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Wednesday, 1 April 2026

बिहारशरीफ भगदड़: लालच और मनमानी से उपजा अपराध है जिसने छीनी 8 जानें

 



आस्था के नाम पर अत्याचार! बिहारशरीफ के शीतला मंदिर हादसे में 8 मौतें: चढ़ावे के लालच में पंडा-पुजारियों की मनमानी और श्रद्धालुओं पर अमानुषिक व्यवहार। जानें व्यवस्था पर चोट करती पूरी रपट।

Tarun Kumar Kanchan

मुजफ्फरपुर ।  मंदिर वह पवित्र स्थान जहाँ मनुष्य शांति और आस्था की तलाश में आता है। मंगलवार को बिहारशरीफ के शीतला मंदिर में हुए हृदयविदारक हादसे ने इस पवित्र भावना पर गहरी चोट की है। यह घटना स्पष्ट करती है कि मंदिर को जब धर्मस्थल से बदलकर ‘कमाई का स्थान’ बना दिया जाता है, तो इसके भयंकर परिणाम सामने आते हैं। कल की घटना में जो वीभत्स सच्चाई सामने आई है, उसने पंडा-पुजारी की गरिमा को तार-तार कर दिया है और सनातन आस्था में यकीन रखने वाले हर व्यक्ति को परेशान किया है।

व्यवस्था बनाने वालों ने ही बिगाड़ी व्यवस्था





हादसे की असल जड़ भगदड़ नहीं, बल्कि मंदिर की व्यवस्था में किया गया घिनौना व्यवधान और अमानुषिक व्यवहार था। पुलिस की एफआईआर और चश्मदीदों के बयान पंडा समाज के लोगों पर सीधे उंगली उठाते हैं:

बांस का बैरियर और वसूली: गर्भगृह में जाने के मार्ग पर एक बांस बांध दिया गया था, जिसका एकमात्र उद्देश्य कथित तौर पर रुपये लेकर विशेष पूजा करवाना था। यह अवरोध ‘चढ़ावे’ के लिए लगाया गया था, जिसने लोगों को मजबूर किया। जब श्रद्धालु इस बांस को उठाकर अंदर घुसने का प्रयास कर रहे थे, तो महिलाओं के साथ मारपीट की गई। तभी सीढ़ियों पर महिलाएं बेहोश होकर गिर गईं।

महिलाओं पर बर्बरता: सबसे शर्मनाक पहलू वह है कि सीसीटीवी फुटेज में कुछ पंडा श्रद्धालुओं पर डंडा चलाते हुए भी दिखे हैं। पूजा के नाम पर वसूली और भीड़ प्रबंधन के नाम पर डंडे का इस्तेमाल आस्था पर किया गया क्रूरतम प्रहार है और देश के सभी मंदिरों से यह बंद होनी चाहिए।

जानबूझकर अवरोध: एफआईआर में साफ दर्ज है कि पुजारियों द्वारा जान-बूझकर मंदिर परिसर में चढ़ावा के लिए लगाए गए अवरोध के कारण यह हादसा हुआ। यह केवल एक प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि लालच और मनमानी से उपजा अपराध है, जिसने आठ निर्दोष श्रद्धालुओं की जान ले ली।

गरिमा का पतन और आस्था का संकट

 पंडा-पुजारियों का काम भगवान और भक्त के बीच सेतु बनना होता है, न कि बाज़ार लगाना। जब वे खुद पैसे लेकर पूजा कराने और भक्तों को डंडे मारने जैसे कृत्यों में शामिल होते हैं, तो उनकी गरिमा पूरी तरह खत्म हो जाती है। यदि लोग भगवान के आसपास ऐसे अमानुषिक व्यवहार और जबरदस्ती देखेंगे, तो आस्थावान लोग मंदिर से दूर हो जाएंगे। मंदिर को कमाई का केंद्र बनाकर, इन लोगों ने सनातन धर्म की मूल भावना को ठेस पहुंचाई है।

सरकार को सख्त कदम उठाने की ज़रूरत

इस दर्दनाक घटना ने व्यवस्था पर गंभीर चोट की है। सरकार और मंदिर प्रशासन को अब निर्णायक कदम उठाने होंगे।

वीआईपी दर्शन तुरंत बंद हो : सबसे पहले, वीआईपी दर्शन की व्यवस्था को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए। भगवान के दरबार में सभी समान हैं, और यह वीआईपी कल्चर ही ऐसी अव्यवस्थाओं को जन्म देता है।

भ्रष्टाचार पर नकेल: मंदिर प्रबंधन को पूर्णतः पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाया जाना चाहिए। ‘चढ़ावे’ के नाम पर की जाने वाली किसी भी प्रकार की जबरन वसूली या मनमानी पर कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाए।

कानून का डंडा: मघड़ा हादसे में चार पुजारियों की गिरफ्तारी और 20 नामजद पर केस दर्ज होना केवल शुरुआत है। इस जघन्य कृत्य के जिम्मेदार सभी लोगों पर त्वरित और सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि यह स्पष्ट संदेश जाए कि आस्था के केंद्र में अत्याचार स्वीकार्य नहीं है।

मंदिरों को धर्मस्थल रहने दीजिए। उन्हें पैसे कमाने और सत्ता का प्रदर्शन करने का स्थान मत बनाइए। यही समय है कि आस्था के नाम पर हुए इस अत्याचार के खिलाफ आवाज़ उठाई जाए और सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी भक्त को ऐसे भयावह हादसे का शिकार न होना पड़े।

 


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Tuesday, 24 March 2026

स्कूल की बेंच पर मौत का तांडव: शिक्षिकाएं सोती रहीं और मर गई स्मृति; कंचनवाणी की विशेष रिपोर्ट


 
सीतामढ़ी के सोनबरसा में एक 'पंखे' के विवाद ने ली 11 साल की मासूम स्मृति की जान। क्या हमारे स्कूल सुरक्षित हैं? 'कंचनवाणी' की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें घटना का पूरा सच, शिक्षकों की लापरवाही और बच्चों में बढ़ती हिंसा पर मनोवैज्ञानिकों का बड़ा विश्लेषण।

Tarun Kumar Kanchan

मुजफ्फरपुर। बिहार के सीतामढ़ी से एक ऐसी खबर आई है, जिसने न केवल शिक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी हैं, बल्कि सभ्य समाज की आत्मा को भी झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ हम बच्चों को देश का भविष्य कहते हैं, उन्हें 'कलम' पकड़ना सिखाते हैं, लेकिन सीतामढ़ी के सोनबरसा स्थित एक सरकारी स्कूल में जो हुआ, वह बताता है कि हमारे बच्चे अब 'कत्ल' की भाषा सीखने लगे हैं।

यह महज एक झगड़ा नहीं था, यह एक मासूम की उसके ही सहपाठियों द्वारा की गई 'संस्थागत हत्या' है, जहाँ स्कूल के शिक्षक मूकदर्शक बने रहे।

एक पंखा, दो गुट और एक मासूम की मौत

मामला सोनबरसा थाना क्षेत्र के सहोरबा मध्य विद्यालय का है। सोमवार की दोपहर, क्लासरूम का माहौल सामान्य था, लेकिन तभी कक्षा चौथी और पांचवीं की छात्राओं के बीच 'पंखा चलाने' को लेकर विवाद शुरू हो गया।

·       मामूली विवाद, भयानक अंत: गर्मी के मौसम में पंखे की हवा किसे मिले, यह बहस इतनी बढ़ी कि पांचवीं कक्षा की दो छात्राओं का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने चौथी कक्षा की 11 वर्षीय स्मृति कुमारी पर हमला बोल दिया।

·       बर्बरता की हद: यह कोई साधारण धक्का-मुक्की नहीं थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के चौंकाने वाले खुलासे बताते हैं कि स्मृति के सिर, गले और बांह पर गहरे जख्म थे। आशंका है कि उसे दीवार से दे मारा गया या किसी घातक वस्तु से सिर पर वार किया गया। मौके पर मौजूद लोगों के अनुसार, मासूम स्मृति की नाक से खून बह रहा था।

·       सिस्टम की नींद: जब यह सब हो रहा था, स्कूल की शिक्षिकाएं कहाँ थीं? एफआईआर के अनुसार, शिक्षकों ने कोई प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया। क्या क्लासरूम में कोई सुपरविजन नहीं था?

संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: घायल बच्ची को कंधे पर उठाकर ले गए सहपाठी



इस घटना का सबसे काला अध्याय मारपीट के बाद शुरू हुआ। स्कूल प्रशासन ने घायल स्मृति को तुरंत अस्पताल पहुँचाने की जहमत नहीं उठाई।

जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीईओ) राघवेन्द्र मणि त्रिपाठी ने माना है कि यह गंभीर लापरवाही है। घायल स्मृति को प्राथमिक उपचार देने के बजाय, शिक्षकों ने उसे अन्य बच्चों के साथ घर भेज दिया। परिजन जब स्कूल पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि अन्य बच्चे घायल स्मृति को कंधे पर उठाकर ला रहे थे। यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को रुला देने के लिए काफी है।

परिजन उसे सीतामढ़ी ले गए, जहाँ से उसे पीएमसीएच, पटना रेफर कर दिया गया। लेकिन, तकदीर को कुछ और ही मंजूर था, पटना पहुँचने से पहले ही स्मृति ने रास्ते में दम तोड़ दिया। मंगलवार को पिता ने पुलिस को सूचना दी, जिसके बाद हड़कंप मचा।

एक पिता की चीख और न्याय की गुहार

मृतका के पिता जितेंद्र राय ने दो छात्राओं के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई है। एफएसएल (FSL) की टीम और पुलिस जांच में जुटी है। लेकिन सवाल वही खड़ा है— क्या एफआईआर और जांच उस मासूम की जान वापस ला पाएगी? क्या स्मृति की मौत के बाद भी स्कूल और समाज अपनी जिम्मेदारियों को समझेंगे?

मनोवैज्ञानिक पक्ष: मासूम हाथों में इतनी हिंसा क्यों?

'कंचनवाणी' ने इस खौफनाक व्यवहार की तह तक जाने के लिए प्रमुख मनोवैज्ञानिकों से बात की। आखिर 10-12 साल की बच्चियां इतनी हिंसक कैसे हो सकती हैं?

1. 'इम्पल्स कंट्रोल' और डिजिटल पॉइजनिंग:

"आजकल के बच्चे डिजिटल युग में जी रहे हैं। मोबाइल गेम्स और अनियंत्रित सोशल मीडिया कंटेंट ने हिंसा को 'नॉर्मलाइज' (सामान्य) कर दिया है। बच्चों के दिमाग में आवेग को नियंत्रित करने (Impulse Control) की क्षमता कम हो रही है। उन्हें लगता है कि गुस्सा आने पर हिंसा करना ही एकमात्र समाधान है।" — डॉ. अनीता वर्मा, वरिष्ठ बाल मनोवैज्ञानिक

2. भावनात्मक अशिक्षा और Conflict Resolution का अभाव:

"हम बच्चों को गणित और विज्ञान तो सिखा रहे हैं, लेकिन भावनाओं को संभालना नहीं सिखाते। Conflict Resolution (विवाद सुलझाना) हमारे पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है। जब स्कूल और घर में संवाद (Communication) की कमी होती है, तो बच्चे अपनी हताशा को शारीरिक हिंसा के रूप में व्यक्त करते हैं।" — डॉ. आर. के. सिन्हा, क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, यह घटना दर्शाती है कि समाज और शिक्षा तंत्र बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को संभालने में पूरी तरह विफल रहा है।

बच्चों के इस व्यवहार के पीछे 3 मुख्य कारण:

1.     स्क्रीन एडिक्शन: हिंसक कार्टून और वीडियो गेम्स का असर।

2.     संवाद की कमी: माता-पिता और शिक्षकों का बच्चों की भावनाओं को न समझ पाना।

3.     Conflict Resolution का अभाव: बच्चों को यह नहीं सिखाया जाता कि बिना लड़े अपनी बात कैसे मनवाएं या विवाद कैसे सुलझाएं।

दोषियों पर शिकंजा और उठते सवाल

·       कानूनी कार्रवाई: सदर एसडीपीओ आशीष आनंद के नेतृत्व में पुलिस और एफएसएल (FSL) की टीम ने स्कूल पहुंचकर जांच की है। मृतका के पिता जितेंद्र राय ने दो नामजद छात्राओं के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है।

·       प्रशासनिक कार्रवाई: डीईओ ने प्रधानाध्यापक समेत सभी शिक्षकों से 24 घंटे में स्पष्टीकरण मांगा है। एक तीन सदस्यीय जांच समिति (डीपीओ स्थापना मनीष कुमार सिंह की अध्यक्षता में) गठित की गई है, जो लापरवाही और सूचना न देने के कारणों की जांच करेगी।

कंचनवाणी का नजरिया

सीतामढ़ी की यह घटना एक रेड सिग्नल है। यह केवल एक स्कूल की कहानी नहीं है, यह हमारे घर, हमारे समाज और हमारी शिक्षा नीति का आईना है। अगर हम आज नहीं जागे, अगर हमने बच्चों के बैग के बोझ के साथ-साथ उनके मानसिक बोझ को कम करने का प्रयास नहीं किया, और अगर स्कूलों को केवल परीक्षा केंद्र के बजाय भावनात्मक केंद्र नहीं बनाया, तो ऐसी और 'स्मृतियाँ' व्यवस्था की भेंट चढ़ती रहेंगी।

आज जरूरत है कि स्कूलों में 'काउंसलिंग' अनिवार्य हो, शिक्षकों को संवेदनशील बनाया जाए और बच्चों को 'पंखा' चलाने के लिए नहीं, बल्कि 'इंसानियत' चलाने के लिए प्रेरित किया जाए।


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Tuesday, 17 March 2026

खाकी को ललकारा तो काल बन आई पुलिस: मोतिहारी मुठभेड़ में 12 लाशें बिछाने की धमकी देने वाले 2 अपराधी ढेर, STF जवान शहीद


"मोतिहारी के चकिया में पुलिस और अपराधियों के बीच भीषण मुठभेड़! 12 पुलिसकर्मियों को मारने की धमकी देने वाले कुंदन ठाकुर समेत 2 अपराधी ढेर। STF जवान श्री राम यादव शहीद। पढ़ें पूरी रपट और बिहार में बढ़ते एनकाउंटर के आंकड़े।"

