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Tuesday, 3 February 2026

बिहार के आसमान पर खतरनाक संकट, बर्ड फ्लू का साया: भागलपुर में पुष्टि के बाद कटिहार में हड़कंप

 

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बिहार में बर्ड फ्लू का अलर्ट! भागलपुर के बाद अब कटिहार में भी कौवों की रहस्यमयी मौत। क्या H5N1 वायरस से बढ़ रहा है खतरा? कंचनवाणी की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें पूरी सच्चाई, बचाव के उपाय और प्रशासन की तैयारी।

"मुजफ्फरपुर : बिहार के आसमान पर इस समय संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भागलपुर के नवगछिया में पिछले दिनों हुई 150 से अधिक कौवों की रहस्यमयी मौत ने अब एक डरावनी सच्चाई का रूप ले लिया है। भोपाल और पटना की हाई-टेक लैब से आई रिपोर्टों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इन मौतों के पीछे H5N1 वायरस (Avian Influenza) है। भागलपुर में संक्रमण की पुष्टि होने के तुरंत बाद अब पड़ोसी जिले कटिहार में भी पक्षियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है, जिससे पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मच गई है।

भागलपुर से शुरू हुआ मौत का सिलसिला
घटना की शुरुआत 11 जनवरी को हुई थी, जब नवगछिया अनुमंडल परिसर में कचहरी और आसपास के पेड़ों के नीचे सैकड़ों कौवे मृत पाए गए थे। उस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, इसलिए विशेषज्ञों का एक समूह इसे 'कोल्ड स्ट्रेस' मान रहा था। पक्षी विशेषज्ञ ज्ञानचंद ज्ञानू ने भी संभावना जताई थी कि भोजन की कमी और रसायनों के प्रभाव से ऐसा हो सकता है।
हालांकि, जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. अंजली कुमारी ने कोई जोखिम न लेते हुए सैंपल जांच के लिए भेजे। अब लैब रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि यह सामान्य मौतें नहीं बल्कि एक संक्रामक महामारी की आहट थी।


कटिहार में बढ़ता खतरा: कुरसेला बना नया केंद्र
भागलपुर के बाद अब कटिहार जिले की कुरसेला नगर पंचायत और उत्तरी मुरादपुर पंचायत से भी चिंताजनक खबरें आ रही हैं। स्टेट हाईवे 77 के पास बड़ी संख्या में कौवों के शव मिले हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई: पशुपालन विभाग की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर रसायनों का छिड़काव किया है।
मृत पक्षियों को गहरे गड्ढे खोदकर सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया गया है ताकि संक्रमण आगे न फैले।


क्या है H5N1 वायरस और यह कितना घातक है?
बर्ड फ्लू, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एवियन इन्फ्लूएंजा कहा जाता है, मुख्य रूप से पक्षियों में फैलने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है।
संक्रमण का तरीका: यह वायरस संक्रमित पक्षियों के मल, लार और नाक के स्राव के माध्यम से फैलता है।
मनुष्यों को खतरा: H5N1 एक ज़ूनोटिक (Zoonotic) वायरस है, जिसका अर्थ है कि यह पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। यदि कोई व्यक्ति संक्रमित पक्षी के सीधे संपर्क में आता है, तो उसे गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
इकोसिस्टम पर असर: कौवे हमारे पर्यावरण के 'सफाईकर्मी' माने जाते हैं। इनकी बड़ी संख्या में मौत पर्यावरण के संतुलन को भी बिगाड़ सकती है।


प्रशासन की 'किलिंग ज़ोन' और सर्विलांस रणनीति
H5N1 की पुष्टि के बाद प्रशासन ने 'जीरो सर्विलांस' नीति अपनाई है:
10 KM का घेरा: संक्रमित क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे को हाई-अलर्ट ज़ोन घोषित कर दिया गया है।
सैनिटाइजेशन: प्रभावित इलाकों में लगातार सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसे रसायनों का छिड़काव किया जा रहा है।
पोल्ट्री जांच: आसपास के सभी पोल्ट्री फार्मों से मुर्गियों के सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संक्रमण व्यावसायिक पक्षियों तक न पहुंचे।


कंचनवाणी की अपील: क्या करें और क्या न करें?
बिहार में बढ़ते खतरे को देखते हुए कंचनवाणी अपने पाठकों से सावधानियां बरतने की अपील करते हैं:
सीधे संपर्क से बचें: यदि आपको सड़क या आंगन में कोई मृत पक्षी दिखे, तो उसे न छुएं।
स्वच्छता का ध्यान: यदि आप चिकन या अंडे का सेवन करते हैं, तो उन्हें 70°C से अधिक तापमान पर अच्छी तरह पकाकर ही खाएं।
सूचना दें: किसी भी असामान्य घटना की जानकारी तुरंत पशु चिकित्सा हेल्पलाइन या स्थानीय थाने को दें।
अफवाहों से बचें: केवल आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन पर ही भरोसा करें। अफवाहों पर ध्यान ना दें । सुनी सुनाई बात इधर से उधर ना करें।

