google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: बिहार में 'बुर्का प्रतिबंध' : धार्मिक स्वतंत्रता और व्यापारिक सुरक्षा की संवैधानिक परीक्षा

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Wednesday, 7 January 2026

बिहार में 'बुर्का प्रतिबंध' : धार्मिक स्वतंत्रता और व्यापारिक सुरक्षा की संवैधानिक परीक्षा

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बिहार में आभूषण कारोबारियों द्वारा हिजाब पर प्रतिबंध धार्मिक स्वतंत्रता और व्यापारिक सुरक्षा की संवैधानिक परीक्षा है। क्या आशंका पर लिया गया यह फैसला संवैधानिक रूप से टिक पाएगा? जानिए इस संवेदनशील मुद्दे का गहरा विश्लेषण, कानूनी पहलू और सामाजिक परिणाम।

Tarun Kumar Kanchan

A directive issued by the All India Jewellers and Gold Smiths Federation (AIJGF) in Bihar—prohibiting the sale or purchase of jewellery to customers wearing hijabs, burqas, niqabs, veils, masks, or helmets. At first glance, it appears to be a matter of security. However, this decision directly questions the fundamental principles of the Indian Constitution and religious freedom.

बिहार में ऑल इंडिया ज्वेलर्स एंड गोल्ड स्मिथ फेडरेशन (AIJGF) द्वारा जारी किया
गया निर्देश—जिसमें हिजाब, बुर्का, नकाब, घूंघट, मास्क या हेलमेट पहनकर आने वाले ग्राहकों को गहनों की
खरीद-बिक्री से रोका गया है—पहली नज़र में सुरक्षा का मामला लगता है। लेकिन यह फैसला
भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों और धार्मिक स्वतंत्रता पर सीधा सवाल खड़ा
करता है।

क्या व्यापारिक सुरक्षा के नाम पर किसी विशेष धार्मिक पहचान को संदिग्ध ठहराना उचित है? और क्या आशंका के आधार पर लिए गए ऐसे निर्णय संवैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं? इस ब्लॉग पोस्ट में हम इस संवेदनशील मुद्दे के कानूनी, सामाजिक और व्यावहारिक पहलुओं का गहरा विश्लेषण करेंगे।

आशंका पर आधारित फैसला: क्या कोई 'ठोस तथ्य' है?

AIJGF के इस निर्देश की नींव उन अनिश्चित आशंकाओं पर टिकी है कि चेहरा ढंकने वाले कपड़े चोरी या लूट में सहायक हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है: क्या बिहार में बुर्का या हिजाब पहनकर किसी महिला को आभूषण चोरी या सर्राफा लूट के मामले में पकड़ा गया है?

  सार्वजनिक रूप से अब तक ऐसी कोई पुष्ट घटना सामने नहीं आई है। जबकि मुंबई या अन्य शहरों की घटनाओं का हवाला दिया जा रहा है, बिहार में स्थानीय आंकड़ों का अभाव इस फैसले की संवैधानिकता पर संदेह पैदा करता है। संवैधानिक विशेषज्ञों के अनुसार, "किसी भी मौलिक अधिकार पर प्रतिबंध केवल 'आशंका' के आधार पर नहीं, बल्कि 'ठोस तथ्यों' और वास्तविक आवश्यकता के आधार पर ही लगाया जाना चाहिए।"

संविधान की कसौटी: अनुच्छेद 25 और 'युक्तिसंगत प्रतिबंध'

यह प्रतिबंध दो प्रमुख संवैधानिक अनुच्छेदों के बीच एक तनाव पैदा करता है:

अनुच्छेद 25 (धार्मिक स्वतंत्रता): यह प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने और धार्मिक आचरण की स्वतंत्रता देता है। हिजाब, जिसे अदालतों ने भी एक धार्मिक आचरण माना है, इसी अनुच्छेद के तहत सुरक्षित है।

अनुच्छेद 19(1)(g) (व्यावसायिक स्वतंत्रता) : यह कारोबारियों को अपना व्यवसाय चलाने और उसकी सुरक्षा के लिए उपाय तय करने का अधिकार देता है।

संविधान यहां "युक्तिसंगत प्रतिबंध" (Reasonable Restriction) का सिद्धांत लागू करता है। पूर्व सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों और कानूनी जानकारों के मुताबिक, कोई भी प्रतिबंध तब असंवैधानिक हो जाता है जब वह:

·      किसी एक समुदाय पर असंगत (Disproportionate) प्रभाव डाले।

·      वैकल्पिक उपायों पर विचार किए बिना सीधे लागू कर दिया जाए।

·      संदेह को नीति का आधार बना ले।

यह फैसला स्पष्ट रूप से मुस्लिम समुदाय की महिलाओं को लक्षित करता है और आनुपातिकता (Proportionality) के सिद्धांत का उल्लंघन करता प्रतीत होता है।

 हिजाब को नकाब, मास्क और हेलमेट के बराबर क्यों रखना?