मोतिहारी/बिहार: अपराध और दुस्साहस जब अपनी सीमा पार कर दे, तो अंजाम खौफनाक ही होता है। बिहार के मोतिहारी (चकिया) में एक ऐसी ही वारदात हुई है जिसने पूरे प्रदेश को दहला दिया है। कल तक जो अपराधी फोन पर पुलिस को "दर्जन भर लाशें बिछाने" की चुनौती दे रहे थे, आज वे खुद खाकी की गोलियों का शिकार होकर मिट्टी में मिल चुके हैं।

हालाँकि, इस जीत की कीमत बिहार पुलिस को अपने एक जांबाज सिपाही की शहादत देकर चुकानी पड़ी।

"दर्जन भर पुलिसवालों की लाश बिछा देंगे" – वो धमकी जो बनी मौत का वारंट


मुठभेड़ में मारे गए अपराधी
कुंदन ठाकुर और प्रियांशु दुबे का दुस्साहस इस कदर बढ़ गया था कि उन्होंने सीधे चकिया थाने के अपर थानाध्यक्ष गौरव कुमार को फोन कर गालियां दीं और खुली चुनौती दी थी। कुंदन ने दहाड़ते हुए कहा था कि वह एक दर्जन पुलिसकर्मियों को मौत के घाट उतार देगा। इसी धमकी के बाद पुलिस और STF ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया और अपराधियों के लोकेशन को ट्रैक करना शुरू किया।


आधी रात को गोलियों की तड़तड़ाहट से गूंजा सिहोरवा गांव

सोमवार की देर रात करीब 2:30 बजे, पुलिस को सटीक सूचना मिली कि कुंदन ठाकुर अपने गिरोह के साथ चकिया के सिहोरवा गांव में एक दोस्त के घर छिपा है। जैसे ही STF और स्थानीय पुलिस ने घेराबंदी की, अपराधियों ने सरेंडर करने के बजाय अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी।

·       जवाबी कार्रवाई: आत्मरक्षा में पुलिस ने भी मोर्चा संभाला और जवाबी फायरिंग की। इस मुठभेड़ में कुंदन और प्रियांशु मौके पर ही ढेर हो गए।

·       शहादत की खबर: इस जांबाज ऑपरेशन के दौरान सिवान जिले के रहने वाले STF जवान श्री राम यादव को गोली लगी और वे वीरगति को प्राप्त हुए। एक जांबाज साथी को खोने का गम पूरी पुलिस फोर्स की आंखों में साफ देखा जा सकता है।

शहीद जांबाज़ को पुष्प अर्पित करतीं उनकी पत्नी

गिरफ्तारी और हथियारों का जखीरा

पुलिस ने मौके से दो अन्य अपराधियों, उज्जवल कुमार और संत कुमार तिवारी को गिरफ्तार किया है। अपराधियों के पास से घातक हथियार बरामद हुए हैं, जिनमें शामिल हैं:

·       एक कार्बाइन (Submachine Gun)

·       दो देसी पिस्टल

·       भारी मात्रा में जिंदा कारतूस

बिहार में 'एनकाउंटर' का बदलता ग्राफ

बिहार में अपराध के खिलाफ पुलिस अब 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अपना रही है। हालांकि आधिकारिक तौर पर इसे यूपी मॉडल जैसा नाम नहीं दिया गया है, लेकिन आंकड़ों पर गौर करें तो अपराधियों और पुलिस के बीच आमने-सामने की भिड़ंत बढ़ी है:

1.     सक्रिय STF: पिछले 2 वर्षों में मुजफ्फरपुर, मोतिहारी और बेगूसराय जैसे जिलों में STF ने दर्जनों हार्डकोर अपराधियों को मार गिराया या गिरफ्तार किया है।

2.     पुलिस पर हमला, मतलब अंत: हाल के महीनों में यह देखा गया है कि जो भी गिरोह पुलिस पर हमला कर रहा है, पुलिस उसका सफाया करने में देर नहीं लगा रही।

3.     उत्तर बिहार का खौफ: मोतिहारी और सिवान जैसे इलाके, जो कभी 'गैंगवार' के लिए बदनाम थे, वहां अब पुलिस की दबिश ने अपराधियों के हौसले पस्त कर दिए हैं।


शहीद जांबाज

यह घटना याद दिलाती है कि कानून के हाथ लंबे होते हैं
, लेकिन श्री राम यादव जैसे जवानों की शहादत हमें यह भी बताती है कि हमारी सुरक्षा के लिए वर्दीधारी किस हद तक बलिदान देते हैं।

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·       मोतिहारी पुलिस मुठभेड़ (Motihari Police Encounter)

·       चकिया एनकाउंटर न्यूज़ (Chakia Encounter News)

·       STF जवान श्री राम यादव शहीद (STF Jawan Shri Ram Yadav Shaheed)

·       अपराधी कुंदन ठाकुर ढेर (Criminal Kundan Thakur Killed)

·       बिहार पुलिस एनकाउंटर लिस्ट (Bihar Police Encounter List)

·       बिहार क्राइम न्यूज़ (Bihar Crime News)


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Friday, 13 February 2026

संत कुमार माट्साब: स्मृतियों के झरोखे से एक निश्छल व्यक्तित्व

 
शिक्षक दिवस विशेष संस्मरण कंचनवाणी

यह एक अत्यंत भावुक और जीवंत संस्मरण है। डॉ. रोहिताश्व दुबे जी ने संत कुमार दुबे उर्फ माट्साब के व्यक्तित्व को जिस बारीकी और आत्मीयता से उकेरा है, वह दिल को छू लिया। समर्पित शिक्षक, जिनके 'कंगारू खेल', लोकगीत और ताश की महफिलों के किस्से आज भी जीवंत हैं। कंचनवाणी पर पढ़िए जीवन के अनछुए पहलुओं को समेटती यह अनूठी कहानी।

डॉ रोहिताश्व दुबे 

लेखक: डॉ. रोहिताश्व दुबे (अवकाश प्राप्त अध्यापक, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय)

जमुई । संत कुमार माट्साब के स्मरण मात्र से ही एक ऐसा संपूर्ण जीवन वृत्त स्मृति पटल पर कौंध जाता है, जिसे याद कर मन सुकून से भर जाता है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जिसने जीवन भर सबको हंसाया, कभी किसी को रुलाया नहीं।


बचपन की यादें और शिक्षा का सफर
मुझे याद है जब वे दसवीं-ग्यारहवीं के छात्र थे और मैं प्राथमिक कक्षा में था। उन्हें खाकी पैंट पहनकर हाई स्कूल जाते देखना आज भी याद है। मैट्रिक पास करने के बाद ही वे गांव के मिडिल स्कूल में शिक्षक के रूप में सेवा देने लगे। अरुण के घर में सुबह-सुबह बच्चों को पढ़ाना। मां मुझे भी भेज देती थी। मेरा वहां पढ़ने जाना, जीवन के वे शुरुआती पाठ थे जो आज भी जेहन में ताजा हैं। उनकी शादी की थोड़ी थोड़ी याद है। संभवतः 1959-60 में उनकी शादी हुई थी।
अभी हाल में गिद्धौर होते हुए देवघर जा रहा था तो मेरा ध्यान एक पुराने परित्यक्त विद्यालय भवन पर गया। सहसा स्मरण हो आया, अरे वह वही शिक्षक शिक्षा स्कूल है जहां एक जमाने में उमेश माट्साब और संत कुमार माट्साब ने ट्रेनिंग किया था। हमलोग किसी समारोह में लोटन (उनकी ससुराल, जो जमुई जिला में है) गए हुए थे, वहीं से प्लान बना कि वह स्कूल चला जाए जहां ये लोग उस समय ट्रेनिंग कर रहे थे। क्लास होते, खाना बनते सब देखा था।
मैं 1963-64 में मिडल स्कूल में था। स्वाभाविक था उस दौर की 'नई तालीम' और अनुभव से लैस होकर जब वे लौटे, तो स्कूल का परिवेश ही बदल गया। उन्हें खेल-कूद का इंचार्ज बनाया गया और फिर शुरू हुआ गतिविधियों का एक अनूठा दौर।