ध्यान रखें 

1. "पक्षियों की अचानक मौत, खतरे का संकेत है। बर्ड फ्लू से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक बनें।

2. "सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है! पक्षियों से दूरी रखें, सफाई का ध्यान दें। बर्ड फ्लू के खिलाफ जंग में सहयोग करें। -

3. "प्रकृति का संदेश समझें, संक्रमण को फैलने से रोकें। किसी भी मृत पक्षी की सूचना तुरंत विशेषज्ञों को दें।

अक्सर पाठकों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) और बचाव के विस्तृत दिशा-निर्देश

पाठकों की सुविधा के लिए हमने विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुछ प्रमुख सवालों के जवाब यहाँ तैयार किए हैं:
1. क्या बर्ड फ्लू इंसानों के लिए जानलेवा है?
हाँ, H5N1 वायरस इंसानों को संक्रमित कर सकता है। हालांकि इसके मामले दुर्लभ हैं, लेकिन यदि संक्रमण हो जाए तो यह गंभीर निमोनिया और श्वसन तंत्र की विफलता का कारण बन सकता है, जो घातक हो सकता है।
2. क्या इस दौरान चिकन और अंडे खाना सुरक्षित है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, चिकन और अंडों को अच्छी तरह पकाकर (70°C से अधिक तापमान पर) खाना सुरक्षित है। वायरस गर्मी में जीवित नहीं रह पाता। हालांकि, कच्चा या अधपका मांस खाने से बचें।
3. यदि घर के पास मृत पक्षी मिले तो क्या करें?
उसे भूलकर भी न छुएं। तुरंत स्थानीय पशुपालन विभाग या नगर निगम को सूचित करें। बच्चों और पालतू जानवरों को उस स्थान से दूर रखें।
4. बर्ड फ्लू के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
इंसानों में इसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं— जैसे तेज बुखार, खांसी, गले में खराश, मांसपेशियों में दर्द और सांस लेने में तकलीफ।

सावधानी के लिए चेकलिस्ट
बिहार के मौजूदा हालातों को देखते हुए इन 5 बातों का विशेष ध्यान रखें:
* मास्क का प्रयोग: यदि आप पक्षियों के बसेरे वाले इलाके में जा रहे हैं, तो मास्क और दस्ताने जरूर पहनें।
* हाथों की सफाई: बाहर से आने के बाद हाथों को साबुन या सैनिटाइजर से अच्छी तरह साफ करें।
* बाजार में सावधानी: चिकन या मछली मार्केट जाते समय विशेष सतर्कता बरतें और वहां की गंदगी के सीधे संपर्क में न आएं।
* पक्षियों को दाना: फिलहाल खुले स्थानों पर पक्षियों को दाना डालने से बचें जहाँ पक्षियों का जमावड़ा अधिक हो।
* त्वरित रिपोर्टिंग: अपने क्षेत्र में एक भी पक्षी की संदिग्ध मौत को नजरअंदाज न करें।
निष्कर्ष
भागलपुर और कटिहार की घटनाएं महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं। प्रशासन अपना काम कर रहा है, लेकिन एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अफवाहों को न फैलने दें और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सावधानी बरतें।
कंचनवाणी लगातार इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आपको हर अपडेट से रूबरू कराता रहेगा।

> "सतर्क बिहार, सुरक्षित बिहार! बर्ड फ्लू की आहट को हल्के में न लें। आपकी छोटी सी सावधानी एक बड़ी महामारी को रोक सकती है। - कंचनवाणी (Kanchanwani)"

 


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Saturday, 31 January 2026

CBI की दहलीज पर NEET छात्रा केस : ऐसे में बेटियाँ 'रूपम पाठक' बनने को मजबूर होंगी? पढ़ें विस्तृत व्याख्या

 

"NEET student suspicious death Patna CBI case"

पटना में NEET छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब CBI के पास है। क्या यह न्याय की शुरुआत है या रसूखदारों को बचाने की कोशिश? जानें रूपम पाठक कांड से लेकर नवरुणा केस तक, बिहार में न्यायिक विफलता का पूरा सच। पढ़ें Kanchanwani की विशेष रिपोर्ट।

 The case of the suspicious death of a NEET student in Patna is now with the CBI. Is this the beginning of justice or an attempt to protect influential individuals?  Learn the complete truth about judicial failures in Bihar, from the Rupam Pathak case to the Navruna case.

 मुजफ्फरपुर/पटना। । बिहार की राजधानी पटना में नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब सीबीआई (CBI) की दहलीज पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सिफारिश के बाद राज्य सरकार ने जांच का जिम्मा केंद्र को सौंपने का आग्रह किया है। लेकिन यह सवाल हवा में तैर रहा है— क्या सीबीआई जांच वाकई न्याय दिलाएगी या यह महज 'त्वरित बवालको शांत करने का एक राजनीतिक झुनझुना है?

अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने वाली पुलिस की नैतिक हार

डिप्टी सीएम और प्रदेश के गृह मंत्री सम्राट चौधरी, जो अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने का दावा करते थे, आज उनकी अपनी पुलिस 'जमीर' हार चुकी है। पटना पुलिस की लापरवाही और साक्ष्यों के साथ की गई 'लीपापोती' ने बिहार के सुशासन के दावों की पोल खोल दी है।

आरोपः डीजीपी ने आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया

जहानाबाद की रहने वाली छात्रा 5 जनवरी को पटना हॉस्टल आती है और 6 जनवरी को उसे बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। 11 जनवरी को मेदांता में उसकी मौत हो जाती है। पुलिस ने इसे पहले दिन से 'आत्महत्या' का रंग देने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब थाना प्रभारी ने जांच के बजाय ड्राइवर को हॉस्टल पता करने भेज दिया।

इस मामले में  जबर्दस्त मोड़ तब आया जब पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट ने पुलिस के दावों को ध्वस्त कर दिया। जब छात्रा के कपड़ों पर पुरुष वीर्य मिला और सामूहिक दुष्कर्म की आशंका जताई गई, तब पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था। परिजनों का आरोप है कि खुद डीजीपी ने उन पर आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया।

 किसके सामने नतमस्तक है व्यवस्था

क्या मनीष रंजन और नीलम अग्रवाल जैसे नामों को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था नतमस्तक है? एम्स को पूरे दस्तावेज क्यों नहीं दिए गए? विसरा रिपोर्ट में देरी क्यों? क्या सम्राट चौधरी की पुलिस अब सिर्फ 'सरेंडर' करना जानती है? ये वो सवाल हैं जो बिहार की हर बेटी आज सत्ता से पूछ रही है। क्योंकि इतिहास के आइने में कई अनसुलझी 'इंसाफ' की दास्तां सीबीआई की फाइलों में गुम हो गईं।

रूपम पाठक: जब व्यवस्था ने मजबूर किया

पूर्णिया की इस शिक्षिका का मामला बिहार की न्यायिक विफलता का सबसे डरावना उदाहरण है। आरोप था कि तत्कालीन विधायक राजकिशोर सिंह ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। जब हर जगह से न्याय की उम्मीद खत्म हो गई, तो रूपम पाठक ने सरेआम विधायक पर चाकू से हमला कर दिया, जिससे बाद में उनकी मौत हो गई। यह कांड याद दिलाता है कि जब तंत्र बहरा हो जाए, तो 'प्रतिशोध' जन्म लेता है।

शिल्पी जैन-गौतम हत्याकांड (1999)

पटना के इस हाई-प्रोफाइल केस ने तत्कालीन सरकार की चूलें हिला दी थीं। पटना के एक गैरेज में दो शव मिले थे। रसूखदारों के नाम आने के बाद केस सीबीआई को गया, लेकिन नतीजा 'सिफर' रहा। साक्ष्यों के अभाव में यह केस आज भी बिहार की पुलिसिया और सीबीआई जांच पर एक काला धब्बा है।

बॉबी हत्याकांड: सत्ता का रसूख और रहस्य

श्वेतनिशा उर्फ बॉबी की मौत का मामला दशकों बाद भी अनसुलझा है। इसमें सचिवालय और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के नाम उछले थे। शव को कब्र से निकालकर जांच की गई, लेकिन अंत में केस बंद हो गया। यह दिखाता है कि रसूखदारों के आगे सीबीआई के हाथ भी बंध जाते हैं।

नवरुणा चक्रवर्ती (2012) और अन्य बेटियां

मुजफ्फरपुर की नवरुणा को उसके घर से सोते समय अगवा कर लिया गया था। बरसों तक सीबीआई जांच चली, सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, लेकिन नवरुणा का क्या हुआ? कोई नहीं जानता। ठीक यही हश्र खुशी (2021) और यशी (2022) के मामलों का भी दिख रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि विश्वास करें तो किस पर?

पटना पुलिस की विफलता के बाद सीबीआई को केस सौंपना यह दर्शाता है कि राज्य की कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। यदि सीबीआई भी नवरुणा या शिल्पी जैन केस की तरह इसे फाइलों में दबा देती है, तो बिहार की बेटियों के पास 'रूपम पाठक' बनने के अलावा क्या विकल्प बचेगा? गृह मंत्री सम्राट चौधरी को जवाब देना होगा कि उनकी 'खुली छूट' क्या सिर्फ पुलिस को अपराधियों को बचाने के लिए मिली है?

दरक गया बिहार में न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा

 पटना में NEET की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत अब महज एक आपराधिक घटना नहीं रही। यह मामला धीरे-धीरे बिहार की कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर एक व्याख्यात्मक टिप्पणी बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मामले को CBI को सौंपने की सिफारिश और उसी समय पीड़ित परिवार का पटना हाईकोर्ट पहुँच जाना, इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि राज्य के भीतर न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा दरक चुका है।

आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश

सरकार का तर्क है कि CBI जांच से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन सवाल यह है कि यह फैसला शुरुआत में क्यों नहीं लिया गया। जब छात्रा 6 जनवरी को बेहोशी की हालत में अस्पताल लाई गई और 11 जनवरी को उसकी मौत हुई, तब तक पुलिस ने जिस तरह से मामले को ‘आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, उसने जांच की मंशा पर गंभीर संदेह खड़े किए। पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट आने से पहले ही निष्कर्ष तय कर लेना, और बाद में उन्हीं निष्कर्षों का बचाव करना, यह बताता है कि या तो पुलिस ने जल्दबाजी में काम किया या फिर जांच को एक निश्चित दिशा में मोड़ने की कोशिश हुई।

सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में

यही वह बिंदु है जहाँ सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में आती है। जब स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठे, जब साक्ष्य मिटाने के आरोप में थाना प्रभारी निलंबित हुई, तब CBI को केस सौंपना एक निर्णायक कदम कम और दबाव प्रबंधन ज्यादा प्रतीत होता है। इस फैसले को विपक्ष ने सरकार की हार करार दिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहना है कि जिस प्रशासनिक ढांचे पर सरकार को भरोसा होना चाहिए था, उसी की विफलता ने CBI जांच को अनिवार्य बना दिया। तेजस्वी का हमला केवल राजनीतिक नहीं है। उन्होंने नवरुणा चक्रवर्ती कांड का उदाहरण देकर उस सामूहिक स्मृति को याद दिलाया है जिसमें बिहार की कई बेटियों के मामले वर्षों तक जांच एजेंसियों के बीच घूमते रहे और अंततः फाइलों में दफन हो गए।

पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया

 यही आशंका इस मामले में भी परिजनों को सता रही है, और शायद इसी कारण उन्होंने सरकार और पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट में दायर याचिका इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम मोड़ है। इसमें सिर्फ पुलिस या सरकार ही नहीं, बल्कि हॉस्टल प्रबंधन, निजी अस्पताल, डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों को भी कटघरे में खड़ा किया गया है। यह बताता है कि परिवार को डर है कि कहीं सच्चाई कई परतों के नीचे दबा न दी जाए। एक आम नागरिक के लिए हाईकोर्ट पहुँचना आसान फैसला नहीं होता; यह तब होता है जब व्यवस्था के भीतर के सारे रास्ते बंद दिखने लगते हैं।

सबसे ज्यादा बेचैन करती पुलिस की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका सबसे ज्यादा बेचैन करती है। जांच के शुरुआती दिनों में जो लापरवाही दिखी, वह सिर्फ तकनीकी भूल नहीं कही जा सकती। जब कपड़ों पर पुरुष के स्पर्म मिलने और दुष्कर्म की आशंका सामने आई, तब तक पुलिस का शुरुआती नैरेटिव पूरी तरह ढह चुका था। इसके बावजूद जिम्मेदारी तय करने के बजाय, ध्यान जांच एजेंसी बदलने पर केंद्रित हो गया।

CBI कोई जादुई समाधान नहीं

यहाँ यह समझना जरूरी है कि CBI कोई जादुई समाधान नहीं है। वह भी सबूतों पर ही काम करती है, और अगर शुरुआती दौर में साक्ष्य कमजोर या दूषित हो चुके हों, तो किसी भी एजेंसी के हाथ बंध जाते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जांच किस एजेंसी के पास है, बल्कि यह है कि क्या राज्य अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है और पुलिस की जवाबदेही तय करता है।

न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता

इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू इसका सामाजिक संदेश है। जब पीड़ित परिवार को न्याय के लिए सड़क से लेकर हाईकोर्ट तक भटकना पड़े, और सरकार जांच एजेंसी बदलकर संतोष जताए, तो समाज में यह धारणा मजबूत होती है कि न्याय अनिश्चित है। इतिहास गवाह है कि जब न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता है। रूपम पाठक का मामला इसी विफलता का प्रतीक था, किसी आदर्श का नहीं।

 

यह राज्य की नैतिक पराजय है

पटना की यह NEET छात्रा एक नाम भर नहीं है। वह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जो मेहनत और प्रतियोगिता के दम पर आगे बढ़ना चाहती है, न कि डर और असुरक्षा के साये में जीना। यदि यह मामला भी समय के साथ एक और ‘अनसुलझा कांड’ बन जाता है, तो यह केवल एक परिवार की हार नहीं होगी, बल्कि राज्य की नैतिक पराजय होगी।

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Thursday, 29 January 2026

#SocialInjustice: जब दबंगों ने रोका श्मशान का रास्ता, दलित समाज ने 'चौराहे' को बनाया मुक्ति धाम - मार्मिक रिपोर्ट Video समेत

 

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श्मशान के रास्ते पर अमानवीय ताला: समाज में बढ़ती वो वहशीपन, जहां मुर्दे को भी दो गज जमीन नसीब नहीं | जब दलित समाज ने सड़क पर चिता सजाकर मानवता को जगाया - हाजीपुर की हृदय विदारक रिपोर्ट।

हाजीपुर में अतिक्रमण के चलते श्मशान का रास्ता रोके जाने पर दलित समाज ने सड़क पर किया वृद्ध महिला का दाह संस्कार। पढ़ें यह मार्मिक रिपोर्ट, जो सामाजिक अन्याय और अतिक्रमण की समस्या को उजागर करती है।

In Hajipur, the Dalit community performed the last rites of an elderly woman on the street after encroachment blocked the way to the cremation ground. Read this poignant report, which highlights the problem of social injustice and encroachment.

