 |
बिहार के एक बूथ पर वोट करने के लिए लगी भीड़ । फाइल फोटो
|
Bihar election 2025: Every candidate and leader is promising to solve the problems of housing, food, and shelter. Pledges are being made to provide education and employment to all. Leaders are promising the public that if their government comes to power, Biharis will prosper and Bihar will become prosperous. बिहार में विधानसभा चुनाव का शोरगुल चरम पर है। दोनों चरणों के लिए नामांकन की प्रक्रिया खत्म हो चुकी है ।उम्मीदवार तय हो चुके हैं । चुनाव प्रचार चल रहा है। इस चुनावी जंग में दंगलवाज मैदान में उतरे हुए हैं और हर गली, हर नुक्कड़ पर अपनी बातें तो रख ही रहे हैं, साथ ही समर्थकों और बड़े खिलाड़ी भी जगह-जगह चीख - पुकार रहे हैं। सब अपने- अपने उम्मीदवारों के पक्ष में
निरीह जनता के सामने नतमस्तक होकर वोट मांग रहे हैं ।
नेताओं में आपाधापी, मुद्दों पर वार । सभी अभी भी वही कर रहे हैं जो भारत की आजादी के बाद शुरू हुआ था। हर उम्मीदवार, हर नेता जनता से मकान, आहार और आवास की समस्या खत्म करने की बात कर रहे हैं। सबको शिक्षा और रोजगार देने का संकल्प लिया जा रहा है।
समृद्ध बिहारी और समृद्ध बिहार बनेगा
नेता जनता से वादा कर रहे हैं कि उनकी सरकार आयेगी तो समृद्ध बिहारी और समृद्ध बिहार बनेगा। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पिछले सरकारों में किए गए काम को मुद्दा बनाए हुए हैं और वादा कर रहे हैं की अगली सरकार में एक करोड़ लोगों को नौकरी देंगे इधर विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव हर परिवार में सरकारी नौकरी देने की बात कर रहे हैं उनका दावा है की 20 माह में ही हर परिवार में सरकारी सेवक होगा। जब प्रधानमंत्री मोदी बिहार में चुनावी सभा समस्तीपुर और बेगूसराय में कर रहे थे तो उन्होंने कहा कि दुनिया में सबसे सस्ती डाटा भारत सरकार ने आपको उपलब्ध कराया है। इस पर जनसुराज के सूत्रधार प्रशांत किशोर कहते हैं कि प्रधानमंत्री जी हमें डाटा नहीं, बिहार को फैक्ट्री चाहिए। हमें बिहार के बेटे को वापस करना है। हमें पलायन रोकना है। केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान कहते हैं, बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट। वहीं उनके विरोधी कह रहे हैं कि क्या हुआ बिहार फर्स्ट और बिहारी फर्स्ट का? मंत्री रहते चिराग पासवान ने बिहार में कितनी फैक्ट्रियां लाए हैं?
हिन्दुस्तान अखबार का चिंतन
 |
| हिन्दुस्तान का आलेख |
इसी संदर्भ में आज हिन्दुस्तान अखबार में उसके प्रधान संपादक शशि शेखर जी का आलेख छपा है । आलेख का शीर्षक है बिहार और ये चुनावी उम्मीदें। इसमें उन्होंने रोटी और रोजगार के नारे को मुख्य रूप से उठाया ही है, साथ ही उन्होंने उस पीड़ा का भी जिक्र किया है जिसे उन्होंने 25 वर्ष पूर्व अनुभव किया था। आंखों से देखा था। उस दृश्य को वे अब तक अपने दिल में
संवेदनाओं के साथ रखा है। यह कैसा बिहार है? उसे भूल नहीं पाए । उन्होंने लिखा कि हम अपने तीन सहयोगियों के साथ पटना से धनबाद जा रहे थे। बीच जाड़े की मरियल धूप में सड़क से कुछ दूर एक विचलित करने वाला दृश्य दिखाई दिया।
 |
| यह तस्वीर सिर्फ प्रतिमान है। |
हाड़ कंपकंपाती हवा में सिर्फ पतली सी धोती तन पर लपेटे एक महिला कीचड़ से भरे तालाब में नहाने के लिए प्रयासरत थी, लेकिन उसे उसकी शर्म रोक रही थी। क्यों? उसके पास बदलने को धोती नहीं थी और सड़क पर आती- जाती गाड़ियों में बैठे लोग उसे अमर्यादित भाव से देख रहे थे।