खेल, प्रहसन और 'कंगारू' की छलांग
माट्साब बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि खेल-खेल में जीवन सिखाते थे। उनके सिखाए खेल जैसे 'रुमाल झपट्टा' जिसमें चारों तरफ गोल बैठकर एक लड़के को किसी के पीछे रुमाल रखने कहा जाता। उसके इंटेलीजेंस पर निर्भर करता था यह जानना कि उसके पीछे ही रुमाल रखा गया है और वह उठ जाए, वरना उसकी पीठ पर धम धम (हल्के से) होने लगता। दूसरा खेल वृत्त में बैठे रहकर ही एक बढ़िया सा गाना गाते। उनके गाए गीत आज भी कानों में गूंजते हैं:
"लंबे-लंबे ताड़ के पेड़ लागे हैं हजार रे... धड़ है इसका मोटा धड़, झुपे हनुमान रे..."
उनका एक प्रहसन तो मैं आज भी अपने मित्रों को सुनाता हूं:
"मुक्का मार बताशा फोड़ूं, तोड़ूं कच्चा सूत।
मक्खी का भुजदण्ड उखारूं, मैं सच्चा रजपूत।।"
मनोरंजन का आलम यह था कि वे स्वयं 'कंगारू' बनकर बच्चों को छलांग लगाना सिखाते थे। जैसा कि बतलाया जा चुका है ट्रेनिंग से लौटने के बाद माट्साब तरह के खेल छात्रों को खेलाया करते। उनमें से एक ऑस्ट्रेलियन पशु कंगारू से संबंधित था। वे स्वयं कंगारू बनकर छात्रों को बताते कि कंगारू कैसे छलांग लगाता है। इसके लिए क्लास रूम में ही दो टेबल का प्रबन्ध किया जाता। एक टेबल से दूसरे टेबल पर छलांग लगाते थे। हमलोगों का खूब मनोरंजन होता था।
इसी सिलसिले में एक बार स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर मिडल स्कूल के गेट के बाहर केरवा आम के नीचे आयोजन में मास्टर साहब ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत कंगारू का खेल दिखाया था, जिसमें एक टेबल से दूसरे टेबल पर कूदने पर टेबल के उलटने की नौबत आ गई थी। खैर बाल -बाल बच गए थे।
कर्तव्यनिष्ठा और सहजता
वे काम के प्रति भी उतने ही समर्पित थे। मुझे याद है, उन दिनों इंटरनल असेसमेंट सिस्टम लागू था। संपूर्ण परीक्षा का आधा अंक असेस्मेंट पर आधारित होता था। स्कूल में रिज़ल्ट निकालना था, मगर टेबुलेशन का काम अभी हो नहीं पाया था। संत कुमार माट्साब मुझे रात का खाना खाकर स्कूल चलने कहा। एक बजे रात तक असेस्मेंट के अंकों का टेबुलेशन सम्पन्न किया था।
खेल के मैदान पर भी उनकी सहजता देखते ही बनती थी। माट्साब नियमित रूप से ढिबरा पर फुटबाल खेल में भी शामिल होते थे। एकबार गेंद के बजाय देवनारायण भगत ने उनके पैर में जोर से मार दिया था। माट्साब ' है ...' कहते पैर पकड़ते हुए बैठ गए थे। फणींद्र ने कहा था," चोटा (चोट) जोर से लगले"। हम लोगों को अन्दर से हँसी भी आ रही थी। देवनारायण अफसोस व्यक्त करने लगा। जानबूझकर तो उसने नहीं ही मारा था। माट्साब अगले ही पल उतनी ही सहजता से उठ खड़े हुए। उनके भीतर किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं था।



आस्था और विश्वास का संबल
माट्साब को कुछ पारंपरिक मंत्र-विद्या की भी जानकारी थी। यद्यपि मैं इन चीजों पर व्यक्तिगत रूप से बहुत भरोसा नहीं करता, लेकिन जैसा कि कहा गया है—'विश्वासो फलदायकम्'। मेरे बेटे सोनू (अभिनव आनन्द) का प्रारम्भिक 2-3 वर्ष गांव में बीता। जब थोड़ा ज्यादा रोया तो मैया (मां ) परेशान हो जाती थी और वह संत कुमार माट्साब के पास दौड़े-दौड़े जाती और अपनी व्यथा सुनाती। माट्साब आकर कुछ मंत्र पढ़ते हुए माथा पर हाथ रख देते बस सब बलैया रफूचक्कर। मैया की सब चिंता दूर। यह क्रम बराबर चलता रहता। सोनू से चर्चा करते हुए हमलोग आज भी आनंदित हो जाते हैं। इससे माँ को परम शांति मिलती थी।
ताश की महफ़िल और 'घी में मूंछ'
संत कुमार माट्साब की चर्चा हो और ताश की चर्चा नहीं हो ऐसा हो नहीं सकता। सबल बीघा में ताश के वे केंद्र थे। ताश के खेल में बहुत लोग शामिल होते थे जैसे - नुनुभाई (डॉ छेदी दुबे), महेन्द्र दुबे, रामदेव दुबे, जयकांत दुबे, त्रिपुरारी दुबे, राजेन्द्र मिश्र आदि। हमारी पीढ़ी के लोग भी शामिल होते थे। गर्मी में किसी के बंगले पर, जाड़े में धूप में चटाई बिछाकर या पुआल पर। माट्साब खा पीकर ताश लेकर खिलाड़ियों की तलाश में निकल पड़ते। उस दिन उनकी स्थिति दयनीय सी दिखती जिस दिन लोग जमा नहीं होते। ताश खेलने का तरीका भी उनका अजूबा था। सिर्फ दो रंग के भरोसे 22-23 की बोली लगा बैठते। काला पान की तिग्गी का सीट निकल जाता। जब उनका गोधा (खेल का साथी) खीज व्यक्त करता तो कहते, जमीन बिक रही है क्या? जब रंग की तीन पत्ती आ जाती तो हाल पूछने पर मूंछ पर ताव देते हुए कहते,"घी में मूंछ है '। सुना है, किसी की प्रिय वस्तु को उसकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध में तर्पण किया जाता है। क्या बानो ( माट्साब का बेटा) ऐसा करेगा?
अंतिम मुलाकात: स्मृतियों का धुंधलका
अक्टूबर 2023 में जब मैं उनसे मिलने गया, वे होश-बेहोश की स्थिति में थे। देवघर में सुरेश दुबे के श्राद्ध के दिन (उसी दिन मिथिलेश, कमलेश की मां का भी निधन हुआ था) मैं माट्साब से मिलने गया था। कभी होश में रहते कभी बेसुध हो जाते। जब मैं मिलने पहुंचा तो वे होश में नहीं थे। मगर बात करते -करते वे होश में आ गए। उन्हीं का गाना "लम्बे लंबे ताड़ के पेड़... सुनाने पर उन्होंने आगे का हिस्सा स्वयं पूरा कर दिया ।
उनकी आंखों में सुनहरे अतीत की चमक थी, पर होंठों पर एक दर्द भरी सच्चाई— "अब उ जमाना नै लौटते हो" (अब वह जमाना नहीं लौटेगा)
गत 30 नवम्बर 2025 को मैं फिर उनसे मिलने गया था। धूप में बैठे ठीक लग रहे थे। उनकी जीवनसंगिनी (भौजी) भी वहीं पास बैठी थीं। मगर माट्साब चेतना शून्य थे। लिखकर अपना नाम दिया तब भी पहचान नहीं पाए। बहुत पीड़ा हुई। पास में बैठी भौजी झुंझला गईं। उस झुंझलाहट में भी एक गहरा दुख और रुदन छिपा था। मुझे इतना संतोष है कि उनसे अंतिम दर्शन मेरा हो गया।
शायर की ये पंक्तियां उन पर सटीक बैठती हैं:
कल तो कहते थे कि उठकर चल नहीं सकते।
आज हिम्मत यह कि आप दुनिया से उठकर चल दिए।।
संत कुमार माट्साब भौतिक रूप से भले ही चले गए हों, पर उनकी निश्छलता, वे खेल, वे गीत और वह 'घी में मूंछ' वाली मुस्कान हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगी। उनकी स्मृति को कोटिश: नमन 🌹 🙏


