google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: NitishKumar

Mobile, laptop and tablet

Showing posts with label NitishKumar. Show all posts
Showing posts with label NitishKumar. Show all posts

Tuesday, 14 April 2026

विकास के पर्याय: एक 'कर्मयोगी' के युग का समापन और मेरी पत्रकारिता के कुछ अनछुए पन्ने और नीतीश कुमार


बिहार की राजनीति के एक युग का समापन! मेरे संस्मरणों के जरिए जानिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 'मुन्ना' से 'कर्मयोगी' बनने का सफर। रेलवे सुधार, मरीन ड्राइव और मेट्रो जैसे विकास कार्यों से लेकर 10 बार शपथ लेने के बेदाग रिकॉर्ड तक, बिहार के पुनर्जागरण की अनकही कहानी।"

तरुण कुमार कंचन

बिहार की सियासत में आज एक अध्याय नहीं, बल्कि एक युग का समापन हो रहा है। राजनीति की बिसात पर शह और मात के खेल तो चलते रहेंगे, लेकिन जो विरासत पीछे छूट रही है, उसकी गूंज आने वाली कई सदियों तक सुनाई देगी। आज जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने पद से विदा ले रहे हैं, तो मेरी आँखों के सामने एक 'नेता' नहीं, बल्कि एक *'कर्मयोगी'* का अक्स उभर रहा है। यह रिपोर्ट उस राजनेता के नाम है जिसने बिहार की मिट्टी को विकास के सपनों से सींचा।

स्मृतियों के झरोखे से: 'प्रभात खबर' के वे दिन और 'मुन्ना' का विजन

एक पत्रकार के रूप में मेरा सफर कई ऐतिहासिक क्षणों का गवाह रहा है। मुझे आज भी वे दिन याद हैं जब मैं *'प्रभात खबर'* पटना में एक युवा रिपोर्टर के रूप में अपनी कलम को धार दे रहा था। वह दौर था जब नीतीश जी श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार में रेल मंत्री बनकर पहली बार बिहार आए थे।

मुझे सौभाग्य मिला पटना से लेकर उनके पैतृक क्षेत्र *बाढ़ और बख्तियारपुर* तक के कार्यक्रमों को कवर करने का। उसी यात्रा के दौरान मैंने जाना कि बख्तियारपुर की गलियां उन्हें आज भी प्यार से 'मुन्ना' कहती हैं। लेकिन उस 'मुन्ना' के इरादों में हिमालय जैसी अडिगता थी।

 रेलवे में क्रांति: उस दौर में रेल डकैतियां और असुरक्षा बिहार की पहचान बन चुकी थी। नीतीश जी ने न केवल सुरक्षा सुनिश्चित की, बल्कि इस्लामपुर रेल लाइन को पुनर्जीवित कर और बाढ़ में NTPC जैसे विशाल प्रोजेक्ट लाकर यह साबित कर दिया कि 'विजन' किसे कहते हैं।

 विकास का महापथ: सड़क से मेट्रो तक का सफर

नीतीश कुमार के शासनकाल को भविष्य में 'बिहार के बुनियादी ढांचे के पुनर्जीगरण' के रूप में पढ़ा जाएगा। उन्होंने सिर्फ फाइलें नहीं दौड़ाईं, बल्कि जमीन पर लकीरें खींचीं।

 सड़कों का जाल: बिहार के सुदूर गांवों को मुख्य सड़कों से जोड़ना उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि रही। राजद के कार्यकाल में जहां सड़कों पर बोर्ड टांग दिया गया था कि यह सड़क केंद्र सरकार की है, आज वहां चमचमाती सड़क पर सरपट गाड़ियां दौड़ रही हैं।

 गंगा पथ (मरीन ड्राइव): पटना की जिस गंगा के किनारे कभी सन्नाटा पसरा रहता था, आज वहां का 'मरीन ड्राइव' शहर की लाइफलाइन बन चुका है। यह उनके आधुनिक बिहार का हस्ताक्षर है।

