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Thursday, 19 November 2020

लोक आस्था का महापर्व छठ - Mahaparva chhath of folk faith

अर्घ्य दान


तालाब पर डाला ले जाते

सूर्योपासना का व्रत है छठ । सूर्य की ऊर्जा को स्वयं में जागृत करने का व्रत है छठ।
श्रद्धा का परम निवेदन है छठ। एकनिष्ठ जीवन की विराटता का आवाहन है छठ।
इस कारण आध्यात्मिकता के साथ सांसारिकता भी है छठ।
वेद और आर्य संस्कृति के साथ प्रकृति से भी जुड़ा है छठ पर्व।
इस कारण छठ के हर रंग का वर्णन इसके लोक गीतों में मिलते है।


कामना
इस अवसर पर छठ मइया से मुख्यतः संतान प्राप्ति, रोग मुक्ति और सुख-सौभाग्य की कामना की जाती है।

परमानंद की अनुभूति  

लोग कहते हैं छठ का अनुष्ठान कठोर होता है, पर व्रतियों को इसमें परमानंद की अनुभूति होती है।
छठ पर्व चार दिनों तक चलनेवाला है। व्रती को हर दिन अलग-अलग नियमों का पालन करना पड़ता है।
इनमें पवित्र स्नान, उपवास, ठेकुआ-कसार का प्रसाद बनाना, पीने के पानी से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना और  और अर्घ्य देना शामिल है। 

इस बार छठ पर कोरोना का असर
इसके वाबजूद लोगों के बीच उत्साह कम नहीं है। जो जहां है वहीं छठ की तैयारी में  जुटा है। कोरोना के कारण इस बार लोग अपने घरों में ही अर्घ्य की व्यवस्था कर रहे हैं।

अब जानते हैं शुभ मुहूर्त कब है
छठ को हिंदुओं का सबसे बड़े त्योहारों में गिना गया है। उत्तर भारत और खासतौर से बिहार, झारखंड और
पूर्वी यूपी में इस त्योहार को बेहद खास महत्व दिया जाता है।

पहला दिन यानी नहाय-खाय
छठ पूजा की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी तिथि से होती है।
यह छठ पूजा का पहला दिन होता है, इस दिन को नहाय-खाय कहते हैं।  उस दिन जो व्रत रखती हैं
उसे शुद्ध सात्विक विधि का पालन करना होता है।  इस वर्ष नहाय-खाय 18 नवंबर बुधवार को है।
बिहार-झारखंड में लोग इस दिन कद्दू यानी लॉकी की सब्जी अनिवार्य रूप से खाते हैं। इस कारण इसे कद्दू-भात भी कहते हैं। इससे मन की पवित्रता के साथ शरीर भी स्वस्थ रहता है।

दूसरा दिन यानी लोहंडा और खरना
लोहंडा और खरना छठ पूजा का दूसरा दिन होता है। यह कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को होता है।
इस वर्ष लोहंडा और खरना 19 नवंबर गुरुवार को है। व्रती इस दिन सुबह से खरना तक एक बूंद पानी नहीं पीती है।
अब सवाल उठता है कि खरना क्या होता है। पंचमी को सूर्यास्त होने के बाद छठव्रती मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी जलाकर भगवान भाष्कर के लिए भोग बनाती है।
इसके बाद सूर्यदेव का आवाहन करती हैं कि हम सब को स्वस्थ रखें ताकि कल आपका दर्शन हो।
इस अवसर पर खीर, रसिया यानी ईख के रस में बने चावल और फलों का भोग लगाया जाता है।
उसे खरना का प्रसाद कहते हैं। व्रती दिनभर उपवास के बाद उसे ही ग्रहण करती हैं।
आसपास के लोगों के बीच वितरण भी किया जाता है।   

