google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: कैंसर कथा - National Cancer Awareness Day: उम्मीद और हकीकत के बीच एक पीड़ित की आपबीती | Between hope and reality, one survivor's story

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Friday, 7 November 2025

कैंसर कथा - National Cancer Awareness Day: उम्मीद और हकीकत के बीच एक पीड़ित की आपबीती | Between hope and reality, one survivor's story

 

Today is National Cancer Awareness Day. Cancer is the greatest unknown enemy not only of India but of all humanity. India alone has over 1.5 million cancer patients, and the situation remains dire.

आज राष्ट्रीय कैंसर जागरूकता दिवस है। कैंसर सिर्फ भारत का ही नहीं, बल्कि पूरे मानव समुदाय
का सबसे बड़ा अज्ञात दुश्मन है। भारत में अकेले 15 लाख से अधिक कैंसर मरीज
हैं और स्थिति भयावह बनी हुई है। चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है, लेकिन कैंसर के इलाज के नाम पर आज भी स्थिति 'ढाक के तीन पात' जैसी ही है।

💔 मैंने एक पति के रूप में सब कुछ झेला

मैं इस विषय पर इसलिए बात कर रहा हूँ क्योंकि मैं स्वयं एक पीड़ित परिवार का सदस्य हूँ। मैंने cancer warriors अपनी पत्नी को कैंसर के कारण खो दिया। मैंने इलाज के लिए हर उस अस्पताल का दरवाज़ा खटखटाया, जहाँ जीवन की कोई भी आशा दिखती थी—अपने गृह नगर से लेकर, पटना के जय प्रभा मेदांता, मुंबई के होमी भाभा कैंसर अस्पताल, दिल्ली के एम्स और राजीव गांधी कैंसर इंस्टीट्यूट तक इलाज कराया।

पटना के मेदांता अस्पताल में कैंसर की सर्जरी और 30 रेडिएशन कराए।

डॉक्टरों ने सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन और इम्यूनोथेरेपी की सलाह दी।

हमने लाखों के महँगे इलाज को स्वीकार किया, मगर आज मेरी पत्नी मेरे साथ नहीं हैं।

डॉक्टर हमेशा एक ही बात कहते थे, "आप तो जानते हैं कि यह बीमारी ठीक नहीं होती है, केवल शरीर की अन्य परेशानियां, खासकर दर्द, कम हो जाएगा।" यह सुनने के बावजूद, हम सिर्फ 'संभावनाओं' पर लाखों रुपये खर्च करते रहे।

🔬 इम्यूनोथेरेपी: नई उम्मीद या नया संजाल?

आज मैंने 'हिन्दुस्तान' अखबार में हिंदी विश्वकोश के पूर्व सहायक संपादक, निरंकार सिंह का एक आलेख पढ़ा, जिसमें उन्होंने इम्यूनोथेरेपी से कैंसर के इलाज की बड़ी उम्मीद जताई है।

लेख के मुख्य वैज्ञानिक बिंदु:

इम्यूनोथेरेपी में रोगी के रोग प्रतिरोधक प्रणाली (Immune System) को विकसित करने के लिए मैसेंजर RNA का उपयोग किया जाता है।

उद्देश्य है कि इम्यून सिस्टम कैंसर कोशिकाओं को पहचान कर उनका मुकाबला कर सके।

चूहों और कुछ जानवरों पर शुरुआती नतीजे उत्साहजनक रहे हैं।

मेरी सबसे बड़ी चिंता यह है कि मेरे जैसे पीड़ित परिवार इस तरह की रिपोर्टों को पढ़कर डॉक्टर और दवा कंपनियों के संजाल में न फंस जाएँ और लाखों रुपए पानी में बह जाएँ।

सवाल यह है: हिन्दुस्तान के आलेख में इम्यूनोथेरेपी को 'युगांतरकारी घटना' बताया गया है। इसके बावजूद इस रिपोर्ट में, क्या किसी पीड़ित व्यक्ति या परिवार का सफल अनुभव साझा किया गया है? नहीं तो इतनी रिपोर्ट में इतनी पॉजिटिवटी क्यों ? मेरा तो यह अनुभव है कि डॉक्टरों ने इलाज में इम्यूनोथेरेपी की सलाह दी, लेकिन किसी ने जीवन की गारंटी नहीं ली।

 

💊 लाखों का बोझ, शून्य गारंटी

दवा की पर्ची

मैंने अपनी पत्नी को डॉक्टर की देखरेख में कीट्रूडा (
Keytruda) की चार डोज़ और फिर ऑर्बिट्क्स (Erbatux) की चार डोज़ दिलवाईं, जिनकी कीमत दो लाख से अधिक प्रति डोज़ थी। जब इन महँगी दवाओं ने काम नहीं किया, तो डॉक्टर को ग्लानि हुई। उन्होंने इम्यूनोथेरेपी की डोज बंद करा दी। इसकी जगह सपोर्टिंग थेरेपी ली गई, पर लाभ नहीं मिला।

परिणाम?