 
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संत कुमार माट्साब संस्मरण, कंचनवाणी, Kanchanwani Blog, डॉ. रोहिताश्व दुबे
भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर, शिक्षक की यादें, पुराने दिनों के खेल, संस्मरण लेखन, सबल बीघा की यादें, ग्रामीण शिक्षक का जीवन, प्रेरणादायक जीवन गाथा।
संत कुमार माट्साब: एक शिक्षक और मार्गदर्शक


Tuesday, 10 February 2026

वह 'भरोसा' अब मौन है: एक पिता, एक गुरु और वो आखिरी हुंकार

Sant Kumar Dubey Jamui Teacher Obituary"

मेरे पिता और आदर्श शिक्षक श्री संत कुमार दुबे का 86 वर्ष की आयु में निधन। जमुई के सिकंदरा क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने वाले एक मानिंद व्यक्तित्व के प्रेरक जीवन, अनुशासन और अंतिम संघर्ष की भावुक कहानी। पढ़िए कंचनवाणी पर एक विशेष संस्मरण।

तरुण कुमार कंचन
ओम व्यास की पंक्तियां — "पिता हैं तो दुनिया के सारे खिलौने अपने हैं।" आज जब पिता श्री संत कुमार दुबे जी का साया सिर से उठा है, तो अहसास हो रहा है कि खिलौने तो दूर, यह पूरी दुनिया ही अब पराई और असुरक्षित लगने लगी है। वह भरोसा, जो उनके होने मात्र से मिलता था, अब एक गहरे सन्नाटे में तब्दील हो गया है।


विपदा की घड़ी और पिता का वो 'चमत्कार'
अभी कुछ ही समय बीता है जब मैं अपने जीवन के सबसे काले दौर से गुजर रहा था। लाखों की कोशिश और दिन-रात की भाग-दौड़ के बावजूद मेरी पत्नी रीना कंचन कैंसर की बेरहम पकड़ से दूर होती जा रही थी। घर में मातम जैसा सन्नाटा था। पिता जी स्वयं अल्जाइमर और ढलती उम्र की व्याधियों से जूझ रहे थे। वे सुध-बुध खो चुके थे।
लेकिन एक दिन जो हुआ, वह ईश्वर के साक्षात दर्शन जैसा था। बेसुध पड़े पिता जी अचानक बिस्तर से उठ बैठे। उनकी आँखों में वही पुरानी चमक और आवाज़ में वही शिक्षक वाली खनक लौटी।

 
उन्होंने मुझे देखा और दृढ़ता से कहा— "तुम चिंता मत करो। मैं अभी जिंदा हूँ। तुम्हें जो जरूरत होगी, मैं पूरी करूँगा।"
इतना कहकर वे फिर बिस्तर पर लेट गए। कमरे में बैठे सगे-संबंधी और मैं, सब अवाक थे। वह इंसान जो खुद चलने में असमर्थ था, वह अपने बेटे को पूरी दुनिया से लड़ने का हौसला दे रहा था। आज देवघर के अस्पताल में उनकी अंतिम सांस के साथ मेरा वही 'अंतिम भरोसा' भी चला गया। अब कौन कहेगा कि 'मैं अभी जिंदा हूँ'?



अनुशासन का वो दिव्य ज्ञान
पिता जी केवल पिता नहीं, एक कालजयी शिक्षक भी थे। उनके प्यार की थपकियाँ जितनी कोमल थीं, उनके शब्दों के वाण उतने ही सटीक। बात 1982-83 की है, जब मैं सिकंदरा हाईस्कूल का अल्हड़ किशोर था। 15 जनवरी का दिन था, कुंडग्राम (भगवान महावीर की जन्मस्थली) की पहाड़ियों पर मेला लगा था।
गांव की एक महिला जो रिश्ते में दादी लगती थीं । उनके साथ निकलते वक्त मैंने उत्साह में सब्जी का बर्तन थाम लिया था। मेले की भीड़ में दादी बिछड़ गईं और मैं अपने साथियों के साथ 'जन्मस्थान' के जंगलों में चला गया। घंटों इंतजार के बाद, जब भूख लगी, तो हम साथियों ने मिलकर वह सब्जी चट कर दी। शाम को जब घर लौटा, तो रास्ते में पिता जी मिले। उन्होंने कोई डांट-फटकार नहीं की, बस मेरी आँखों में आँखें डालकर एक वाक्य कहा:
"तुमसे ऐसी उम्मीद ना थी और ना है।"

वे शब्द आज 40 साल बाद भी मेरे कानों में गूँजते हैं। उन सात शब्दों ने मुझे वह अनुशासन और नैतिक बोध दिया, जिसे दुनिया की कोई किताब नहीं सिखा सकती थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि जिम्मेदारी का अर्थ केवल बर्तन उठाना नहीं, बल्कि उस भरोसे को निभाना है जो किसी ने आप पर किया है।


विदाई एक युग की
31 जनवरी को फर्श पर गिरने के बाद से वे संघर्ष कर रहे थे। आज सोमवार को 86 वर्ष की आयु में उन्होंने विष्णुलोक की यात्रा प्रारंभ की। जमुई और सिकंदरा में उन्होंने हज़ारों बच्चों का भविष्य संवारा। लछुआड़ मध्य विद्यालय से उनकी सेवानिवृत्ति केवल कागजी थी, वे आजीवन शिक्षक रहे।
मेरे भाई यतीन्द्र, सत्येंद्र व अमरेंद्र और हमारी बहनें बिंदु, सिंधु और निधि उसी संस्कार की पूंजी पर खड़ी हैं जो उन्होंने हमें दी।
पिता जी, आपकी शारीरिक कमी हमेशा खलेगी, लेकिन विपदा में आपकी वह आवाज— "मैं अभी जिंदा हूँ"— ताउम्र मेरा संबल बनी रहेगी।
श्रद्धांजलि:
पूज्य पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को शांति प्रदान करे।


