध कर सकता है? क्या स्थानीय अधिकारियों को इस अतिक्रमण की जानकारी नहीं थी? यह घटना स्थानीय शासन की निष्क्रियता और उदासीनता को उजागर करती है।

हालांकि, घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया। बीडीओ पंकज कुमार निगम और सीओ दिव्या चंचल ने संयुक्त रूप से मौके का मुआयना किया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि सड़क की साफ़-सफ़ाई करा दी गई है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि श्मशान जाने में हो रही परेशानी सहित सभी पहलुओं की जांच कराई जाएगी और आगे शव के दाह संस्कार में परेशानी नहीं हो, इसकी व्यवस्था भी की जायेगी।

समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की

यह एक राहत भरी बात है कि प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन यह कार्रवाई कितनी स्थायी होगी, यह देखना बाकी है। समस्या केवल रास्ता साफ़ करने की नहीं है; समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की है, जिसका निपटारा कानूनी रूप से आवश्यक है। इस मार्मिक घटना ने जो घाव दिए हैं, वे केवल जांच-पड़ताल और सड़क की साफ़-सफ़ाई से नहीं भरेंगे।

मानवता की कसौटी पर हमारा समाज

हाजीपुर की यह घटना, दलित समाज के संघर्ष और मानवता की विफलता का एक काला अध्याय है। एक ऐसे देश में, जहाँ सदियों से 'मुक्ति' और 'मोक्ष' को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना जाता है, वहाँ एक गरीब और वंचित समाज के सदस्य को सड़क पर जलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह रिपोर्ट समाज, सरकार और हर नागरिक के लिए एक आईना है। सामाजिक न्याय केवल किताबों और संविधान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि श्मशान के रास्ते तक भी पहुंचना चाहिए। सरकार को न केवल तुरंत और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस देश के हर नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो, को सम्मान के साथ जीने और मरने का अधिकार मिले।

जब तक हर श्मशान घाट का रास्ता सुरक्षित और खुला नहीं होगा, तब तक हम एक सभ्य समाज होने का दावा नहीं कर सकते। झपसी देवी की सड़क पर सजी चिता हमें हमेशा याद दिलाएगी कि अतिक्रमण केवल ज़मीन का नहीं होता, वह मानवता का भी होता है।



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Wednesday, 28 January 2026

चंपारण में खूनी संघर्ष: एक 'गलतफहमी' ने मझौलिया को बनाया रणक्षेत्र, पुलिस पर पथराव और आगजनी, जानें पूरा मामला, देखें वीडियो

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 चंपारण के मझौलिया में किशोर की मौत के बाद भड़की हिंसा। पुलिस की तत्परता को भीड़ ने समझा गलतफहमी, जमकर हुआ पथराव और आगजनी। महिला आरक्षी समेत कई पुलिसकर्मी घायल। पढ़ें पूरी ग्राउंड रिपोर्ट।

On Tuesday evening, a 'public dozer' loaded with sugarcane hit 14-year-old Amit Kumar Patel near the High School Chowk on the Majhauliya-Nanotti road

चंपारण (बिहार): पश्चिम चंपारण के मझौलिया में एक सड़क दुर्घटना के बाद उपजा आक्रोश भीषण हिंसा में तब्दील हो गया। जिस पुलिस ने घायल किशोर की जान बचाने के लिए उसे अस्पताल पहुंचाया, वही पुलिस जनता के कोपभाजन का शिकार बनी। यह पूरी घटना केवल एक 'कम्युनिकेशन गैप' का परिणाम थी, जिसने पूरी रात इलाके को दहशत में रखा।

हादसे से उपजा आक्रोश: क्या है पूरी कहानी?

मंगलवार की शाम मझौलिया-नानोसती मार्ग पर हाईस्कूल चौक के समीप गन्ना लदे एक 'पब्लिक डोजर' ने 14 वर्षीय अमित कुमार पटेल को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे के तुरंत बाद मौके पर पहुंची ERSS 112 की टीम ने मानवता दिखाते हुए किशोर को तुरंत उठाया और इलाज के लिए बेतिया सरकारी अस्पताल ले गई।

हालांकि, अस्पताल में डॉक्टरों ने अमित को मृत घोषित कर दिया। इधर घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों को पुलिस की इस कार्रवाई की जानकारी नहीं मिल सकी। उन्हें लगा कि पुलिस मामले को दबाने के लिए शव को कहीं ले गई है। बस इसी एक गलतफहमी ने भीड़ को उग्र कर दिया।

आधी रात तक चला पत्थरबाजी और आगजनी का दौर

कड़कड़ाती ठंड के बावजूद, रात 12 बजे तक मझौलिया का हाईस्कूल चौक और चीनी मिल गेट युद्ध के मैदान में बदला रहा।

·       पुलिस पर हमला: उग्र भीड़ ने पुलिस बल पर जमकर पथराव किया। इस हमले में दो एएसआई और एक महिला आरक्षी लहूलुहान हो गए। पत्थर लगने से महिला आरक्षी बेहोश हो गई, वहीं एक अन्य आरक्षी के सिर पर लाठी से गहरा प्रहार हुआ, जिससे वह बार-बार बेहोश होता रहा।

·       कर्मियों पर निशाना: हिंसा की चपेट में चीनी मिल के सुरक्षा गार्ड हरिहर प्रसाद, टाइमकीपर सूरज सिंह और कई अन्य कर्मी भी आए।

·       आगजनी: प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर टायर जलाकर आगजनी की और घंटों तक आवागमन बाधित रखा।

प्रशासनिक कार्रवाई और शांति की अपील

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीपीओ सदर विवेकदीप भारी पुलिस बल और वज्रवाहन के साथ मौके पर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग (लाठीचार्ज) करना पड़ा।

चीनी मिल के सीजीएम उदयवीर सिंह ने पीड़ित परिवार की स्थिति को देखते हुए तत्काल आर्थिक मदद की घोषणा की, जिसके बाद मामला शांत हुआ। बुधवार को पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया है। फिलहाल, थानाध्यक्ष अमर कुमार के नेतृत्व में पुलिस बल हाईस्कूल चौक और मिल गेट पर कैंप कर रहा है ताकि कोई अनहोनी न हो।

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