तीसरा दिन यानी संध्या अर्घ्य
छठ पूजा का मुख्य दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को होता है। इस दिन ही छठ पूजा होती है। शाम को सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है।
इस साल संध्या अर्घ्य शुक्रवार 20 नवंबर को है। लोग अस्ताचलगामी सूर्य को कच्चे बांस के सूप से अर्ध्य देंगे।
दिन में अर्घ्य के लिए ठेकुआ और चावल के आटे का लड्डू बनाया जाता है।
इसके बाद अर्घ्य के लिए सूप को सजाया जाता है।  इसमें  नारियल, मौसमी फल के साथ गन्ना, अदरख और हल्दी के पौधे को भी रखा जाता है। इसके बाद घर के पुरुष उस सूप को डाले में  रख कर नदी या तालाब के किनारे ले जाते हैं जहों अर्घ्य दिया जाता है।
व्रती  नदी या तालाब में  स्नान करके हाथ में  सूप रख कर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती हैं। इसके बाद व्रती घाट से घर लौट आती हैं। उस रात वह पानी तक ग्रहण नहीं करेंगी।  कुछ लोग घाट के किनारे ही रातभर रहते हैं।

चौथा दिन यानी सुबह का अर्घ्य
इसे हम पारण का दिन भी कहते हैं।
छठ पूजा का अंतिम दिन कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि होती है। जिस प्रकार शाम के अर्घ्य के लिए सूप तैयार किया जाता है।
उसी तरह सुबह के अर्घ्य के लिए सूप तैयार किया जाता है। इस दिन सूर्योदय के समय सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित किया जाता है। उसके बाद पारण कर व्रत को पूरा किया जाता है। पारण यानी 36 घंटे के बाद व्रती छठ का प्रसाद खाकर व्रत तोड़ती हैं।  इस वर्ष छठ पूजा का सूर्योदय अर्घ्य तथा पारण शनिवार 21 नवंबर को होगा।

छठ पर्व के महत्व को समझा जाए तो इससे हमें कई संदेश मिलते हैं।
1. पर्यावरणविदों का दावा है कि छठ सबसे पर्यावरण-अनुकूल हिंदू त्योहार है। इसलिए प्रकृति से जुड़े रहो।

2. अस्ताचलगामी सूर्य की पूजा से हमें यह संदेश मिलता है कि सब समान है। जीवन में भेदभाव का कोई स्थान नहीं है।
 3. बेटा-बेटी सब समान हैं। लोकगीतों में इन संदेशों का विशद वर्ण है।
 व्रती छठ मईया से मांगती है कि .रुनकी-झुनकी बेटी दियह..
इसी तरह दूसरा गीत है -मां बेटा त. दियहल लेकिन लक्ष्मी दे के करदे अंगनमा  उधार है...


इसकी शुरुआत कहां और कैसे हुई
मान्यता है की देव माता अदिति ने सर्वप्रथम छठ पूजा की थी। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव, वर्तमान बिहार के औरंगाबाद जिले में स्थित सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र हुए त्रिदेव रूप आदित्य भगवान, जिन्होंने असुरों पर देवताओं को विजय दिलायी।

एक प्रचलित कथा है कि जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गये, तब श्रीकृष्ण द्वारा बताये जाने पर द्रौपदी ने छठ व्रत रखा। तब उनकी मनोकामनाएँ पूरी हुईं तथा पांडवों को राजपाट वापस मिला था।

लोक परम्परा के अनुसार सूर्यदेव और छठी मइया का संबंध भाई-बहन का है। लोक मातृका षष्ठी की पहली पूजा सूर्य ने ही की थी।  जब छठी मइया हैं तो सूर्य की पूजा क्यों
 

सूर्य आराधना का पर्व 

छठ पर्व मूलतः सूर्य की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है।
सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों का नमन किया जाता है। लोग उनसे तेज प्राप्त करते हैं।