विवरण:
नाम: श्री संत कुमार दुबे
परिचय: अवकाश प्राप्त शिक्षक, समाजसेवी
आयु: 86 वर्ष
निधन तिथि: सोमवार
निधन स्थान: सदर अस्पताल, देवघर

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लछुआड़ मध्य विद्यालय सेवानिवृत्त शिक्षक
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अमरेंद्र कुमार दुबे पत्रकार
देवघर सदर अस्पताल समाचार 



Tuesday, 3 February 2026

बिहार के आसमान पर खतरनाक संकट, बर्ड फ्लू का साया: भागलपुर में पुष्टि के बाद कटिहार में हड़कंप

 

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बिहार में बर्ड फ्लू का अलर्ट! भागलपुर के बाद अब कटिहार में भी कौवों की रहस्यमयी मौत। क्या H5N1 वायरस से बढ़ रहा है खतरा? कंचनवाणी की इस विशेष रिपोर्ट में पढ़ें पूरी सच्चाई, बचाव के उपाय और प्रशासन की तैयारी।

"मुजफ्फरपुर : बिहार के आसमान पर इस समय संकट के बादल मंडरा रहे हैं। भागलपुर के नवगछिया में पिछले दिनों हुई 150 से अधिक कौवों की रहस्यमयी मौत ने अब एक डरावनी सच्चाई का रूप ले लिया है। भोपाल और पटना की हाई-टेक लैब से आई रिपोर्टों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इन मौतों के पीछे H5N1 वायरस (Avian Influenza) है। भागलपुर में संक्रमण की पुष्टि होने के तुरंत बाद अब पड़ोसी जिले कटिहार में भी पक्षियों की मौत का सिलसिला शुरू हो गया है, जिससे पूरे प्रशासनिक महकमे में खलबली मच गई है।

भागलपुर से शुरू हुआ मौत का सिलसिला
घटना की शुरुआत 11 जनवरी को हुई थी, जब नवगछिया अनुमंडल परिसर में कचहरी और आसपास के पेड़ों के नीचे सैकड़ों कौवे मृत पाए गए थे। उस समय कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, इसलिए विशेषज्ञों का एक समूह इसे 'कोल्ड स्ट्रेस' मान रहा था। पक्षी विशेषज्ञ ज्ञानचंद ज्ञानू ने भी संभावना जताई थी कि भोजन की कमी और रसायनों के प्रभाव से ऐसा हो सकता है।
हालांकि, जिला पशुपालन पदाधिकारी डॉ. अंजली कुमारी ने कोई जोखिम न लेते हुए सैंपल जांच के लिए भेजे। अब लैब रिपोर्ट ने यह साबित कर दिया है कि यह सामान्य मौतें नहीं बल्कि एक संक्रामक महामारी की आहट थी।


कटिहार में बढ़ता खतरा: कुरसेला बना नया केंद्र
भागलपुर के बाद अब कटिहार जिले की कुरसेला नगर पंचायत और उत्तरी मुरादपुर पंचायत से भी चिंताजनक खबरें आ रही हैं। स्टेट हाईवे 77 के पास बड़ी संख्या में कौवों के शव मिले हैं।
प्रशासनिक कार्रवाई: पशुपालन विभाग की टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर रसायनों का छिड़काव किया है।
मृत पक्षियों को गहरे गड्ढे खोदकर सुरक्षित तरीके से डिस्पोज किया गया है ताकि संक्रमण आगे न फैले।


क्या है H5N1 वायरस और यह कितना घातक है?
बर्ड फ्लू, जिसे वैज्ञानिक भाषा में एवियन इन्फ्लूएंजा कहा जाता है, मुख्य रूप से पक्षियों में फैलने वाला एक अत्यधिक संक्रामक वायरल रोग है।
संक्रमण का तरीका: यह वायरस संक्रमित पक्षियों के मल, लार और नाक के स्राव के माध्यम से फैलता है।
मनुष्यों को खतरा: H5N1 एक ज़ूनोटिक (Zoonotic) वायरस है, जिसका अर्थ है कि यह पक्षियों से इंसानों में फैल सकता है। यदि कोई व्यक्ति संक्रमित पक्षी के सीधे संपर्क में आता है, तो उसे गंभीर श्वसन संबंधी बीमारियां हो सकती हैं।
इकोसिस्टम पर असर: कौवे हमारे पर्यावरण के 'सफाईकर्मी' माने जाते हैं। इनकी बड़ी संख्या में मौत पर्यावरण के संतुलन को भी बिगाड़ सकती है।


प्रशासन की 'किलिंग ज़ोन' और सर्विलांस रणनीति
H5N1 की पुष्टि के बाद प्रशासन ने 'जीरो सर्विलांस' नीति अपनाई है:
10 KM का घेरा: संक्रमित क्षेत्र के 10 किलोमीटर के दायरे को हाई-अलर्ट ज़ोन घोषित कर दिया गया है।
सैनिटाइजेशन: प्रभावित इलाकों में लगातार सोडियम हाइपोक्लोराइट जैसे रसायनों का छिड़काव किया जा रहा है।
पोल्ट्री जांच: आसपास के सभी पोल्ट्री फार्मों से मुर्गियों के सैंपल लिए जा रहे हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि संक्रमण व्यावसायिक पक्षियों तक न पहुंचे।


कंचनवाणी की अपील: क्या करें और क्या न करें?
बिहार में बढ़ते खतरे को देखते हुए कंचनवाणी अपने पाठकों से सावधानियां बरतने की अपील करते हैं:
सीधे संपर्क से बचें: यदि आपको सड़क या आंगन में कोई मृत पक्षी दिखे, तो उसे न छुएं।
स्वच्छता का ध्यान: यदि आप चिकन या अंडे का सेवन करते हैं, तो उन्हें 70°C से अधिक तापमान पर अच्छी तरह पकाकर ही खाएं।
सूचना दें: किसी भी असामान्य घटना की जानकारी तुरंत पशु चिकित्सा हेल्पलाइन या स्थानीय थाने को दें।
अफवाहों से बचें: केवल आधिकारिक स्वास्थ्य बुलेटिन पर ही भरोसा करें। अफवाहों पर ध्यान ना दें । सुनी सुनाई बात इधर से उधर ना करें।

ध्यान रखें 

1. "पक्षियों की अचानक मौत, खतरे का संकेत है। बर्ड फ्लू से खुद को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक बनें।

2. "सावधानी ही सबसे बड़ा बचाव है! पक्षियों से दूरी रखें, सफाई का ध्यान दें। बर्ड फ्लू के खिलाफ जंग में सहयोग करें। -

3. "प्रकृति का संदेश समझें, संक्रमण को फैलने से रोकें। किसी भी मृत पक्षी की सूचना तुरंत विशेषज्ञों को दें।

अक्सर पाठकों द्वारा पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs) और बचाव के विस्तृत दिशा-निर्देश