 मेट्रो रेल: पटना की सड़कों पर मेट्रो का सपना आज उन्हीं की जिजीविषा के कारण हकीकत में बदल रहा है।

सुशासन और बेदाग व्यक्तित्व: रिकॉर्ड 10 बार शपथ

भारतीय राजनीति के इतिहास में 10 बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेना कोई सामान्य घटना नहीं है। सत्ता के शीर्ष पर इतने लंबे समय तक रहने के बाद भी, उनके दामन पर भ्रष्टाचार का एक छींटा तक न होना उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। उनकी शुचिता और ईमानदारी आज के दौर में दुर्लभ है।

"पद तो आते-जाते रहते हैं, पर जो कार्य पत्थर की लकीर बन जाएं, वही इतिहास में दर्ज होते हैं।"

 अंतिम क्षण तक कर्तव्यनिष्ठा: 'कर्मयोगी' का विदाई संदेश

आज जब उनके इस्तीफे की खबरें चारों ओर हैं, तब भी नीतीश जी का 'कर्मयोगी' स्वरूप अडिग दिखा। आज की सुबह भी उन्होंने सबसे पहले *बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर* की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया और तुरंत कैबिनेट की बैठक में जुट गए। यह दर्शाता है कि उनके लिए समय का हर एक कतरा बिहार की सेवा के लिए है, विदाई के शोक के लिए नहीं।

बिहार का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, वह नीतीश कुमार के जिक्र के बिना अधूरा होगा। उन्होंने एक पिछड़े राज्य की पहचान को बदलकर उसे विकास की मुख्यधारा में खड़ा किया। उनकी कार्यक्षमता और सोच को मेरा शत-शत नमन।

धन्य है उनकी सोच और वंदनीय है उनकी कार्यक्षमता!

जय हिंद, जय बिहार!


..............................................................................................................................................

कीवर्ड (Keywords)

  • नीतीश कुमार विदाई (Nitish Kumar Resignation)
  • बिहार विकास मॉडल (Bihar Development Model)
  • तरुण कुमार कंचन पत्रकारिता (Tarun Kumar Kanchan Journalism)
  • नीतीश कुमार के कार्य (Nitish Kumar Achievements)
  • सुशासन बाबू बिहार (Sushasan Babu Bihar)
  • कंचन वाणी (Kanchan Vani Blog)
  • प्रभात खबर संस्मरण (Prabhat Khabar Memories)
  • पटना मरीन ड्राइव और मेट्रो (Patna Marine Drive and Metro)
  • बिहार राजनीति का इतिहास (History of Bihar Politics)

हैशटैग (Hashtags)

#NitishKumar #BiharPolitics #Karmayogi #BiharDevelopment #Sushasan #JournalismLife #Patna #KanchanVani #BiharMetrorail #NitishEra #ThankYouNitishKumar




Tuesday, 13 January 2026

बिहार की सियासत में 'दही-चूड़ा' की मिठास या नए गठबंधन की कड़वाहट? खरमास बाद बड़े बदलाव के संकेत

BiharPolitics, NitishKumar, PrashantKishore, RCPSingh, BiharNews, JDU, BJP, SamridhiYatra, PoliticalAnalysis

"
चेहरा पुराना, तेवर नए: क्या समृद्धि यात्रा से नीतीश फिर से 'बड़े भाई' की भूमिका में लौटेंगे?"

बिहार की राजनीति में 16 जनवरी से बड़े बदलाव के संकेत! जानें नीतीश कुमार की समृद्धि यात्रा, PK और RCP सिंह की वापसी और भाजपा-जदयू के बीच जारी खींचतान का पूरा विश्लेषण।

Tarun Kumar Kanchan

 In Bihar politics, "Kharmas" (a month considered inauspicious for auspicious activities) isn't just confined to the calendar, it also symbolizes a political silence. But this silence is about to be broken with Makar Sankranti on January 14th.