परंपरा
भारत में सूर्य उपासना ऋगवेद काल से होती आ रही है। सूर्य और इसकी उपासना की चर्चा विष्णु पुराण, भगवत पुराण, ब्रह्मा वैवर्त पुराण आदि में गयी है।
मध्य काल तक छठ सूर्योपासना के व्यवस्थित पर्व के रूप में प्रतिष्ठित हो गया, जो अभी तक चला आ रहा है।

छठ का सामाजिक और सांस्कृतिक जोड़ महत्वपूर्ण है।
इसका सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी, पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का रस, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद
और मधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार होता है।

छठ के लोकगीत ही  मंत्र
गीत में ही वे सब पिरो दिए गए हैं, जो इस पर्व का उद्देश्य है। इसलिए छठ के विभिन्न अवसरों पर जैसे प्रसाद बनाते समय, खरना के समय, अर्घ्य देने के लिए जाते हुए, अर्घ्य दान के समय और
घाट से घर लौटते समय अनेक भक्ति-भाव से पूर्ण लोकगीत गाये जाते हैं।

    'केलवा जे फरेला घवद से, ओह पर सुगा मेड़राय
    काँच ही बाँस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए'
    सेविले चरन तोहार हे छठी मइया। महिमा तोहर अपार।
    उगु न सुरुज देव भइलो अरग के बेर।
    निंदिया के मातल सुरुज अँखियो न खोले हे।
    हम करेली छठ बरतिया से उनखे लागी।

Friday, 21 August 2020

गणेश चतुर्थी

 


आत्मविश्वास बढ़ानेवाले ऊर्जापुंज हैं भगवान श्रीगणेश

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ 

अर्थात वक्र सूंड वाले, बड़े शरीर के मालिक और करोड़ों सूर्य के बराबर तेज प्रतिभाशाली। हे देव, आप हमेशा हमारे सभी कार्यों को बाधा रहित पूरा करें। 

आज गणेश चतुर्थी है। इस अवसर पर हम अपने आराध्य देव भगवान गणेश की उपासना करते हैं। उनकी उपासना से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है। हिन्दु दर्शन के मुताबिक कोई काम शुरू करने से पहले यदि विघ्नहर्ता प्रथम पूज्य श्रीगणेश का स्मरण करें तो निश्चित रूप से हमें सफलता मिलती है। हर बाधा को आसानी से पार कर लेते हैं। भगवान श्रीगणेश की आराधना से लगता है कि हमने ऊर्जा के पुंज को प्राप्त कर लिया है। मानसिक तौर पर हम सकारात्मक हो जाते हैं। मनन और चिंतन के प्रतिफल में  आत्मविश्वास बढ़ जाता है। 

दस दिनों का उत्सव

भारतवर्ष समेत पूरे विश्व में हिन्दु दर्शन में आस्था रखनेवाले लोग गणेश चतुर्थी को धूमधाम के साथ मनाते हैं। जहां तक संभव होता है लोग सार्वजनिक या निजी स्तर पर गणपति की प्रतिमा को स्थापित करते हैं। गणेश उत्सव भाद्रपद की चतुर्थी से चतुर्दशी तक यानी दस दिनों तक चलता है। चतुर्दशी को इनका विसर्जन किया जाता है। 

कोरोना वायरस का असर 

गणेश चतुर्थी के मौके पर महाराष्ट्र में विघ्नहर्ता विनायक श्रीगणेश जी की पूजा-अर्चना जोर-शोर से की जाती है। बड़े-बड़े पंडालों में प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस बार कोरोना संक्रमण को देखते हुए लोग अपने घरों में पूजा-अर्चना करेंगे। सार्वजनिक उपासना पूरे देश में निषिद्ध है। 

गणेश चतुर्थी की मान्यताएं

भगवान शिव यायावर किस्म के थे। वर्षों तक वह प्रकृति के साथ अलग-अलग स्थानों पर साधना में लीन रहते थे। माता पार्वती से कोई संपर्क नहीं रहता था। माता अकेली रहती थीं। उनका मन एकाकीपन से विह्वल हो जाता था। कभी-कभार स्त्री सुलभ मातृत्व कामना भी उनके हृदय को व्याकुल कर देता था। शिव यक्ष स्वरूप माने जाते हैं। इस कारण पार्वती उनके बच्चे का धारण नहीं कर सकती थी। 