पाठकों की सुविधा के लिए हमने विशेषज्ञों से प्राप्त जानकारी के आधार पर कुछ प्रमुख सवालों के जवाब यहाँ तैयार किए हैं:
1. क्या बर्ड फ्लू इंसानों के लिए जानलेवा है?
हाँ, H5N1 वायरस इंसानों को संक्रमित कर सकता है। हालांकि इसके मामले दुर्लभ हैं, लेकिन यदि संक्रमण हो जाए तो यह गंभीर निमोनिया और श्वसन तंत्र की विफलता का कारण बन सकता है, जो घातक हो सकता है।
2. क्या इस दौरान चिकन और अंडे खाना सुरक्षित है?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, चिकन और अंडों को अच्छी तरह पकाकर (70°C से अधिक तापमान पर) खाना सुरक्षित है। वायरस गर्मी में जीवित नहीं रह पाता। हालांकि, कच्चा या अधपका मांस खाने से बचें।
3. यदि घर के पास मृत पक्षी मिले तो क्या करें?
उसे भूलकर भी न छुएं। तुरंत स्थानीय पशुपालन विभाग या नगर निगम को सूचित करें। बच्चों और पालतू जानवरों को उस स्थान से दूर रखें।
4. बर्ड फ्लू के शुरुआती लक्षण क्या हैं?
इंसानों में इसके लक्षण सामान्य फ्लू जैसे होते हैं— जैसे तेज बुखार, खांसी, गले में खराश, मांसपेशियों में दर्द और सांस लेने में तकलीफ।

सावधानी के लिए चेकलिस्ट
बिहार के मौजूदा हालातों को देखते हुए इन 5 बातों का विशेष ध्यान रखें:
* मास्क का प्रयोग: यदि आप पक्षियों के बसेरे वाले इलाके में जा रहे हैं, तो मास्क और दस्ताने जरूर पहनें।
* हाथों की सफाई: बाहर से आने के बाद हाथों को साबुन या सैनिटाइजर से अच्छी तरह साफ करें।
* बाजार में सावधानी: चिकन या मछली मार्केट जाते समय विशेष सतर्कता बरतें और वहां की गंदगी के सीधे संपर्क में न आएं।
* पक्षियों को दाना: फिलहाल खुले स्थानों पर पक्षियों को दाना डालने से बचें जहाँ पक्षियों का जमावड़ा अधिक हो।
* त्वरित रिपोर्टिंग: अपने क्षेत्र में एक भी पक्षी की संदिग्ध मौत को नजरअंदाज न करें।
निष्कर्ष
भागलपुर और कटिहार की घटनाएं महज इत्तेफाक नहीं, बल्कि एक चेतावनी हैं। प्रशासन अपना काम कर रहा है, लेकिन एक जागरूक नागरिक के तौर पर हमारी जिम्मेदारी है कि हम अफवाहों को न फैलने दें और वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर सावधानी बरतें।
कंचनवाणी लगातार इस स्थिति पर नजर बनाए हुए है और आपको हर अपडेट से रूबरू कराता रहेगा।

> "सतर्क बिहार, सुरक्षित बिहार! बर्ड फ्लू की आहट को हल्के में न लें। आपकी छोटी सी सावधानी एक बड़ी महामारी को रोक सकती है। - कंचनवाणी (Kanchanwani)"

 


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Saturday, 31 January 2026

CBI की दहलीज पर NEET छात्रा केस : ऐसे में बेटियाँ 'रूपम पाठक' बनने को मजबूर होंगी? पढ़ें विस्तृत व्याख्या

 

"NEET student suspicious death Patna CBI case"

पटना में NEET छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब CBI के पास है। क्या यह न्याय की शुरुआत है या रसूखदारों को बचाने की कोशिश? जानें रूपम पाठक कांड से लेकर नवरुणा केस तक, बिहार में न्यायिक विफलता का पूरा सच। पढ़ें Kanchanwani की विशेष रिपोर्ट।

 The case of the suspicious death of a NEET student in Patna is now with the CBI. Is this the beginning of justice or an attempt to protect influential individuals?  Learn the complete truth about judicial failures in Bihar, from the Rupam Pathak case to the Navruna case.

 मुजफ्फरपुर/पटना। । बिहार की राजधानी पटना में नीट (NEET) की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत का मामला अब सीबीआई (CBI) की दहलीज पर है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सिफारिश के बाद राज्य सरकार ने जांच का जिम्मा केंद्र को सौंपने का आग्रह किया है। लेकिन यह सवाल हवा में तैर रहा है— क्या सीबीआई जांच वाकई न्याय दिलाएगी या यह महज 'त्वरित बवाल' को शांत करने का एक राजनीतिक झुनझुना है?

अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने वाली पुलिस की नैतिक हार

डिप्टी सीएम और प्रदेश के गृह मंत्री सम्राट चौधरी, जो अपराधियों को 'जहन्नुम' भेजने का दावा करते थे, आज उनकी अपनी पुलिस 'जमीर' हार चुकी है। पटना पुलिस की लापरवाही और साक्ष्यों के साथ की गई 'लीपापोती' ने बिहार के सुशासन के दावों की पोल खोल दी है।

आरोपः डीजीपी ने आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया

जहानाबाद की रहने वाली छात्रा 5 जनवरी को पटना हॉस्टल आती है और 6 जनवरी को उसे बेहोशी की हालत में अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। 11 जनवरी को मेदांता में उसकी मौत हो जाती है। पुलिस ने इसे पहले दिन से 'आत्महत्या' का रंग देने की कोशिश की। हद तो तब हो गई जब थाना प्रभारी ने जांच के बजाय ड्राइवर को हॉस्टल पता करने भेज दिया।

इस मामले में  जबर्दस्त मोड़ तब आया जब पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट ने पुलिस के दावों को ध्वस्त कर दिया। जब छात्रा के कपड़ों पर पुरुष वीर्य मिला और सामूहिक दुष्कर्म की आशंका जताई गई, तब पुलिस के पास कोई जवाब नहीं था। परिजनों का आरोप है कि खुद डीजीपी ने उन पर आत्महत्या की बात स्वीकार करने का दबाव बनाया।

 किसके सामने नतमस्तक है व्यवस्था

क्या मनीष रंजन और नीलम अग्रवाल जैसे नामों को बचाने के लिए पूरी व्यवस्था नतमस्तक है? एम्स को पूरे दस्तावेज क्यों नहीं दिए गए? विसरा रिपोर्ट में देरी क्यों? क्या सम्राट चौधरी की पुलिस अब सिर्फ 'सरेंडर' करना जानती है? ये वो सवाल हैं जो बिहार की हर बेटी आज सत्ता से पूछ रही है। क्योंकि इतिहास के आइने में कई अनसुलझी 'इंसाफ' की दास्तां सीबीआई की फाइलों में गुम हो गईं।

रूपम पाठक: जब व्यवस्था ने मजबूर किया

पूर्णिया की इस शिक्षिका का मामला बिहार की न्यायिक विफलता का सबसे डरावना उदाहरण है। आरोप था कि तत्कालीन विधायक राजकिशोर सिंह ने उनका यौन उत्पीड़न किया था। जब हर जगह से न्याय की उम्मीद खत्म हो गई, तो रूपम पाठक ने सरेआम विधायक पर चाकू से हमला कर दिया, जिससे बाद में उनकी मौत हो गई। यह कांड याद दिलाता है कि जब तंत्र बहरा हो जाए, तो 'प्रतिशोध' जन्म लेता है।

शिल्पी जैन-गौतम हत्याकांड (1999)

पटना के इस हाई-प्रोफाइल केस ने तत्कालीन सरकार की चूलें हिला दी थीं। पटना के एक गैरेज में दो शव मिले थे। रसूखदारों के नाम आने के बाद केस सीबीआई को गया, लेकिन नतीजा 'सिफर' रहा। साक्ष्यों के अभाव में यह केस आज भी बिहार की पुलिसिया और सीबीआई जांच पर एक काला धब्बा है।

बॉबी हत्याकांड: सत्ता का रसूख और रहस्य

श्वेतनिशा उर्फ बॉबी की मौत का मामला दशकों बाद भी अनसुलझा है। इसमें सचिवालय और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों के नाम उछले थे। शव को कब्र से निकालकर जांच की गई, लेकिन अंत में केस बंद हो गया। यह दिखाता है कि रसूखदारों के आगे सीबीआई के हाथ भी बंध जाते हैं।

नवरुणा चक्रवर्ती (2012) और अन्य बेटियां

मुजफ्फरपुर की नवरुणा को उसके घर से सोते समय अगवा कर लिया गया था। बरसों तक सीबीआई जांच चली, सुप्रीम कोर्ट ने फटकार लगाई, लेकिन नवरुणा का क्या हुआ? कोई नहीं जानता। ठीक यही हश्र खुशी (2021) और यशी (2022) के मामलों का भी दिख रहा है।

ऐसे में सवाल उठता है कि विश्वास करें तो किस पर?