 मौसम बदला, अब मिजाज बदलेगा

बिहार की राजनीति में 'खरमास' (एक ऐसा महीना जिसे शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना जाता है) सिर्फ पंचांग तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह राजनीतिक सन्नाटे का भी प्रतीक होता है। लेकिन 14 जनवरी को मकर संक्रांति के साथ ही यह सन्नाटा टूटने वाला है। 16 जनवरी से बिहार की राजनीति में जो हलचल शुरू होने वाली है, उसके केंद्र में एक बार फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। चर्चाएं आम हैं कि क्या नीतीश कुमार फिर से पाला बदलने की तैयारी में हैं? क्या भाजपा के साथ उनका 'हनीमून पीरियड' खत्म हो गया है? और क्या प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह जैसे पुराने रणनीतिकार फिर से नीतीश के 'थिंक टैंक' का हिस्सा बनने जा रहे हैं? तो ऐसा कह सकते हैं-
"हवाओं ने फिर अपना रुख बदला है, सियासत के आंगन में नया मंजर ढला है, यहाँ मकर संक्रांति पर सिर्फ तिलकुट नहीं कुटता, यहाँ तो कुर्सियों के लिए नया गठबंधन पला है।"
 

 समृद्धि यात्रा : जनमत टटोलने की कवायद या शक्ति प्रदर्शन?

नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी विशेषता उनकी 'यात्राएँ' रही हैं। जब भी वे किसी बड़े राजनीतिक संकट में होते हैं या किसी बड़े फैसले की दहलीज पर खड़े होते हैं, वे जनता के बीच निकल जाते हैं। 16 जनवरी से शुरू हो रही *'समृद्धि यात्रा'* इसी कड़ी का हिस्सा मानी जा रही है।
 चंपारण से शुरुआत: ऐतिहासिक रूप से चंपारण गांधी जी की कर्मभूमि रही है और नीतीश कुमार के लिए भी यह हमेशा से लकी रहा है। यहाँ से यात्रा शुरू करने का सीधा संदेश है कि वे अपनी 'सेकुलर' और 'विकास पुरुष' वाली छवि को फिर से धार देना चाहते हैं।
मूल्यांकन का दौर: राजनीतिक पंडितों का मानना है कि इस यात्रा के जरिए नीतीश कुमार दो मुख्य बातों का परीक्षण (Testing) करना चाहते हैं। पहला, क्या आज भी बिहार की जनता के बीच उनका 'क्रेज' बरकरार है? दूसरा, भाजपा के साथ गठबंधन के बाद जनता की उनके प्रति क्या सोच है? क्या जनता भाजपा के बढ़ते प्रभाव को पसंद कर रही है या फिर वे अब भी नीतीश को ही अपना निर्विवाद नेता मानते हैं?

 
भाजपा का दबाव और 'मंत्रिमंडल'
की खींचतान

ऐसा लग रहा है कि भाजपा और जदयू के बीच पिछले कुछ हफ्तों से सबकुछ ठीक नहीं चल रहा है। भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने नीतीश कुमार पर मंत्रिमंडल विस्तार के लिए जबरदस्त दबाव बनाया है। सूत्रों के मुताबिक, भाजपा ने अपने कोटे से मंत्रियों के नाम तय करके नीतीश कुमार को सौंप दिए हैं। लेकिन, नीतीश कुमार इस विस्तार को टालते आ रहे हैं।
बिहार के सियासत को जाननेवाले बरिष्ठ पत्रकार सरोज कुमार सिंह कहते हैं कि यह देरी महज प्रशासनिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। नीतीश कुमार जानते हैं कि अगर उन्होंने भाजपा की शर्तों पर मंत्रिमंडल विस्तार किया, तो सरकार में उनकी पकड़ ढीली हो सकती है। समृद्धि यात्रा पर निकलकर उन्होंने भाजपा को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता सरकार का विस्तार नहीं, बल्कि जनता का मूड समझना है।
 