सोंधो अंधारी गाछी चौक, गोरोल (हाजीपुर, बिहार) की यह घटना सिर्फ एक दाह संस्कार की कहानी नहीं है; यह हमारे समाज की आत्मा पर लगे एक गहरे घाव का प्रमाण है। यह सवाल उठाती है कि कैसी वैनस्यता हमारे दिलों में घर कर गई है कि एक मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए अपने ही गाँव के श्मशान घाट तक ले जाने का रास्ता भी छीन लिया जाता है। दलित समाज की वृद्ध महिला झपसी देवी की मौत के बाद जो दृश्य दुनिया के सामने आया, वह न केवल अत्यंत मार्मिक खबर है, बल्कि सामाजिक न्याय की विफलताओं पर एक करारा प्रहार भी है।

इस घटना की पृष्ठभूमि में है अतिक्रमण की बेमानी और मन में बसी संकीर्णता। एक ओर वह ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर सालों से गांव के श्मशान तक जाने का रास्ता था, और दूसरी ओर कुछ लोगों की निजी ज़मीन हथियाने की लालसा। जब मानवता और ज़मीन के स्वामित्व के बीच चुनाव आया, तो ज़मीन ने क्रूरता की चादर ओढ़ ली।

मार्मिक घटनाक्रम: गुरुवार की दोपहर, जब श्मशान की राह अवरुद्ध हुई

गुरुवार की दोपहर सोंधो गांव के दहौर मांझी की वृद्ध पत्नी झपसी देवी (Jhapasi Devi) का निधन हो गया। हर गुजरते क्षण के साथ, परिवार का दुख गहराता जा रहा था। मांझी टोला के लोगों ने, हृदय में भारीपन लिए, गांव के सदियों पुराने श्मशान घाट की ओर शव यात्रा शुरू की। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि रीति-रिवाजों और पूर्वजों की परंपरा का पालन था।

जब दुख आक्रोश में बदल गया

लेकिन, श्मशान तक पहुंचने से ठीक पहले, वह मंज़र सामने आया जिसने उनके दुख को आक्रोश में बदल दिया। मुख्य सड़क से श्मशान तक जाने का रास्ता पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया गया था। रास्ते में पड़ने वाली ज़मीन के मालिकों ने अपनी 'निजी संपत्ति' की आड़ में एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे लाश भी पार नहीं कर सकती थी।

'जब भी लोग शव ले जाने का प्रयास करते हैं, तो श्मशान जाने के रास्ते में पड़ने वाले ज़मीन के मालिक इस पर रोक लगा देते हैं।' यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है, यह वर्षों से चली आ रही पीड़ा का निचोड़ है।

चौराहे पर चिता: आक्रोश, लाचारी और सामाजिक कलंक का प्रतीक

रास्ता रोके जाने से शव यात्रा में शामिल लोग स्तब्ध रह गए। उनके सामने दो विकल्प थे: या तो अपमान सहकर वापस लौट जाएं, या इस सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएं। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। यह निर्णय क्षणिक आवेश का नहीं था, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहे जा रहे तिरस्कार और लाचारी का विस्फोटक परिणाम था।

दलित समाज के लोगों ने फैसला किया कि अब वे दबेंगे नहीं। आक्रोशित लोगों ने शव को वापस मोड़ लिया और उसे सीधे सोंधो अंधारी गाछी चौक पर शिवमंदिर के सामने बीच सड़क पर रख दिया।

असीम अपमान, लाचारी और क्रोध

क्या आपने कभी सोचा है कि एक बेटे या बेटी के लिए अपने माता-पिता के शव का दाह संस्कार सड़क पर करने का मतलब क्या होता है? यह असीम अपमान, लाचारी और क्रोध का मिश्रण था। बीच सड़क पर, जहाँ लोगों की चहल-पहल होती है, वहीं चिता सजाकर दाह संस्कार किया गया। धुएं का वह गुबार सिर्फ लकड़ी के जलने का नहीं था, वह जलते हुए सामाजिक ताने-बाने और नष्ट होती मानवता का धुआँ था।

यह दृश्य न केवल हाजीपुर के इतिहास में, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष की कहानियों में भी दर्ज हो गया।

पीढ़ीगत पीड़ा और न्याय की अधूरी लड़ाई

आक्रोशित समुदाय के सदस्यों ने अपनी व्यथा व्यक्त की। भिखन मांझी, गजेंद्र मांझी, जगदीश मांझी, राम मांझी, किशन मांझी, देवकी मांझी और अन्य लोगों ने एक स्वर में कहा कि जब भी हम लोगों के साथ इस तरह की घटना घटती है, श्मशान जाने का रास्ता रोक दिया जाता है।

उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी शंभू मांझी की मां चनरी देवी के शव को लेकर लोग इसी रास्ते से जा रहे थे, तब भी उन्हें जाने नहीं दिया गया था। इस तरह का मामला कई बार हो चुका है।

शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं

यह बयान दिखाता है कि यह एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है—दलित समाज के प्रति सामाजिक दुर्व्यवहार का एक व्यवस्थित सिलसिला। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ जीवित रहते हुए तो सम्मान से वंचित रखा ही गया, लेकिन मरने के बाद भी शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं दिया गया। श्मशान घाट का रास्ता रोकना सिर्फ एक भौतिक बाधा नहीं है, यह सामाजिक समरसता के मार्ग पर लगाया गया अवरोध है।

कानून और व्यवस्था की चुप्पी: अतिक्रमण का काला साया

यह अत्यंत दुखद है कि यह समस्या इतनी पुरानी होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन द्वारा इसका स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। अतिक्रमण की यह बेमानी इतनी गहरी है कि वह कानून की चौखट को भी पार कर जाती है।

शासन की निष्क्रियता और उदासीनता

सवाल यह है कि एक श्मशान घाट का रास्ता कोई व्यक्ति या समूह कैसे अवरुद्ध कर सकता है? क्या स्थानीय अधिकारियों को इस अतिक्रमण की जानकारी नहीं थी? यह घटना स्थानीय शासन की निष्क्रियता और उदासीनता को उजागर करती है।

हालांकि, घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया। बीडीओ पंकज कुमार निगम और सीओ दिव्या चंचल ने संयुक्त रूप से मौके का मुआयना किया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि सड़क की साफ़-सफ़ाई करा दी गई है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि श्मशान जाने में हो रही परेशानी सहित सभी पहलुओं की जांच कराई जाएगी और आगे शव के दाह संस्कार में परेशानी नहीं हो, इसकी व्यवस्था भी की जायेगी।

समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की

यह एक राहत भरी बात है कि प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन यह कार्रवाई कितनी स्थायी होगी, यह देखना बाकी है। समस्या केवल रास्ता साफ़ करने की नहीं है; समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की है, जिसका निपटारा कानूनी रूप से आवश्यक है। इस मार्मिक घटना ने जो घाव दिए हैं, वे केवल जांच-पड़ताल और सड़क की साफ़-सफ़ाई से नहीं भरेंगे।

मानवता की कसौटी पर हमारा समाज

हाजीपुर की यह घटना, दलित समाज के संघर्ष और मानवता की विफलता का एक काला अध्याय है। एक ऐसे देश में, जहाँ सदियों से 'मुक्ति' और 'मोक्ष' को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना जाता है, वहाँ एक गरीब और वंचित समाज के सदस्य को सड़क पर जलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

यह रिपोर्ट समाज, सरकार और हर नागरिक के लिए एक आईना है। सामाजिक न्याय केवल किताबों और संविधान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि श्मशान के रास्ते तक भी पहुंचना चाहिए। सरकार को न केवल तुरंत और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस देश के हर नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो, को सम्मान के साथ जीने और मरने का अधिकार मिले।

जब तक हर श्मशान घाट का रास्ता सुरक्षित और खुला नहीं होगा, तब तक हम एक सभ्य समाज होने का दावा नहीं कर सकते। झपसी देवी की सड़क पर सजी चिता हमें हमेशा याद दिलाएगी कि अतिक्रमण केवल ज़मीन का नहीं होता, वह मानवता का भी होता है।



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Wednesday, 28 January 2026

चंपारण में खूनी संघर्ष: एक 'गलतफहमी' ने मझौलिया को बनाया रणक्षेत्र, पुलिस पर पथराव और आगजनी, जानें पूरा मामला, देखें वीडियो

Champaran Majhaulia News, Police Stone Pelting Bihar, Mizhaulia Sugarcane Accident

 चंपारण के मझौलिया में किशोर की मौत के बाद भड़की हिंसा। पुलिस की तत्परता को भीड़ ने समझा गलतफहमी, जमकर हुआ पथराव और आगजनी। महिला आरक्षी समेत कई पुलिसकर्मी घायल। पढ़ें पूरी ग्राउंड रिपोर्ट।

On Tuesday evening, a 'public dozer' loaded with sugarcane hit 14-year-old Amit Kumar Patel near the High School Chowk on the Majhauliya-Nanotti road

चंपारण (बिहार): पश्चिम चंपारण के मझौलिया में एक सड़क दुर्घटना के बाद उपजा आक्रोश भीषण हिंसा में तब्दील हो गया। जिस पुलिस ने घायल किशोर की जान बचाने के लिए उसे अस्पताल पहुंचाया, वही पुलिस जनता के कोपभाजन का शिकार बनी। यह पूरी घटना केवल एक 'कम्युनिकेशन गैप' का परिणाम थी, जिसने पूरी रात इलाके को दहशत में रखा।

हादसे से उपजा आक्रोश: क्या है पूरी कहानी?