श्रीगणेश जी का अवतरण

श्रीगणेश जी के अवतरण को लेकर शास्त्रों में कई तरह की कथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं। हर कथा इस ओर संकेत करता है कि भगवान गणेश का प्रादुर्भाव माता पार्वती के हाथों हुआ है। कहा जाता है कि माता ने अपने शरीर पर लगे उबटन (चंदन-हल्दी का लेप) को लेकर मिट्टी से मिलाकर एक पुतले का निर्माण किया।  फिर उसे बच्चे का आकार दिया और उसमें प्राण डाल दिए। बाद में वह भगवान गणेश के रूप में प्रचलित हुए। वर्तमान संदर्भ में भगवान गणेश की उत्पति की कहानी कोरी कल्पना महसूस होती है। पर, आधुनिक विज्ञान में एपिथेलियल कोशिका से यह संभव हो रहा है।

 गणेश से अभिज्ञ शिव

गणेश का प्रादुर्भाव भगवान शिव की अनुपस्थित में हुआ। शंकर भगवान इससे अभिज्ञ थे। कई वर्षों के बाद जब वह अपने गणों के साथ वापस लौटे तब श्रीगणेश 10-12 साल के हो चुके थे। उस समय पार्वती स्नान कर रही थीं। माता ने गणेश जी को आदेश दिया कि - देखना कोई इधर न आ जाए। भगवान शिव जब घर में  प्रवेश करने की कोशिश कर रहे थे तब गणेश जी ने उन्हें दरवाजे पर रोक दिया। इससे भगवान शंकर को गुस्सा आ गया। उन्होंने बिना विचार किए अपनी तलवार से बालक का सिर धड़ से अलग कर दिया। इसी कारण कहते हैं गुस्से में फैसला नहीं लेना चाहिए। उसका अंत पश्चाताप ही होता है। भगवान शिव ने अपने ही बच्चे को खो दिया। 

क्यों कहा जाता है गणपति  

खून से लाल तलवार के साथ भगवान को घर में प्रवेश करते देख माता पार्वती सन्न रह गईं। उन्हें हादसे का भान हो गया। वह आपे से बाहर हो गईं। शिव को खरी-खोटी सुनाने लगीं। भगवान शिव माता पार्वती को बहुत समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा, अपने सृजन किया और हमने संहार कर दिया। मगर, माता ने एक न सुना। उन्हें अपना लाड़ला चाहिए। इसके बाद भगवान शंकर ने अपने गणों में से एक का सिर ले लिया और बालक के सिर पर लगा दिया। आधुनिक मेडिकल साइंस इसे प्रत्यारोपण मानता है। गणेश चतुर्थी वही दिन है। चूंकि उन्होंने गणों के मुखिया का सिर काटकर लिया था और इस बालक के धड़ पर लगाया था, तो उन्होंने कहा, अब से तुम एक गणपति हो।

सिर हाथी का क्यों

यह एक रोचक पहलू है। कुछ लोगों का कहना है कि हाथी का सिर होना एक कलाकार की कल्पना है जिन्होंने पहली बार गणेश की तस्वीर को उकेरा। माना जाता है कि गणों के अंग में हड्डियां नहीं होती और हाथी के सूंड में भी हड्डी नहीं होती। इसी कारण कलाकार ने गण से गज की कल्पना की होगी। 