प्रशांत किशोर (PK) की 'घर वापसी' की पटकथा

बिहार की राजनीति में इन दिनों सबसे ज्यादा चर्चा 'प्रशांत किशोर' (PK) की भूमिका को लेकर है। जनसुराज के माध्यम से बिहार के गांवों की खाक छान रहे PK को लेकर खबर है कि वे फिर से नीतीश कुमार के लिए 'बड़ी भूमिका' निभा सकते हैं।
"कहते हैं कि पुरानी डायरी के पन्ने चाहे कितने भी पुराने क्यों न हो जाएं, रणनीतिकार उन्हें फिर से पढ़ना नहीं भूलते। पीके और नीतीश का रिश्ता भी उस उलझी हुई रील की तरह है, जिसे सुलझाने की कोशिश में हर बार एक नई फिल्म बन जाती है।"
 
पीके की रणनीति : कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को यह डेटा और फीडबैक दिया है कि अगले चुनाव में महागठबंधन (राजद और कांग्रेस) का असर खत्म होने वाला है। पीके का मानना है कि बिहार की जनता अब पुराने ढर्रे की राजनीति से ऊब चुकी है।
गठबंधन का भविष्य: यदि पीके और नीतीश फिर से एक साथ आते हैं, तो यह बिहार में एक 'तीसरे मोर्चे' या जदयू को नए सिरे से विशाल बनाने की कोशिश हो सकती है। हालांकि, इसे कुछ लोग भाजपा के खिलाफ एक बड़ा 'षड्यंत्र' भी मान रहे हैं, ताकि नीतीश को भाजपा के प्रभाव से मुक्त किया जा सके।
 

आरसीपी सिंह: "रिश्ते कभी टूटे ही नहीं थे"

 इस पूरी कहानी में सबसे चौंकाने वाला मोड़ आरसीपी सिंह का बयान है। एक समय में नीतीश कुमार के 'हनुमान' कहे जाने वाले आरसीपी सिंह, जिन्होंने भाजपा के करीब जाने के चक्कर में जदयू से नाता तोड़ लिया था, अब फिर से नीतीश के गुणगान कर रहे हैं।
आरसीपी सिंह ने हाल ही में स्पष्ट रूप से कहा कि "मेरे और नीतीश जी के बीच कभी कोई वास्तविक दूरी थी ही नहीं। हम 25 सालों से साथ हैं और हम एक-दूसरे को सबसे बेहतर समझते हैं।" इस बयान के तीन बड़े राजनीतिक मायने हैं:
 
जदयू में वापसी का संकेत: आरसीपी सिंह का यह कहना कि 'रास्ते कभी अलग नहीं हुए', यह इशारा है कि खरमास के बाद वे औपचारिक रूप से जदयू में वापस आ सकते हैं।
पुराने कुनबे को जोड़ना: नीतीश कुमार समझ चुके हैं कि चुनाव जीतने के लिए उन्हें अपने उन पुराने साथियों की जरूरत है जो संगठन को समझते हैं। आरसीपी सिंह संगठन के आदमी रहे हैं।
भाजपा के लिए चेतावनी: आरसीपी सिंह जो कभी भाजपा के करीब थे, अगर वे वापस नीतीश के पाले में आते हैं, तो यह भाजपा के लिए एक बड़ा झटका होगा।
जहाँ आरसीपी सिंह का जिक्र है, वहां यह व्यंग्य सटीक बैठेगा:
"सियासत में 'हनुमान' भी बदलते हैं और 'राम' भी। जो कल तक अपनों की कतार से बाहर थे, आज वही वफादारी का सर्टिफिकेट लेकर सबसे आगे खड़े हैं। आखिर दही-चूड़ा की मिठास कड़वे रिश्तों को भी चाशनी में डुबो ही देती है।
 

क्या राजद और महागठबंधन का पत्ता साफ होगा?

प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह के सक्रिय होने के पीछे एक और बड़ी संभावना छिपी है— राजद (RJD) को अलग-थलग करना। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि नीतीश कुमार अब राजद के साथ जाने के बजाय अपने पुराने कैडर को मजबूत करना चाहते हैं। पीके का नीतीश को यह समझाना कि 'राजद खत्म हो जाएगी', एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हो सकता है ताकि नीतीश कुमार को एक 'स्वतंत्र ताकत' के रूप में पेश किया जा सके।
 

 भविष्य के गर्भ में क्या है?