मंगलवार की शाम मझौलिया-नानोसती मार्ग पर हाईस्कूल चौक के समीप गन्ना लदे एक 'पब्लिक डोजर' ने 14 वर्षीय अमित कुमार पटेल को अपनी चपेट में ले लिया। हादसे के तुरंत बाद मौके पर पहुंची ERSS 112 की टीम ने मानवता दिखाते हुए किशोर को तुरंत उठाया और इलाज के लिए बेतिया सरकारी अस्पताल ले गई।

हालांकि, अस्पताल में डॉक्टरों ने अमित को मृत घोषित कर दिया। इधर घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीणों को पुलिस की इस कार्रवाई की जानकारी नहीं मिल सकी। उन्हें लगा कि पुलिस मामले को दबाने के लिए शव को कहीं ले गई है। बस इसी एक गलतफहमी ने भीड़ को उग्र कर दिया।

आधी रात तक चला पत्थरबाजी और आगजनी का दौर

कड़कड़ाती ठंड के बावजूद, रात 12 बजे तक मझौलिया का हाईस्कूल चौक और चीनी मिल गेट युद्ध के मैदान में बदला रहा।

·       पुलिस पर हमला: उग्र भीड़ ने पुलिस बल पर जमकर पथराव किया। इस हमले में दो एएसआई और एक महिला आरक्षी लहूलुहान हो गए। पत्थर लगने से महिला आरक्षी बेहोश हो गई, वहीं एक अन्य आरक्षी के सिर पर लाठी से गहरा प्रहार हुआ, जिससे वह बार-बार बेहोश होता रहा।

·       कर्मियों पर निशाना: हिंसा की चपेट में चीनी मिल के सुरक्षा गार्ड हरिहर प्रसाद, टाइमकीपर सूरज सिंह और कई अन्य कर्मी भी आए।

·       आगजनी: प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर टायर जलाकर आगजनी की और घंटों तक आवागमन बाधित रखा।

प्रशासनिक कार्रवाई और शांति की अपील

मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीपीओ सदर विवेकदीप भारी पुलिस बल और वज्रवाहन के साथ मौके पर पहुंचे। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस को बल प्रयोग (लाठीचार्ज) करना पड़ा।

चीनी मिल के सीजीएम उदयवीर सिंह ने पीड़ित परिवार की स्थिति को देखते हुए तत्काल आर्थिक मदद की घोषणा की, जिसके बाद मामला शांत हुआ। बुधवार को पोस्टमार्टम के बाद शव परिजनों को सौंप दिया गया है। फिलहाल, थानाध्यक्ष अमर कुमार के नेतृत्व में पुलिस बल हाईस्कूल चौक और मिल गेट पर कैंप कर रहा है ताकि कोई अनहोनी न हो।

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Monday, 19 January 2026

जंगल के हीरो का कत्ल: करोड़ों के 'खाल' कारोबार में शामिल सफेदपोश, आखिर कब थमेगा यह ख़ूनी खेल?

वन्यजीव तस्करी, बिहार, VIP कनेक्शन, पलामू टाइगर रिजर्व, तेंदुआ खाल, हिरण खाल, जंगल सुरक्षा, Wildlife Trafficking India
बिहार में 'वन्यजीव तस्करी' का सबसे बड़ा खुलासा: 3.70 करोड़ के खेल में पूर्व मंत्री का बेटा, VIP सिंडिकेट का पर्दाफ़ाश!

Tarun Kumar Kanchan

The most sensational wildlife smuggling case in Bihar! A former minister's son arrested in Jhanjharpur with leopard and deer skins. This bloody 3.70 crore rupee racket has links to VIPs, white-collar criminals, and big business.

बिहार में वन्यजीव तस्करी का अब तक का सबसे सनसनीखेज खुलासा! झंझारपुर में तेंदुआ और हिरण की खाल के साथ पूर्व मंत्री का बेटा गिरफ्तार। 3.70 करोड़ के इस खूनी कारोबार के तार VIPs, सफेदपोश और बड़े कारोबारियों से जुड़े हैं। जानें कैसे पलामू टाइगर रिजर्व से लेकर नेपाल तक फैला यह अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट हमारे जंगल के मूक नायकों को मौत के घाट उतार रहा है। क्या सिर्फ छोटे प्यादों पर गिरेगी गाज, या सरगना भी पकड़े जाएंगे? पूरी रपट पढ़ें और जानें जंगल की सुरक्षा पर मंडराता यह बड़ा ख़तरा।

जंगल के हीरो संकट में - कौन है उनकी जान का सौदागर?

यह सिर्फ एक आपराधिक खबर नहीं है; यह हमारे राष्ट्रीय गौरव पर एक करारा प्रहार है। बिहार के मधुबनी जिले के झंझारपुर से वन्यजीव तस्करी के जिस भयावह नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है, उसने पूरे देश को सकते में डाल दिया है। सवाल सीधा और तीखा है: कैसे होगी जंगली जानवरों की रक्षा, जब उनकी जान के पीछे अंतरराज्यीय संगठित गिरोह काम कर रहा हो? और इससे भी बड़ा खुलासा यह है कि इस खूनी कारोबार की तारें सफेदपोश नेताओं और नामी-गिरामी व्यवसायियों से जुड़ी हैं। जंगल के मूक नायकों पर मंडराता यह ख़तरा अब हमारे दरवाज़े तक आ पहुंचा है।