हालांकि गणेशजी को गज का मुख लगाए जाने का रहस्य गणेश पुराण में मिलता है। भगवान विष्णु से दुर्वाशा ऋषि को पारिजात पुष्प मिला था। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप वह देवराज इंद्र को दे दिया और कहा कि जिसके सिर पर यह पुष्प रखा जाएगा वह कुशाग्र होगा। उस वक्त अप्सरा रंभा के प्रेम में कामुक देवराज ने पुष्प का अनादर किया और उसे हाथी के सिर पर रख दिया। ऐसा करते ही देवराज इंद्र का तेज समाप्त हो गया और हाथी मतवाला हो गया। हाथी लोगों को उत्पीड़ित करने लगा। हाथी के मद को कम करने के लिए ईश्वरीय लीला हुई और उसका सिर काट कर बालक गणेश के धड़ से जोड़ दिया गया। पारिजात पुष्प का आशीष भी बालक गणेश को मिला और वह कुशाग्र हो गए।

गणेश जी का अवतार 

भगवान विष्णु और शिव की तरह भगवान गणेश भी घरती पर पाप को खत्म करने के लिए आठ अवतार लिए। इनमें सबसे प्रमुख है- विघ्नहर्ता अवतार। इसमें उन्होंने सिंधु नाम के एक राक्षस का वध किया था। गणेश पुराण में उल्लेखित है कि दैत्य सिंधु कठिन तपस्या कर भगवान विष्णु से वरदान ले लिया था। वरदान स्वरूप श्रीहरि को बैकुंठ छोड़कर सिंधु के नगर में  निवास करना पड़ा। वह बंदी की तरह जीवन गुजारने लगे और सिंधु का देवताओं के खिलाफ अत्याचार बढ़ गया। इससे देवताओं में हाहाकार मच गया। शिवजी भी कैलाश पर्वत को छोड़कर चले गए। इस बीच भगवान विश्वकर्मा शिवजी से मिलने कैलाश पर आए। वहां विश्वकर्मा की मुलाकात गणेश जी से होती है। सर्वज्ञ भगवान गणेश विश्वकर्मा को देखते ही सब कुछ समझ गए थे। जबकि भगवान गणेश तब 7-8 साल के होंगे। उन्होंने विश्वकर्मा जी से पूछा - मुझसे मिलने आए हैं, तो मेरे लिए कोई उपहार लाए हैं? भगवान विश्वकर्मा ने

उन्हें अस्त्र-शस्त्र उपहार में दिए। इससे गणेशजी अति प्रसन्न हुए और खेल-खेल में वृकासुर नामक राक्षस को खत्म कर दिया। इससे खुश होकर देवताओं ने उनसे दैत्य सिंधु को खत्म करने की विनती की। 

दैत्य सिंधु का संहार

बालक गणेश महादैत्य सिंधु से जंग करने निकल पड़े। इधर सिंधु के नगर में इसकी चर्चा तेज हो गई कि एक बालक चूहे पर सवार होकर सिंधु से लड़ने आ रहा है। लोगों ने भगवान गणेश की खिल्ली उड़ाई। स्वयं दैत्य सिंधु खूब हंसा। इससे बालक गणेश का गुस्सा बढ़ता चला गया। उन्होंने अपने आपको सौ गुणा बड़ा कर लिया और भगवान विश्वकर्मा द्वारा प्राप्त आयुध से उस पर हमला कर दिया। असुर सिंधु को वहीं धराशाई होना पड़ा। तब से गणपति विघ्नहर्ता कहलाने लगे।

पूजा का शुभ मुहूर्त

 दिन के 11 बजकर सात मिनट से दोपहर एक बजकर 42 मिनट तक

शाम में चार बजकर 23 मिनट से सात बजकर 22 मिनट तक

रात में नौ बजकर 12 मिनट से 11 बजकर 23 मिनट तक है।


पूजा सामग्री 

पान, सुपारी, लड्डू, सिंदूर, दूर्वा घास


पूजा विधि

लाल वस्त्र चौकी पर बिछाकर भगवान को स्थान दें। चौकी पर अक्षत जरूर रखें। यह समृद्धि का प्रतीक है। इसके साथ कलश की स्थापना करें। कलश में जलभरकर उसके ऊपर नारियल रखकर चौकी के पास रख दें। प्रसाद के रूप में मोदक और लड्डू रखना चाहिए।