बिहार की राजनीति 'संभावनाओं का खेल' है। खरमास खत्म होने के बाद 16 जनवरी से 31 जनवरी के बीच बिहार में कुछ बड़े घटनाक्रम हो सकते हैं। जैसे-
 नीतीश कुमार अपनी यात्रा के बाद भाजपा के साथ नए सिरे से सौदेबाजी (Bargaining) करेंगे।
आरसीपी सिंह और संभवतः प्रशांत किशोर की टीम जदयू के रणनीतिक ढांचे में शामिल होगी।
 और बिहार सरकार का स्वरूप बदल सकता है, जहाँ नीतीश कुमार खुद को 'छोटा भाई' मानने के बजाय 'बड़े भाई' की भूमिका में फिर से स्थापित करेंगे।
सच्चाई क्या है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन इतना तय है कि नीतीश कुमार ने अपनी 'समृद्धि यात्रा' और पुराने साथियों से संपर्क साधकर भाजपा और विपक्षी दलों, दोनों की नींद उड़ा दी है। भाजपा विरोधी खेमा इसे एक मास्टरस्ट्रोक मान रहा है, जबकि भाजपा इसे नीतीश कुमार की 'दबाव की राजनीति' देख रही है।
माना जा रहा है कि बिहार के सियासी मंच पर पर्दे उठ चुके हैं, पात्र तैयार हैं, और मकर संक्रांति के बाद 'महाभारत' शुरू होने वाला है।
 .......................................................................................................................................................

आपकी राय हमारे लिए महत्वपूर्ण है (Engagement Questions):

1.     पलटीमार या मास्टरस्ट्रोक? क्या नीतीश कुमार का पुराने साथियों की ओर मुड़ना भाजपा पर दबाव बनाने की रणनीति है?

2.     भाजपा बनाम नीतीश: मंत्रिमंडल विस्तार में देरी का असली कारण क्या है?

3.     PK का प्रभाव: क्या आप सहमत हैं कि बिहार की जनता अब तीसरे विकल्प की तलाश में है?

4.     समृद्धि यात्रा: क्या 2025 में भी नीतीश की 'विकास पुरुष' वाली छवि वोट दिला पाएगी?

5.     भविष्य की खिचड़ी: मकर संक्रांति के बाद आप किसकी सरकार बनते देख रहे हैं?

अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें!

.......................................................................................................................................

#BiharPolitics #NitishKumar #PrashantKishore #RCPSingh #BiharNews #JDU #BJP #SamridhiYatra #PoliticalAnalysis

BiharPolitics, NitishKumar, PrashantKishore, RCPSingh, BiharNews, JDU, BJP, SamridhiYatra, PoliticalAnalysis

 

अन्य खबरें के लिंक

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2026/01/cbi-5.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2026/01/blog-post_7.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2026/01/blog-post_6.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2026/01/blog-post.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2026/01/global-ai-race.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/12/bihar-rail-accident.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/12/2025.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/12/mf-husain-museum-doha.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/11/national-cancer-awareness-day-between.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/10/villages-cry-of-sorrow.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/11/industrial-revolution-mega-plan.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/11/new-labor-codes-positive-outcome-for.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/11/bihar-politics-nitish-governments.html

https://kanchanwani2020.blogspot.com/2025/10/british-era-jailer-asrani-is-no-more.html

 

 

 

Friday, 21 November 2025

Bihar Politics : नीतीश सरकार का 'एक करोड़ नौकरी' का वादा – चुनौती या आर्थिक क्रांति? | Nitish government's promise of 'one crore jobs' – challenge or economic revolution?

 

शपथग्रहण समारोह  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मदी ने मुख्यमंत्री का हाथ उठाकर समर्थन जताया, तो डबल इंजन की सरकार से बिहार की जनता की उम्मीदें बढ़ गईं।

💥Tarun Kumar Kanchan

Yesterday's crowd was overwhelmingly young. They envisioned 10 million jobs and employment opportunities. Now, after this enthusiasm, there's a need to shoulder responsibility.