पूर्व मंत्री के पुत्र की गिरफ्तारी ने खोली VIP क्राइम की परत

सनसनीखेज मोड़ तब आया जब वन विभाग की टीम ने गुप्त सूचना के आधार पर झंझारपुर में छापेमारी की। इस कार्रवाई में एक शक्तिशाली तेंदुआ और दो मासूम हिरण (चितल) की खाल बरामद हुई।

पकड़े गए चार आरोपितों में एक नाम ऐसा था, जिसने सबको चौंका दिया। राज्य सरकार के पूर्व मंत्री स्वर्गीय रूपनारायण झा के पुत्र पंकज कुमार झा। एक राजनीतिक रूप से समृद्ध और प्रभावशाली परिवार के व्यक्ति का इस संगीन अपराध में शामिल होना, सत्ता और अपराध के खतरनाक गठजोड़ की ओर इशारा करता है। यह घटना सिर्फ कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं, बल्कि यह वीआईपी क्राइम की वह परत है, जिसे अब बेनकाब करना नितांत आवश्यक है।

 3.70 करोड़ का 'मौत का खेल': पलामू से मोतिहारी तक फैला ख़ूनी सिंडिकेट

गिरफ्तार तस्करों के कबूलनामे ने इस पूरे रैकेट की भयावह गहराई खोल दी है। जांच में सामने आया है कि झंझारपुर इस अंतरराज्यीय सिंडिकेट का सिर्फ एक 'डील प्वाइंट' था, जहां खालों का सौदा होता था। जब्त की गई इन खालों के बदले कुल 3.70 करोड़ रुपये का लेन-देन होना था।

 डील का ब्योरा: 2.2 करोड़ रुपये मुजफ्फरपुर के तस्कर को और 1.5 करोड़ रुपये पूर्वी चंपारण के एक नामी ज्वेलरी शोरूम के मैनेजर को भेजे जाने थे।

 अंतरराज्यीय कनेक्शन: खालों के तार झारखंड के गौरव पलामू टाइगर रिजर्व पार्क से जुड़े होने की आशंका है। इसका मतलब है कि यह मौत का कारोबार झारखंड से शुरू होकर बिहार के संवेदनशील जंगलों (VTR समेत) और नेपाल तक फैला है।

केंद्रीय एजेंसियों और कोलकाता की विशेष टीम की लंबी निगरानी ने इस घिनौने व्यापार पर से पर्दा हटाया है, लेकिन यह साफ़ है कि यह एक टिप ऑफ़ द आइसबर्ग है।

 परदे के पीछे के सरगना : सिर्फ 'प्यादों' पर गिरेगी गाज?

सबसे गंभीर पहलू यह है कि पकड़े गए पंकज झा और उनके साथी (अजय कुमार झा, धीरज कुमार श्रीवास्तव, और चंदन कुमार सिंह) तो मात्र 'प्यादे' थे, जिन्हें काम के बदले 30 हजार से 5 लाख रुपये तक का मामूली कमीशन मिलना था।

असली खतरा वे पाँच बड़े मास्टरमाइंड्स हैं, जिनके नाम इन प्यादों ने उगले हैं, लेकिन जो अब भी अंडरग्राउंड हैं। जब तक मुजफ्फरपुर स्थित माड़ीपुर के सुधाकर कुमार, तपन जी, राकेश उर्फ गुड्डू भैया और संदीप बॉस जैसे सरगनाओं को दबोचकर जेल की सलाखों के पीछे नहीं डाला जाता, तब तक इस सिंडिकेट को जड़ से खत्म करना महज एक सपना रहेगा।

 डीएफओ भास्कर चंद्र भारती ने मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रिमांड पर लेकर पूछताछ की बात कही है। सभी आरोपितों पर वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

जंगल को बचाना है, तो VIP तस्करों को दंडित करना होगा

यह घटना एक वेक-अप कॉल है। यह दिखाता है कि वन्यजीवों की सुरक्षा सिर्फ जंगल के गार्डों का काम नहीं है, बल्कि यह एक राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा बन चुका है। जब राजनीतिक रसूख वाले लोग और बड़े कारोबारी इस अपराध में शामिल होते हैं, तो जांच की निष्पक्षता और अपराधियों को दंडित करने की प्रक्रिया पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग जाता है।

अगर हम अपने टाइगर रिजर्व और राष्ट्रीय पशुओं को बचाना चाहते हैं, तो सरकार को इस सिंडिकेट के VIP कनेक्शन को बिना किसी राजनीतिक दबाव के तोड़ना होगा।

पाठकों, क्या आपको लगता है कि सिर्फ छोटे तस्करों को पकड़ने से यह कारोबार रुक पाएगा? अपनी राय कमेंट बॉक्स में दें!

 💥तरुण कुमार कंचन

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 कीवर्ड्स: वन्यजीव तस्करी, बिहार, VIP कनेक्शन, पलामू टाइगर रिजर्व, तेंदुआ खाल, हिरण खाल, जंगल सुरक्षा, Wildlife Trafficking India

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