इस मंत्र का करें जाप

ऊं गं गणपतये नम:।

भगवान गणेश की पूजा से लाभ 

भगवान श्रीगणेश विघ्न विनाशक हैं। वह गणों के स्वामी हैं। मान्यता है कि उनकी उपासना से नौ ग्रहों का दोष खत्म हो जाता है। भगवान श्रीगणेश का जहां पूजन होता है, वहां रिद्धि-सिद्धि और शुभ-लाभ का वास होता है।

कहां करें स्थापना

घर के मुख्य द्वार पर भगवान श्रीगणेश की मूर्ति स्थापित करने से घर में नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं करती हैं। भगवान श्रीगणेश को हल्दी अर्पित करना शुभ माना जाता है। हल्दी से श्रीगणेश का तिलक करने से हर कार्य में सफलता प्राप्त होती है। 

ध्यान देने योग्य तथ्य

घर के हर कमरे में श्रीगणेश की मूर्ति न रखें। पूजास्थल के अलावा स्‍टडी रूम में उनकी मूर्ति रखी जा सकती है। घर में श्रीगणेश की शयन या बैठी हुई मूर्ति शुभ होती है। कार्यस्थल पर जमीन को स्पर्श करते हुए खड़ी हुए मुद्रा में भगवान श्रीगणेश की मूर्ति लगाएं। भगवान श्रीगणेश के चित्र में मोदक या लड्डू और चूहा होना चाहिए।

                                                                                                             - तरुण कुमार कंचन

 


Thursday, 20 August 2020

हरतालिका व्रत तीज

 


प्रेम की प्रगाढ़ता है हरतालिका व्रत तीज

तरुण कुमार कंचन

भारत की पहचान इसकी सभ्यता और संस्कृति है। यहां कण-कण में राम बसते हैं। श्रद्धा और आस्था के इस देश में प्रेम की प्रचुरता भी है। जहां प्रेम का वास होता है, वहां समर्पण सबसे आगे चलता है। हरतालिका तीज इसी समर्पण भाव का प्रतीक है।


क्यों कहते है तीज

भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाए जाने के कारण इसे तीज कहते हैं। इस बार यह व्रत शुक्रवार 21 अगस्त 2020 को मनाया जाएगा। इस दिन सूर्य सिंह राशि और चंद्रमा कन्या राशि में रहेगा।

शुभ मुहूर्त - पूजा के लिए सबसे शुभ मुहूर्त शाम 6 बजकर 55 मिनट से लेकर रात नौ बजकर 8 मिनट तक होगा।

मनाने की परंपरा

बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ राजस्थान के भी कुछ इलाकों में भी सुहागिन महिलाएं इस व्रत को रखती हैं। दक्षिण भारत में भी इस पर्व को मनाया जाता है। वहां गौरी हव्वा के नाम से लोग जानते हैं।

अखंड सौभाग्य का व्रत

सावन और भादो शिव महिमा से परिपूर्ण है। भगवान शिव परिवार के साथ चलनेवाले देवताओं में अग्रणी हैं। मानव जाति पर उनकी असीम कृपा रहती है। इस कारण अखंड सौभाग्य के लिए सुहागिन महिलाएं इस व्रत को श्रद्धा से करती हैं। वह निर्जला रहती हैं। मान्यता है कि भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित यह व्रत सुहागिन महिलाएं पति के दीर्घायु होने की कामना के साथ रखती हैं। परिवार पर उनका आशीष प्राप्त होता है। कहते हैं कि कुंवारी कन्या यदि इस व्रत को रखती हैं तो मनचाहा पति की इच्छा पूर्ण होती है।