कल 20 नवंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 10वीं ताजपोशी में जिस तरह मंच से लेकर मैदान तक लोग भरे पड़े। भारी उत्साह का वातावरण मौजूद था। प्रधानमंत्री स्वयं बिहारी स्टाइल में गमच्छा घुमा-घुमाकर उत्साहवर्द्धन कर रहे थे। कल की भीड़ सर्वाधिक युवा थे। उन्हें एक करोड़ नौकरी और रोजगार दिख रहा था। अब इस उत्साह के बाद जिम्मेदारी निभाने का तकाजा है। देखना यह है कि नीतीश कुमार ने जिसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया है, वह टांय-टांय फिस होती है या बिहार में आर्थिक क्रांति आती है।

वादे का पैमाना: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई सरकार के लिए 'एक करोड़ (10 मिलियन) नौकरी' का वादा केवल एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि बिहार की वर्षों पुरानी पलायन (Migration) की समस्या को जड़ से मिटाने की आकांक्षा है। लगभग 12.8 करोड़ की आबादी और युवा शक्ति वाले इस राज्य के लिए यह वादा एक अभूतपूर्व आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करता है।

यह रिपोर्ट इस वादे की व्यवहार्यता (Feasibility) का आकलन बिहार की वर्तमान आर्थिक संरचना और उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर करती है।

पृष्ठभूमि: बिहार की रोजगार संबंधी वास्तविकता

| आर्थिक सूचक | स्थिति और डेटा (सरकारी/आर्थिक सर्वेक्षण) | निष्कर्ष |

| प्रति व्यक्ति आय | ₹36,333 (स्थिर मूल्य पर), जो राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-तिहाई है। | निम्न क्रय शक्ति और जीवन स्तर । |

| विनिर्माण (Manufacturing) का योगदान | सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में केवल 15% (2021-22 अनुमान)। | संगठित क्षेत्र की नौकरियों का स्रोत बहुत सीमित है। |

| सेवा क्षेत्र का योगदान | GSDP में लगभग 59%। | अर्थव्यवस्था सेवा-आधारित है, लेकिन इसमें बड़ी संख्या में अनौपचारिक (Informal) और कम वेतन वाली सेवाएँ शामिल हैं। |

| औद्योगिक वृद्धि दर | हाल के वर्षों में यह नकारात्मक (-1.1%) रही है (2021-22 तक)। | औद्योगिक मंदी नए कारखाने और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में सबसे बड़ी बाधा है। |

| गरीबी का स्तर | बहुआयामी गरीबी 33.76% है, जो देश में सबसे अधिक है। | रोजगार की कमी सीधे गरीबी और पिछड़ेपन से जुड़ी है। |

निष्कर्ष: बिहार की अर्थव्यवस्था अभी भी उपभोक्ता (Consumption) आधारित है, न कि उत्पादन (Production) आधारित। इतनी बड़ी संख्या में औपचारिक रोजगार सृजित करने के लिए आवश्यक मजबूत विनिर्माण आधार राज्य में गंभीर रूप से कमज़ोर है।

 चुनौती का पैमाना: एक करोड़ नौकरियों का गणित

दर्शकों में जोश भरने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने
बिहारी स्टाइल में गमछा धुमाकर गर्दा उड़ा दिया। 


1 करोड़ नौकरियां 5 साल के कार्यकाल में देने का अर्थ है प्रति वर्ष 20 लाख नौकरियां सृजित करना। यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए देश के सबसे विकसित राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु) को भी संघर्ष करना पड़ता है।

यह लक्ष्य मुख्य रूप से तीन स्रोतों से आ सकता है:

सरकारी नौकरियाँ (Direct Jobs)

राज्य सरकार ने हाल में शिक्षक, पुलिस और अन्य विभागों में लाखों नियुक्तियाँ की हैं। यह सराहनीय है।