यह निर्देश हिजाब को नकाब, घूंघट, मास्क और हेलमेट जैसी गैर-धार्मिक या आंशिक रूप से धार्मिक पहचानों के साथ एक ही श्रेणी में रखता है। यदि समस्या केवल चेहरा ढंकने से है, तो कारोबारियों द्वारा कम दखल देने वाले वैकल्पिक उपाय क्यों नहीं अपनाए गए?

पहचान का सत्यापन: क्या महिला स्टाफ के माध्यम से ग्राहक की पहचान की अस्थाई और निजी जाँच संभव नहीं थी?

सीसीटीवी और प्रोटोकॉल: सुरक्षा को मजबूत करने के लिए अधिक कैमरे लगाना या किसी सुरक्षित क्षेत्र में चेहरा दिखाने की व्यवस्था करना क्यों नहीं अपनाया गया?

संवैधानिक विशेषज्ञ सवाल उठाते हैं कि जब राज्य या संगठन सीधे प्रतिबंध का रास्ता चुनते हैं, तो वह "नीति नहीं, बल्कि पूर्वाग्रह" बन जाता है। धार्मिक प्रतीक को सुरक्षा खतरे के रूप में देखना सहिष्णु लोकतंत्र के मूल विचार के विपरीत है।

सुप्रीम कोर्ट और हिजाब: क्या संदर्भ बनता है?

कर्नाटक हिजाब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ भले ही विभाजित रही हो, लेकिन एक बात स्पष्ट रही—

हिजाब को कानून-व्यवस्था या सुरक्षा के नाम पर स्वतः प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता।

न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने अपने फैसले में लिखा था कि संविधान सहिष्णुता की अपेक्षा करता है, न कि अनुरूपता की।”

यानी लोकतंत्र में समाधान यह नहीं कि हर अलग पहचान को संभावित खतरा मान लिया जाए।

 सामाजिक और आर्थिक परिणाम

इस प्रतिबंध के गंभीर सामाजिक और आर्थिक परिणाम हो सकते हैं। जमात-ए-इस्लामी हिंद पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि मुस्लिम महिलाएं अपने धार्मिक मूल्यों से समझौता नहीं करेंगी। नतीजा साफ है—

बाजारों से दूरी : धीरे-धीरे महिलाएं अपने धार्मिक मूल्यों से समझौता न करते हुए आभूषण की दुकानों से दूरी बना सकती हैं।

आर्थिक बहिष्कार:: अप्रत्यक्ष रूप से यह एक समुदाय के आर्थिक बहिष्कार की स्थिति पैदा कर सकता है। 

सामाजिक अविश्वास: यह फैसला कारोबारी समुदाय और एक विशेष समुदाय के बीच सामाजिक अविश्वास की खाई को और चौड़ा करेगा।

यदि यह मामला अदालत में जाता है, तो कारोबारियों को यह साबित करना होगा कि यह प्रतिबंध आवश्यक, आनुपातिक और गैर-भेदभावपूर्ण था। बिना ठोस साक्ष्यों के, यह एक कठिन लड़ाई होगी।

हमें सुरक्षा चाहिए, संदेह नहीं

लोकतंत्र में सुरक्षा का मतलब यह नहीं है कि किसी विशेष पहनावे को अपराध का संकेत मान लिया जाए। संविधान डर से नहीं, भरोसे से चलता है। जब तक बुर्का या हिजाब पहनकर आभूषण चोरी की कोई ठोस, प्रमाणित घटना सामने नहीं आती, तब तक इस तरह का फैसला सामाजिक और संवैधानिक दोनों रूप से कमजोर बना रहेगा। सुरक्षा के नाम पर संदेह की राजनीति को बढ़ावा देना, धार्मिक स्वतंत्रता को खतरे में डाल सकता है, जिसकी रक्षा करना संविधान की प्राथमिक जिम्मेदारी है।

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