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| झारखंड से निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी भाजपा के सहयोग से पहुंचे राज्यसभा। साभार - सोशल मीडिया। |
झारखंड राज्यसभा चुनाव में बड़ा सियासी उलटफेर! 56 विधायकों के भारी संख्या बल के बावजूद कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा हारे, एनडीए समर्थित परिमल नथवानी ने मारी बाजी। पढ़ें कंचनवाणी पर पूरी इनसाइड स्टोरी चुटीले अंदाज में।
तरुण कुमार कंचन
देवघर। कहते हैं राजनीति में 'अंकगणित' ज़रूरी होता है, लेकिन झारखंड में गुरुवार
को जो हुआ, उसने साबित कर दिया कि
असली खेल 'केमिस्ट्री' और 'मैनेजमेंट' का है। संख्या बल की भारी-भरकम तिजोरी लेकर बैठी सत्तारूढ़ इंडिया
गठबंधन को भाजपा ने ऐसा चश्मा पहनाया कि कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा बस हाथ मलते
रह गए और निर्दलीय प्रत्याशी परिमल नथवानी जीत गए।
हाँ, गनीमत इस बात की रही कि इस बार बेचारी वोटिंग
मशीन की आबरू बच गई; हार का ठीकरा उस पर नहीं, बल्कि भीतरघातियों पर फूटा है।
गणित फेल, मैनेजमेंट पास!
81 सदस्यीय विधानसभा में
इंडिया गठबंधन 56 विधायकों का सीना फुलाए
बैठा था, जबकि एनडीए के पास सिर्फ 24 की 'चिल्लर' थी। लेकिन जब बक्सा खुला, तो इंडिया गठबंधन की
एकजुटता के दावों की हवा निकल चुकी थी।
बैद्यनाथ
राम (झामुमो): 30 वोट पाकर झारखंड के पहले
दलित राज्यसभा सांसद बने। (महागठबंधन की लाज बस यहीं बची)।
परिमल
नथवानी (निर्दलीय/एनडीए समर्थित) : 28 वोट लेकर सीधे दिल्ली का
टिकट कटा लिया।
प्रणव
झा (कांग्रेस) : सिर्फ 20 वोटों पर सिमट कर 'रनर-अप' की ट्रॉफी से संतोष करना पड़ा।
ट्विस्ट
ऑफ द डे : मतगणना में तीन वोट 'अमान्य' (रिजेक्ट) पाए गए।
कानाफूसी तो यह भी है कि इनमें से दो नथवानी जी के हिस्से के थे और एक झा जी का, लेकिन जब खेल ही निराला हो, तो अधिकारिक पुष्टि की
परवाह किसे है?
नथवानी की हैट्रिक: 'झारखंड मेरी कर्मभूमि है बाबू!'
इस जीत के साथ ही कॉर्पोरेट जगत और राजनीति के उस्ताद परिमल नथवानी
ने झारखंड से राज्यसभा पहुंचने की हैट्रिक (2008
से 2020 के बाद अब फिर) लगा दी है। जीत का सर्टिफिकेट हाथ में आते ही
उन्होंने दिल्ली दरबार (पीएम मोदी, अमित शाह और एनडीए
नेतृत्व) का आभार जताया और मुस्कुराते हुए कहा— "झारखंड मेरी कर्मभूमि है, विकास रुकने नहीं दूंगा।"
कहीं गम, कहीं 'गुलाल'
नतीजे आते ही विधानसभा का नजारा देखने लायक था। एनडीए खेमे में ऐसे
ढोल-नगाड़े बजे मानो सरकार ही बना ली हो। दूसरी तरफ, महागठबंधन
के सिपहसालार कोने में खड़े होकर एक-दूसरे का कुर्ता नाप रहे थे और 'क्रॉस वोटिंग' करने वाले 'विभीषणों' की लिस्ट तैयार करने में
जुटे थे।
56 विधायक होने के बावजूद दूसरी सीट गंवा देना...
इसे कहते हैं 'घर में थे छप्पन भोग, फिर भी भूखे रह गए लोग!' अब देखना यह है कि
कांग्रेस इस झटके से कब उबर पाती है।
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