 * व्यवहार्यता: यदि सरकार अगले 5 वर्षों में 10 लाख (1 मिलियन) अतिरिक्त नियुक्तियाँ भी करती है, तो यह लक्ष्य का केवल 10% है। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित होती है और वे 1 करोड़ का लक्ष्य पूरा नहीं कर सकतीं।

 विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र (The Engine)

बड़े पैमाने पर नौकरियों का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत विनिर्माण क्षेत्र है, क्योंकि यह एक साथ लाखों अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को अवशोषित करता है।

 * चुनौती: वर्तमान में GSDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी केवल 15% है। 1 करोड़ नौकरियां देने के लिए इस हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाकर 25-30% तक ले जाना होगा। इसके लिए नीतीश सरकार के सामने चुनौतियां ज्यादा बड़ा हैं।

   * ₹75,000 करोड़ से अधिक के प्रस्तावित निवेशों को तेजी से ज़मीन पर उतारना होगा (Source 2.4)।

   * उद्योगपतियों को सस्ती बिजली, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और भूमि अधिग्रहण में अत्यधिक सरलता देनी होगी।

   * निवेश को कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण (लीची, मखाना), चमड़ा और आईटी जैसे श्रम-प्रधान (Labour Intensive) क्षेत्रों पर केंद्रित करना होगा।

 

स्व-रोजगार, MSMEs और सेवा क्षेत्र (The Multiplier)

अधिकांश नौकरियां (लगभग 80%) छोटे और मझोले उद्यमों (MSMEs) और स्व-रोजगार से आएंगी।

 * सफलता की कुंजी: सरकार को 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना'  जैसी योजनाओं के तहत आसान ऋण और पूंजीगत सब्सिडी को इतना बढ़ाना होगा कि लाखों उद्यमी (Entrepreneur) पैदा हों।

   * स्किलिंग (Skill Development): युवाओं को केवल भत्ता (जैसे मुख्यमंत्री स्वयं सहायता भत्ता योजना) देने के बजाय, उन्हें आईटी, प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बाजार की मांग के अनुरूप कुशल बनाना होगा।

सफलता के लिए आवश्यक आर्थिक क्रांति

'एक करोड़ नौकरी' का वादा केवल तभी पूरा हो सकता है जब नई सरकार वित्तीय दृढ़ता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाए:

 * वित्तीय अनुशासन: मुफ्त वादों (Freebies) पर राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखते हुए (जो पहले से ही खतरनाक स्तर पर है), पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को औद्योगिक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर केंद्रित करना होगा।

 * कानून व्यवस्था (Rule of Law): औद्योगिक निवेश तभी आएगा जब राज्य में सख्त कानून का राज हो और निवेशकों में सुरक्षा का भाव हो।

 * पलायन का उलटफेर: सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो पलायन कर चुके कुशल कारीगरों को वापस बिहार आने और अपने गृह नगरों में छोटे उद्यम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करें।

निष्कर्ष और अंतिम निर्णय

'एक करोड़ नौकरी' का लक्ष्य अत्यंत महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह असंभव नहीं है।

शपथग्रहण के बाद मुख्यमंत्री
 नीतीश कुमार को शुभकामानाएं
 देते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

इसे पूरा करने के लिए केवल सरकारी भर्तियों पर निर्भरता छोड़कर
, बिहार को अपनी सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था को तेजी से उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था में बदलना होगा। यदि सरकार अगले पाँच वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 25% तक बढ़ाने में सफल होती है और लाखों युवाओं को उद्यमी बनने के लिए वित्तीय सहायता देती है, तो यह वादा बिहार के आर्थिक इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति साबित हो सकता है।

यह लक्ष्य हासिल करना 'आर्थिक चुनौती' नहीं, बल्कि 'आर्थिक युद्ध' जीतने जैसा है।

यह भी पढ़ें - चुनौतियों का पहाड़ और कांटों भरा ताज

#BiharJobsChallenge #BiharEconomy #NitishKumar #1CroreJobs #आर्थिक_क्रांति #PalanKaAnt #BiharManufacturing #RozgarMission #BiharPolitics #EconomicAnalysis #DataDriven