google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: बिहार की सियासत में 'दही-चूड़ा' की मिठास या नए गठबंधन की कड़वाहट? खरमास बाद बड़े बदलाव के संकेत

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Tuesday, 13 January 2026

बिहार की सियासत में 'दही-चूड़ा' की मिठास या नए गठबंधन की कड़वाहट? खरमास बाद बड़े बदलाव के संकेत

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चेहरा पुराना, तेवर नए: क्या समृद्धि यात्रा से नीतीश फिर से 'बड़े भाई' की भूमिका में लौटेंगे?"

बिहार की राजनीति में 16 जनवरी से बड़े बदलाव के संकेत! जानें नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा, PK और RCP सिंह की वापसी और भाजपा-जदयू के बीच जारी खींचतान का पूरा विश्लेषण।

Tarun Kumar Kanchan

 In Bihar politics, "Kharmas" (a month considered inauspicious for auspicious activities) isn't just confined to the calendar, it also symbolizes a political silence. But this silence is about to be broken with Makar Sankranti on January 14th.


 मौसम बदला, अब मिजाज बदलेगा

बिहार की राजनीति में 'खरमास' (एक ऐसा महीना जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है) सिर्फ पंचांग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह राजनीतिक सन्नाटे का भी प्रतीक होता है। लेकिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ ही यह सन्नाटा टूटने वाला है। 16 जनवरी से बिहार की राजनीति में जो हलचल शुरू होने वाली है, उसके केंद्र में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। चर्चाएं आम हैं कि क्या नीतीश कुमार फिर से पाला बदलने की तैयारी में हैं? क्या भाजपा के साथ उनका 'हनीमून पीरियड' खत्म हो गया है? और क्या प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह जैसे पुराने रणनीतिकार फिर से नीतीश के 'थिंक टैंक' का हिस्सा बनने जा रहे हैं? तो ऐसा कह सकते हैं-
"हवाओं ने फिर अपना रुख बदला है, सियासत के आंगन में नया मंजर ढला है, यहाँ मकर संक्रांति पर सिर्फ तिलकुट नहीं कुटता, यहाँ तो कुर्सियों के लिए नया गठबंधन पला है।"
 

 समृद्धि यात्रा : जनमत टटोलने की कवायद या शक्ति प्रदर्शन?

नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'यात्राएँ' रही हैं। जब भी वे किसी बड़े राजनीतिक संकट में होते हैं या किसी बड़े फैसले की दहलीज पर खड़े होते हैं, वे जनता के बीच निकल जाते हैं। 16 जनवरी से शुरू हो रही *'समृद्धि यात्रा'* इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।
 चंपारण से शुरुआत: ऐतिहासिक रूप से चंपारण गांधी जी की कर्मभूमि रही है और नीतीश कुमार के लिए भी यह हमेशा से लकी रहा है। यहाँ से यात्रा शुरू करने का सीधा संदेश है कि वे अपनी 'सेकुलर' और 'विकास पुरुष' वाली छवि को फिर से धार देना चाहते हैं।
मूल्यांकन का दौर: राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस यात्रा के जरिए नीतीश कुमार दो मुख्य बातों का परीक्षण (Testing) करना चाहते हैं। पहला, क्या आज भी बिहार की जनता के बीच उनका 'क्रेज' बरकरार है? दूसरा, भाजपा के साथ गठबंधन के बाद जनता की उनके प्रति क्या सोच है? क्या जनता भाजपा के बढ़ते प्रभाव को पसंद कर रही है या फिर वे अब भी नीतीश को ही अपना निर्विवाद नेता मानते हैं?

 
भाजपा का दबाव और 'मंत्रिमंडल'
की खींचतान

ऐसा लग रहा है कि भाजपा और जदयू के बीच पिछले कुछ हफ्तों से सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश कुमार पर मंत्रिमंडल विस्तार के लिए जबरदस्त दबाव बनाया है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने अपने कोटे से मंत्रियों के नाम तय करके नीतीश कुमार को सौंप दिए हैं। लेकिन, नीतीश कुमार इस विस्तार को टालते आ रहे हैं।
बिहार के सियासत को जाननेवाले बरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार सिंह कहते हैं कि यह देरी महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। नीतीश कुमार जानते हैं कि अगर उन्होंने भाजपा की शर्तों पर मंत्रिमंडल विस्तार किया, तो सरकार में उनकी पकड़ ढीली हो सकती है। समृद्धि यात्रा पर निकलकर उन्होंने भाजपा को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता सरकार का विस्तार नहीं, बल्कि जनता का मूड समझना है।
 

प्रशांत किशोर (PK) की 'घर वापसी' की पटकथा

बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा 'प्रशांत किशोर' (PK) की भूमिका को लेकर है। जनसुराज के माध्यम से बिहार के गांवों की खाक छान रहे PK को लेकर खबर है कि वे फिर से नीतीश कुमार के लिए 'बड़ी भूमिका' निभा सकते हैं।
"कहते हैं कि पुरानी डायरी के पन्ने चाहे कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं, रणनीतिकार उन्हें फिर से पढ़ना नहीं भूलते। पीके और नीतीश का रिश्ता भी उस उलझी हुई रील की तरह है, जिसे सुलझाने की कोशिश में हर बार एक नई फिल्म बन जाती है।"
 