पटना पुलिस की विफलता के बाद सीबीआई को केस सौंपना यह दर्शाता है कि राज्य की कानून-व्यवस्था वेंटिलेटर पर है। यदि सीबीआई भी नवरुणा या शिल्पी जैन केस की तरह इसे फाइलों में दबा देती है, तो बिहार की बेटियों के पास 'रूपम पाठक' बनने के अलावा क्या विकल्प बचेगा? गृह मंत्री सम्राट चौधरी को जवाब देना होगा कि उनकी 'खुली छूट' क्या सिर्फ पुलिस को अपराधियों को बचाने के लिए मिली है?

दरक गया बिहार में न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा

 पटना में NEET की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत अब महज एक आपराधिक घटना नहीं रही। यह मामला धीरे-धीरे बिहार की कानून-व्यवस्था, पुलिस की कार्यप्रणाली और सरकार की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर एक व्याख्यात्मक टिप्पणी बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा मामले को CBI को सौंपने की सिफारिश और उसी समय पीड़ित परिवार का पटना हाईकोर्ट पहुँच जाना, इस बात का सबसे बड़ा संकेत है कि राज्य के भीतर न्याय की प्रक्रिया पर भरोसा दरक चुका है।

आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश

सरकार का तर्क है कि CBI जांच से सच्चाई सामने आएगी, लेकिन सवाल यह है कि यह फैसला शुरुआत में क्यों नहीं लिया गया। जब छात्रा 6 जनवरी को बेहोशी की हालत में अस्पताल लाई गई और 11 जनवरी को उसकी मौत हुई, तब तक पुलिस ने जिस तरह से मामले को ‘आत्महत्या’ के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, उसने जांच की मंशा पर गंभीर संदेह खड़े किए। पोस्टमार्टम और FSL रिपोर्ट आने से पहले ही निष्कर्ष तय कर लेना, और बाद में उन्हीं निष्कर्षों का बचाव करना, यह बताता है कि या तो पुलिस ने जल्दबाजी में काम किया या फिर जांच को एक निश्चित दिशा में मोड़ने की कोशिश हुई।

सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में

यही वह बिंदु है जहाँ सरकार की भूमिका सवालों के घेरे में आती है। जब स्थानीय पुलिस की निष्पक्षता पर सवाल उठे, जब साक्ष्य मिटाने के आरोप में थाना प्रभारी निलंबित हुई, तब CBI को केस सौंपना एक निर्णायक कदम कम और दबाव प्रबंधन ज्यादा प्रतीत होता है। इस फैसले को विपक्ष ने सरकार की हार करार दिया है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का कहना है कि जिस प्रशासनिक ढांचे पर सरकार को भरोसा होना चाहिए था, उसी की विफलता ने CBI जांच को अनिवार्य बना दिया। तेजस्वी का हमला केवल राजनीतिक नहीं है। उन्होंने नवरुणा चक्रवर्ती कांड का उदाहरण देकर उस सामूहिक स्मृति को याद दिलाया है जिसमें बिहार की कई बेटियों के मामले वर्षों तक जांच एजेंसियों के बीच घूमते रहे और अंततः फाइलों में दफन हो गए।

पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया

 यही आशंका इस मामले में भी परिजनों को सता रही है, और शायद इसी कारण उन्होंने सरकार और पुलिस पर भरोसा करने के बजाय न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाया है। हाईकोर्ट में दायर याचिका इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम मोड़ है। इसमें सिर्फ पुलिस या सरकार ही नहीं, बल्कि हॉस्टल प्रबंधन, निजी अस्पताल, डॉक्टर और प्रशासनिक अधिकारियों को भी कटघरे में खड़ा किया गया है। यह बताता है कि परिवार को डर है कि कहीं सच्चाई कई परतों के नीचे दबा न दी जाए। एक आम नागरिक के लिए हाईकोर्ट पहुँचना आसान फैसला नहीं होता; यह तब होता है जब व्यवस्था के भीतर के सारे रास्ते बंद दिखने लगते हैं।

सबसे ज्यादा बेचैन करती पुलिस की भूमिका

इस पूरे घटनाक्रम में पुलिस की भूमिका सबसे ज्यादा बेचैन करती है। जांच के शुरुआती दिनों में जो लापरवाही दिखी, वह सिर्फ तकनीकी भूल नहीं कही जा सकती। जब कपड़ों पर पुरुष के स्पर्म मिलने और दुष्कर्म की आशंका सामने आई, तब तक पुलिस का शुरुआती नैरेटिव पूरी तरह ढह चुका था। इसके बावजूद जिम्मेदारी तय करने के बजाय, ध्यान जांच एजेंसी बदलने पर केंद्रित हो गया।

CBI कोई जादुई समाधान नहीं

यहाँ यह समझना जरूरी है कि CBI कोई जादुई समाधान नहीं है। वह भी सबूतों पर ही काम करती है, और अगर शुरुआती दौर में साक्ष्य कमजोर या दूषित हो चुके हों, तो किसी भी एजेंसी के हाथ बंध जाते हैं। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि जांच किस एजेंसी के पास है, बल्कि यह है कि क्या राज्य अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करता है और पुलिस की जवाबदेही तय करता है।

न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता

इस मामले का सबसे खतरनाक पहलू इसका सामाजिक संदेश है। जब पीड़ित परिवार को न्याय के लिए सड़क से लेकर हाईकोर्ट तक भटकना पड़े, और सरकार जांच एजेंसी बदलकर संतोष जताए, तो समाज में यह धारणा मजबूत होती है कि न्याय अनिश्चित है। इतिहास गवाह है कि जब न्याय का भरोसा टूटता है, तब प्रतिशोध जन्म लेता है। रूपम पाठक का मामला इसी विफलता का प्रतीक था, किसी आदर्श का नहीं।

 

यह राज्य की नैतिक पराजय है

पटना की यह NEET छात्रा एक नाम भर नहीं है। वह उस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती है जो मेहनत और प्रतियोगिता के दम पर आगे बढ़ना चाहती है, न कि डर और असुरक्षा के साये में जीना। यदि यह मामला भी समय के साथ एक और ‘अनसुलझा कांड’ बन जाता है, तो यह केवल एक परिवार की हार नहीं होगी, बल्कि राज्य की नैतिक पराजय होगी।

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