कई लाख रुपए खर्च हो गए। जमीन बिक गई, जमा पूंजी खत्म हो गई।

सगे-संबंधियों के लाखों रुपए के कर्जदार बन गए। उनके एहसान तले आजीवन शुक्रगुजार रहूंगा।

मेरा स्पष्ट मानना है कि यदि डॉक्टर इम्यूनोथेरेपी का लाभ मिलने की गारंटी दे, तभी इसे कराना चाहिए।

🚨 चिकित्सा रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर सवाल


इलाज के दौरान मैंने रिपोर्टों की विश्वसनीयता पर भी संदेह देखा: मुंबई स्थित होमी भाभा कैंसर अस्पताल ने पटना स्थित महावीर कैंसर अस्पताल की बायोप्सी रिपोर्ट को बिना देखे फिर से बायोप्सी कराई, जिसकी रिपोर्ट निगेटिव आई थी। अब समझ में नहीं आ रहा है कि वहां के कर्मचारी कितने लापरवाह हैं या दूसरे की जान की कीमत से उन्हें कुछ भी लेना देना नहीं है। उन्होंने भारी लापरवाही से क्लीनिकल किया और लैब की रिपोर्ट गड़बड़ हो गई।

यह घटना बताती है कि हमें चिकित्सा रिपोर्टों के प्रति भी सचेत रहने की ज़रूरत है।

🌿 पारंपरिक चिकित्सा: एक उम्मीद की किरण

गोमूत्र क्रांति पवलगढ़ की एक तस्वीर

एलोपैथी के साथ-साथ मैंने होम्योपैथी और आयुर्वेद की ओर भी देखा, पर शुरुआती दौर में कोई लाभ नहीं मिला।

जब बीमारी तीसरे चरण में थी, तो हल्द्वानी के पास पवलगढ़ के एक वैद्य (प्रदीप भंडारी) के पास गया, जो गोमूत्र की दवा देते थे। उन्होंने ईमानदारी से कहा, "अब लेट हो गया।" उन्होंने सिर्फ 15 दिन दवा लेने को कहा।

आश्चर्यजनक रूप से, शरीर की आंतरिक स्थिति में ज़बरदस्त लाभ हुआ और उम्मीद दिखी।

हालांकि, एक जिद्दी ट्यूमर और शरीर की कमज़ोरी के कारण अंततः लाभ नहीं मिला, पर इस अनुभव ने पारंपरिक चिकित्सा की शक्ति का एहसास कराया।

📜 कैंसर का इतिहास: 3000 ईसा पूर्व से आज तक


यह बीमारी लगभग 3000 ईसा पूर्व से ज्ञात है। 400 ईसा पूर्व में ग्रीस के चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स ने इसे रक्त और पित्त के असंतुलन से जोड़ा और कारकीनों/कार्सिनोमा शब्द गढ़े, जिससे इसका नाम कैंसर पड़ा।

आयुर्वेद और ग्रीस की प्राचीन पांडुलिपियों में भी कैंसर जैसे रोगों का उल्लेख मिलता है।

निष्कर्ष: 3000 वर्षों की खोज के साथ, भारत में हजारों संस्थान और लाखों मरीज हैं, पर कोई सर्वसुलभ निदान नहीं है।

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एक अच्छी खबर: इंटीग्रेटिव ऑंकोलॉजी (एकीकृत कैंसर विज्ञान)

कल एक अच्छी खबर आई है कि आयुष मंत्रालय कैंसर के उपचार में एक नया मॉडल ला रहा है: इंटिग्रेटिव ऑंकोलॉजी।

यह आधुनिक ऑंकोलॉजी को आयुर्वेद, योग और अन्य साक्ष्य-आधारित भारतीय पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के साथ जोड़ता है।

गोवा स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान ने पहला इंटीग्रेटिव ऑंकोलॉजी अनुसंधान और देखभाल केंद्र भी शुरू किया है। यह एक सराहनीय कदम है।

भारत सरकार को जड़ी-बूटियों से इलाज कर रहे वैद्यों की पद्धति पर शोध कराना चाहिए और आयुर्वेदिक कॉलेजों को एलोपैथी के समान महत्व देना चाहिए। इंटीग्रेटिव ऑंकोलॉजी ही भविष्य की राह है, जहाँ विज्ञान और परंपरा मिलकर मानवता को इस अज्ञात दुश्मन से बचा सकें।

- तरुण कुमार कंचन

कैंसर में जज्बात नहीं समझदारी से काम लें।
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