हरतालिका तीज की कथा

घर्मग्रंथों में वर्णित है कि माता पार्वती ने सबसे पहले इस व्रत को रखा था। इसके बाद भगवान शिव ने उनसे विवाह किया। कथा कुछ प्रकार है- माता पार्वती के पिता हिमालय उनके विवाह के बारे में  सोच रहे थे। नारद जी ने हरि यानी विष्णु से पार्वती का विवाह कराने की सलाह हिमालय को दी। हिमालय ने भी अपनी सहमति दे दी। उधर माता पार्वती शिव को अपना सर्वस्व मान चुकी थी और उन्हें प्राप्त करने के लिए कठिन तपस्या भी की।

 मान्यता है कि माता पार्वती ने सुखे पत्ते खाकर शिव की साधना में लीन हो गई। सावन में निराहार रहीं। इस बीच भगवान विष्णु से विवाह की पूरी तैयारी कर ली गई। पार्वती विह्वल होने लगीं। उन्होंने पूरी कहानी अपनी सहेलियों को बता दी। हरि से विवाह नहीं रुकने की स्थिति में सहेलियों ने हरण कर उन्हें जंगल में छुपा दिया। पूरा सावन बीत गया मगर हिमालय को अपनी पुत्री का पता नहीं चला। भाद्रपद शुक्ल पक्ष तृतीया को पार्वती जी ने एक गुफा में रेत का शिवलिंग बनाकर शिव की पूजा शुरू कर दी। तब शिव ने समाधि तोड़ी। उन्हें अपनी पत्नी बनने का वरदान दिया। सुबह होने पर पार्वती ने अपनी पूजा पूर्ण की और सहेलियों के साथ पारण किया।

दूसरी कथा यह है कि महर्षि वशिष्ठ की पत्नी अरुन्धती ने इस व्रत को की और अपने पति सहित ऋषियों में ऊच्च स्थान प्राप्त किया।

पूजन सामग्री

माता पार्वती के लिए श्रृंगार सामग्री चूड़ी, कंघी, कुमकुम, सिंदूर, बिंदी, काजल, घी-तेल, बिछिया चढ़ाई जाती है। भगवान शिव के लिए धूप, दीप, फूल, बेलपत्र, आम के पत्ते, पान और मिठाई चढ़ाई जाती है। शिवजी को वस्त्र जरूर चढ़ाना चाहिए। 

पूजन विधि

 रेत या मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतीमा बनाई जाती है। शाम में प्रदोष काल में चौकी पर लाल कपड़ा या केले के पत्ते को बिछाकर उसपर प्रतिमाएं रखी जाती हैं। फूल और मालाओं उसे सजाया जाता है। इसके बाद चौकी के सामने कलश रख कर शिव-पार्वती की प्रतिमाओं पर जल छिड़ककर स्नान कराया जाता है। धूप, दीप, कर्पूर ,मेवा, पंचामृत और मिठाई चढ़ाई जाती है। माता पार्वती के लिए श्रृंगार सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद शिव और पार्वती से जुड़ी कथाएं पढ़ी जाती हैं। सुहागिन महिलाएं रात भर हर पहर पूजा करती हैं और भजन कीर्तन करती है। उस रात व्रती सोती नहीं है। सुबह उठकर शिव-पार्वती की आरती के बाद पारण करती हैं।

शिव पूजन मंत्र

ऊं हराय नम: । ऊं महेश्वराय नम: । ऊं शम्भवे नम: । ऊं शूलपाणये नम: । ऊं पिनाकवृषे नम: । ऊं शिवाय नम: । ऊं पशुपतये नम: । ऊं महादेवाय नम: 

माता पार्वती पूजन मंत्र

ऊं उमायै नम: । ऊं पार्वत्यै नम: । ऊं जगद्धात्र्यै नम: । ऊं जगत्प्रतिष्ठयै नम: । ऊं शांतिरूपिण्यै नम: । ऊं शिवायै नम: ।