पीके की रणनीति : कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को यह डेटा और फीडबैक दिया है कि अगले चुनाव में महागठबंधन (राजद और कांग्रेस) का असर खत्म होने वाला है। पीके का मानना है कि बिहार की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है।
गठबंधन का भविष्य: यदि पीके और नीतीश फिर से एक साथ आते हैं, तो यह बिहार में एक 'तीसरे मोर्चे' या जदयू को नए सिरे से विशाल बनाने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इसे कुछ लोग भाजपा के खिलाफ एक बड़ा 'षड्यंत्र' भी मान रहे हैं, ताकि नीतीश को भाजपा के प्रभाव से मुक्त किया जा सके।
 

आरसीपी सिंह: "रिश्ते कभी टूटे ही नहीं थे"

 इस पूरी कहानी में सबसे चौंकाने वाला मोड़ आरसीपी सिंह का बयान है। एक समय में नीतीश कुमार के 'हनुमान' कहे जाने वाले आरसीपी सिंह, जिन्होंने भाजपा के करीब जाने के चक्कर में जदयू से नाता तोड़ लिया था, अब फिर से नीतीश के गुणगान कर रहे हैं।
आरसीपी सिंह ने हाल ही में स्पष्ट रूप से कहा कि "मेरे और नीतीश जी के बीच कभी कोई वास्तविक दूरी थी ही नहीं। हम 25 सालों से साथ हैं और हम एक-दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं।" इस बयान के तीन बड़े राजनीतिक मायने हैं:
 
जदयू में वापसी का संकेत: आरसीपी सिंह का यह कहना कि 'रास्ते कभी अलग नहीं हुए', यह इशारा है कि खरमास के बाद वे औपचारिक रूप से जदयू में वापस आ सकते हैं।
पुराने कुनबे को जोड़ना: नीतीश कुमार समझ चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए उन्हें अपने उन पुराने साथियों की जरूरत है जो संगठन को समझते हैं। आरसीपी सिंह संगठन के आदमी रहे हैं।
भाजपा के लिए चेतावनी: आरसीपी सिंह जो कभी भाजपा के करीब थे, अगर वे वापस नीतीश के पाले में आते हैं, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका होगा।
जहाँ आरसीपी सिंह का जिक्र है, वहां यह व्यंग्य सटीक बैठेगा:
"सियासत में 'हनुमान' भी बदलते हैं और 'राम' भी। जो कल तक अपनों की कतार से बाहर थे, आज वही वफादारी का सर्टिफिकेट लेकर सबसे आगे खड़े हैं। आखिर दही-चूड़ा की मिठास कड़वे रिश्तों को भी चाशनी में डुबो ही देती है।
 

क्या राजद और महागठबंधन का पत्ता साफ होगा?

प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह के सक्रिय होने के पीछे एक और बड़ी संभावना छिपी है— राजद (RJD) को अलग-थलग करना। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार अब राजद के साथ जाने के बजाय अपने पुराने कैडर को मजबूत करना चाहते हैं। पीके का नीतीश को यह समझाना कि 'राजद खत्म हो जाएगी', एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि नीतीश कुमार को एक 'स्वतंत्र ताकत' के रूप में पेश किया जा सके।
 

 भविष्य के गर्भ में क्या है?

बिहार की राजनीति 'संभावनाओं का खेल' है। खरमास खत्म होने के बाद 16 जनवरी से 31 जनवरी के बीच बिहार में कुछ बड़े घटनाक्रम हो सकते हैं। जैसे-
 नीतीश कुमार अपनी यात्रा के बाद भाजपा के साथ नए सिरे से सौदेबाजी (Bargaining) करेंगे।
आरसीपी सिंह और संभवतः प्रशांत किशोर की टीम जदयू के रणनीतिक ढांचे में शामिल होगी।
 और बिहार सरकार का स्वरूप बदल सकता है, जहाँ नीतीश कुमार खुद को 'छोटा भाई' मानने के बजाय 'बड़े भाई' की भूमिका में फिर से स्थापित करेंगे।
सच्चाई क्या है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि नीतीश कुमार ने अपनी 'समृद्धि यात्रा' और पुराने साथियों से संपर्क साधकर भाजपा और विपक्षी दलों, दोनों की नींद उड़ा दी है। भाजपा विरोधी खेमा इसे एक मास्टरस्ट्रोक मान रहा है, जबकि भाजपा इसे नीतीश कुमार की 'दबाव की राजनीति' देख रही है।
माना जा रहा है कि बिहार के सियासी मंच पर पर्दे उठ चुके हैं, पात्र तैयार हैं, और मकर संक्रांति के बाद 'महाभारत' शुरू होने वाला है।
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आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है (Engagement Questions):

1.     पलटीमार या मास्टरस्ट्रोक? क्या नीतीश कुमार का पुराने साथियों की ओर मुड़ना भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति है?

2.     भाजपा बनाम नीतीश: मंत्रिमंडल विस्तार में देरी का असली कारण क्या है?

3.     PK का प्रभाव: क्या आप सहमत हैं कि बिहार की जनता अब तीसरे विकल्प की तलाश में है?

4.     समृद्धि यात्रा: क्या 2025 में भी नीतीश की 'विकास पुरुष' वाली छवि वोट दिला पाएगी?

5.     भविष्य की खिचड़ी: मकर संक्रांति के बाद आप किसकी सरकार बनते देख रहे हैं?

अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

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