सोचिए! हमारे बिहार की क्या स्थिति थी। यहां के लोगों का जीवन स्तर कितना गिरा हुआ था । कैसे उसमें बदलाव आया ? इसका शशि शेखर जी ने बहुत ही सुंदर वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि बिहार और झारखंड तब एक राज्य हुआ करता था । अब दोनों राज्य अलग-अलग हो गए। धनबाद झारखंड का हिस्सा है और तब की डबल रोड अब बहुलेनीय राजमार्ग में तब्दील हो गई है ।
सरकारी आंकड़े का हवाला
गुजरे इन 25 सालों में यहां की महिलाओं की हालात में खास बदलाव आया है । उन्होंने सरकारी आंकड़े का हवाला दिया और लिखा कि बिहार की महिलाओं ने लंबी छलांग मारी है। मसलन सन 2000 में बिहार की महिलाओं की साक्षरता दर 33 फ़ीसदी थी जो अब 73.91% आंकी जाती है। सरकारी नौकरियों में स्त्रियों के लिए 35 फ़ीसदी आरक्षण के चलते सरकारी विभागों में महिला- पुरुष अनुपात में जबरदस्त परिवर्तन आया है। आज समूचे पुलिस बल में 37% की हिस्सेदारी महिलाएं निभा रही हैं। इसी तरह महिला शिक्षकों की कुल संख्या 2.71 लाख है।
उनकी अगली पंक्ति गजब ढा रहा है । वे लिखते हैं कि महिलाएं कलम के साथ डंडा और बंदूक चलाने तक की हैसियत रखने लगी हैं।
शिक्षा में डंका की वजह
बिहार की शिक्षा में बड़ा डंका कैसे लगा ? क्या बिहार की जनता यह सब देख और समझ नहीं रही है? इसी तरह शिक्षा से जुड़ी कई योजनाएं हैं , जो बिहार की बेटियों आगे बढ़ाने में कामयाब हो रही हैं। बिहार में स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड दिए जाते हैं। इसमें ऊंची शिक्षा लेने तक कोई सूद नहीं लगता है। बाद में लड़कों से चार प्रतिशत जबकि लड़कियों से मात्र एक प्रतिशत ब्याज लिया जाता है।
महिला सशक्तिकरण और मौजूदा चुनाव
शशि जी ने बिहार में महिला सशक्तिकरण का भी उल्लेख किया है । उन्होंने लिखा बिहार में लगभग 10.6 लाख जीविका स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं । इनसे 1.45 करोड़ महिलाएं अपनी आर्थिक तरक्की का रास्ता हम वार कर रही हैं। इसके साथ जीविका महिलाएं प्रतिवर्ष 15 हजार करोड़ रुपए का ऋण बैंकों से हासिल करती हैं । कर्ज की रकम लौटने में इनका रिकॉर्ड पुरुषों के मुकाबले कहीं बेहतर है । ऋण वापसी की इनकी दर 99 फ़ीसदी से ऊपर रही है।
शशि शेखर जी ने उम्मीद जताई है की 21वीं सदी की रजत जयंती वर्ष में आयोजित मौजूदा चुनाव में यहां की महिलाएं बेहतर बिहार के लिए वोट करेंगी।
बिहार के बेटों की विवशता
 |
| पलायन के लिए अभिशप्त बिहारी |
इसके बाद शशि जी ने बिहार के बेटों की विवशता और बिहार की कमी को भी उजागर किया है। उन्होंने महिला सशक्तिकरण के संदर्भ में लिखा कि उनके पति, पुत्र और कुटुंबी देश- दुनिया के अन्य हिस्सों में पलायन के लिए अभिशप्त हैं। रिश्तों की यह बेबस रिक्ति विकास के आंकड़ों को मुंह चढ़ती है। वजह? बिहार में कोई बड़ा कारखाना नहीं है। कृषि की काश्त घटती जा रही है। सूखा और बाढ़ भी लोगों को खेती किसानी से विमुख कर रहे हैं । कुल जमा 2 करोड़ 90 लाख लोग बिहार के बाहर जाकर अपना गुजारा करने पर मजबूर हैं।
सूझबूझ से करें मतदान
उन्होंने इशारा किया कि देश के दूसरे राज्यों के मुकाबले बिहार में इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है। शशि जी ने लघु और मध्यम श्रेणी के उद्योग के बारे में भी सचेत किया है। उन्होंने बिहार के कुछ लोगों से बात की और निष्कर्ष निकला कि अगली सरकार को सबसे पहले यहां रोजगार के अवसर तलाशने होंगे। बिहार में फैक्ट्रियां लगानी होगी ताकि बिहार के विकास में यहां के लोगों का उपयोग किया जा सके । उन्होंने एक बात और कही कि अब बिहार की बारी है। इसे प्रश्न में ही मत छोड़िए। अगर बिहार की बारी को लाना है तो हर मतदाता को पूरी सूझबूझ के साथ वोट करना होगा।
धन्यवाद।
तरुण कुमार कंचन
No comments:
Post a Comment