बिहार की राजनीति से बड़ी खबर! अब इतिहास बनने जा रहा है 500 साल पुराना नाम 'पटना'। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किया एलान, वापस लौटेगा 2000 साल पुराना 'पाटलिपुत्र' का गौरव। जानिए पूरा ऐतिहासिक सफर कंचनवाणी पर।
कंचनवाणी डेस्क
पटना । बिहार की सियासत और इतिहास के पन्नों से इस वक्त की सबसे बड़ी खबर
सामने आ रही है। करीब 500 साल पुराना नाम 'पटना' अब जल्द ही इतिहास के पन्नों में सिमटने
जा रहा है। बिहार की राजधानी को एक बार फिर वही नाम मिलने जा रहा है, जिससे 2000 साल
पहले इसकी ख्याति पूरी दुनिया में थी। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने एक ऐतिहासिक
फैसला लेते हुए एलान किया है कि पटना का नाम बदलकर अब दोबारा 'पाटलिपुत्र' किया जाएगा।
मुख्यमंत्री ने फुलवारीशरीफ के नदियावां गांव में आयोजित प्रखण्ड सहयोग-सह-जन
कल्याण शिविर कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यह घोषणा की। उन्होंने कहा कि जल्द ही
कैबिनेट में नाम बदलने का प्रस्ताव लाया जाएगा, ताकि इस ऐतिहासिक महानगर को उसका प्राचीन
गौरव वापस मिल सके।
कैबिनेट में जल्द आएगा प्रस्ताव
नदियावां में जनता को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा, पटना
शहर की पहचान अब इसके प्राचीन नाम 'पाटलिपुत्र' के रूप में ही
होनी चाहिए। यह मगध की पावन भूमि और महान साम्राज्यों की राजधानी रही है। इस विषय
पर लंबे समय से चर्चा चल रही थी और अब सरकार ने इस विरासत को पुनर्जीवित करने का
मन बना लिया है। इसके लिए जल्द ही आधिकारिक तौर पर कैबिनेट में प्रस्ताव लाया
जाएगा।
क्यों खास है पाटलिपुत्र?
यह महज एक नाम का बदलाव नहीं है, बल्कि उस कालखंड को नमन है जब यह शहर
भारत की शक्ति का केंद्र हुआ करता था। 600 ईसा पूर्व से लेकर मौर्य, नंद, शुंग और गुप्त
राजवंशों के दौरान पाटलिपुत्र ही पूरे अखंड भारत की केंद्रीय और प्रशासनिक राजधानी
थी।
स्वर्ण युग और मौर्य काल की भव्यता:
महान सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और चक्रवर्ती सम्राट अशोक के काल में यह दुनिया के
सबसे बड़े और वैभवशाली शहरों में गिना जाता था। यूनानी राजदूत मेगास्थनीज ने अपनी
पुस्तक 'इंडिका' में यहाँ के लकड़ी
के बने भव्य महलों, विशाल सुरक्षा दीवारों और नगर व्यवस्था का ऐसा वर्णन किया
है जिसे पढ़कर आज भी गर्व होता है।
ज्ञान और विज्ञान का वैश्विक केंद्र:
गुप्त साम्राज्य के दौरान यही पाटलिपुत्र महान गणितज्ञ और खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट
की कर्मभूमि बना, जिन्होंने दुनिया को शून्य (0) का ज्ञान दिया।
समय के थपेड़ों और बदलती परिस्थितियों के कारण कालान्तर में इसका राजनीतिक
महत्व भले कम हुआ हो, लेकिन कुम्हरार और बुलंदीबाग जैसी जगहों पर आज भी खुदाई में
निकलने वाले मौर्यकालीन अवशेष इसकी अमर कहानी बयां करते हैं।
पुष्पपुरी से पाटलिपुत्र और पटना :
बिहार की इस ऐतिहासिक राजधानी का नाम समय और शासकों के साथ बदलता रहा है। आइए
इसके पौराणिक काल से लेकर आज तक के सफर को सिलसिलेवार ढंग से समझते हैं:
कुसुमपुर और पुष्पपुरी
रामायण और महाभारत काल के शुरुआती ग्रंथों में इस क्षेत्र को 'कुसुमपुर' या 'पुष्पपुरी' कहा गया है। इसका
मुख्य कारण यह था कि इस इलाके में फूलों (विशेषकर पलाश और गुलाब) की बड़े पैमाने
पर खेती होती थी।
पाटलिपुत्र (छठी शताब्दी ईसा पूर्व)
यह इस शहर का सबसे प्रतापी नाम रहा। 460 ईसा पूर्व में अजातशत्रु के पुत्र और
उत्तराधिकारी उदयन ने मगध की राजधानी को राजगृह (राजगीर) से हटाकर यहाँ स्थानांतरित
किया और इस नए महानगर की नींव रखी। 'पाटल' (एक विशेष प्रकार का फूल) के नाम पर इसे 'पाटलिपुत्र' कहा गया।
पालिबोथरा (तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व)
जब मौर्य काल में यूनानी राजदूत मेगास्थनीज चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया, तो विदेशी उच्चारण
के कारण उसने अपनी पुस्तक 'इंडिका' में इसे 'पालिबोथरा' (Palibothra) के नाम से दर्ज किया, जिससे इसे वैश्विक
पहचान मिली।
पट्टन या पटना (1541 ईस्वी - शेरशाह सूरी काल)
मध्यकाल तक आते-आते यह महान शहर काफी बिखर चुका था। साल 1541 में अफगान शासक शेरशाहसूरी ने इस क्षेत्र के सामरिक और व्यापारिक महत्व को समझा। उसने यहाँ एक मजबूत
किले का निर्माण कराया और इसे नए सिरे से बसाकर नाम दिया— पटना। संस्कृत के 'पट्टन' (यानी बंदरगाह या
व्यापारिक नगर) से बिगड़कर यह नाम बना, क्योंकि यह गंगा, सोन और गंडक के
संगम पर व्यापार का बड़ा केंद्र था। कुछ विद्वान इसे स्थानीय 'पटन देवी' के नाम से भी
जोड़ते हैं।
अजीमाबाद (1704 ईस्वी - मुगल काल)
मुगल बादशाह औरंगजेब के शासनकाल में उसके पोते शहजादा अजीम-उश-शान को बिहार का
सूबेदार बनाया गया। उसने शहर का नाम बदलकर अपने नाम पर 'अजीमाबाद' रख दिया। हालांकि, यह नाम आम जनता की
जुबान पर नहीं चढ़ सका और लोग इसे पटना ही बुलाते रहे।
आधुनिक पटना (ब्रिटिश काल से अब तक)
अंग्रेजों के शासनकाल में और आजादी के बाद भी इसका नाम पटना ही रहा। साल 1912
में जब बंगाल विभाजन के बाद बिहार-ओडिशा एक नया प्रांत बना, तो पटना को इसकी
राजधानी बनाया गया। बाद में 1 अप्रैल 1936 को ओडिशा और 15 नवंबर 2000 को झारखंड
इससे अलग हो गए, लेकिन पटना बिहार की धड़कन और राजधानी के रूप में अडिग रहा।
आधुनिक संदर्भ में प्राचीन गौरव की वापसी
संक्षेप में कहें तो, जिस शहर को 2000 साल पहले 'पाटलिपुत्र' के रूप में
वैश्विक ख्याति मिली थी, उसे आज से करीब 485 साल पहले (1541 ई.) शेरशाह सूरी ने 'पटना' नाम दिया था। अब
करीब 5 शताब्दी बाद इतिहास का पहिया एक बार फिर घूमा है। बिहार सरकार का यह फैसला
आधुनिक संदर्भ में राज्य की प्राचीन अस्मिता और गौरवशाली विरासत को पुनर्जीवित
करने की एक बड़ी सांस्कृतिक कोशिश है। अब देखना यह है कि कैबिनेट की मुहर के बाद
कागजों से लेकर जनमानस तक 'पाटलिपुत्र' नाम दोबारा कितनी जल्दी अपनी पुरानी चमक
बिखेरता है।
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