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Friday, 21 November 2025

Bihar Politics : नीतीश सरकार का 'एक करोड़ नौकरी' का वादा – चुनौती या आर्थिक क्रांति? | Nitish government's promise of 'one crore jobs' – challenge or economic revolution?

 

शपथग्रहण समारोह  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मदी ने मुख्यमंत्री का हाथ उठाकर समर्थन जताया, तो डबल इंजन की सरकार से बिहार की जनता की उम्मीदें बढ़ गईं।

💥Tarun Kumar Kanchan

Yesterday's crowd was overwhelmingly young. They envisioned 10 million jobs and employment opportunities. Now, after this enthusiasm, there's a need to shoulder responsibility.

कल 20 नवंबर को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की 10वीं ताजपोशी में जिस तरह मंच से लेकर मैदान तक लोग भरे पड़े। भारी उत्साह का वातावरण मौजूद था। प्रधानमंत्री स्वयं बिहारी स्टाइल में गमच्छा घुमा-घुमाकर उत्साहवर्द्धन कर रहे थे। कल की भीड़ सर्वाधिक युवा थे। उन्हें एक करोड़ नौकरी और रोजगार दिख रहा था। अब इस उत्साह के बाद जिम्मेदारी निभाने का तकाजा है। देखना यह है कि नीतीश कुमार ने जिसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया है, वह टांय-टांय फिस होती है या बिहार में आर्थिक क्रांति आती है।

वादे का पैमाना: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नई सरकार के लिए 'एक करोड़ (10 मिलियन) नौकरी' का वादा केवल एक चुनावी नारा नहीं, बल्कि बिहार की वर्षों पुरानी पलायन (Migration) की समस्या को जड़ से मिटाने की आकांक्षा है। लगभग 12.8 करोड़ की आबादी और युवा शक्ति वाले इस राज्य के लिए यह वादा एक अभूतपूर्व आर्थिक लक्ष्य निर्धारित करता है।

यह रिपोर्ट इस वादे की व्यवहार्यता (Feasibility) का आकलन बिहार की वर्तमान आर्थिक संरचना और उपलब्ध आँकड़ों के आधार पर करती है।

पृष्ठभूमि: बिहार की रोजगार संबंधी वास्तविकता

| आर्थिक सूचक | स्थिति और डेटा (सरकारी/आर्थिक सर्वेक्षण) | निष्कर्ष |

| प्रति व्यक्ति आय | ₹36,333 (स्थिर मूल्य पर), जो राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-तिहाई है। | निम्न क्रय शक्ति और जीवन स्तर । |

| विनिर्माण (Manufacturing) का योगदान | सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) में केवल 15% (2021-22 अनुमान)। | संगठित क्षेत्र की नौकरियों का स्रोत बहुत सीमित है। |

| सेवा क्षेत्र का योगदान | GSDP में लगभग 59%। | अर्थव्यवस्था सेवा-आधारित है, लेकिन इसमें बड़ी संख्या में अनौपचारिक (Informal) और कम वेतन वाली सेवाएँ शामिल हैं। |

| औद्योगिक वृद्धि दर | हाल के वर्षों में यह नकारात्मक (-1.1%) रही है (2021-22 तक)। | औद्योगिक मंदी नए कारखाने और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन में सबसे बड़ी बाधा है। |

| गरीबी का स्तर | बहुआयामी गरीबी 33.76% है, जो देश में सबसे अधिक है। | रोजगार की कमी सीधे गरीबी और पिछड़ेपन से जुड़ी है। |

निष्कर्ष: बिहार की अर्थव्यवस्था अभी भी उपभोक्ता (Consumption) आधारित है, न कि उत्पादन (Production) आधारित। इतनी बड़ी संख्या में औपचारिक रोजगार सृजित करने के लिए आवश्यक मजबूत विनिर्माण आधार राज्य में गंभीर रूप से कमज़ोर है।

 चुनौती का पैमाना: एक करोड़ नौकरियों का गणित

दर्शकों में जोश भरने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने
बिहारी स्टाइल में गमछा धुमाकर गर्दा उड़ा दिया। 


1 करोड़ नौकरियां 5 साल के कार्यकाल में देने का अर्थ है प्रति वर्ष 20 लाख नौकरियां सृजित करना। यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसके लिए देश के सबसे विकसित राज्यों (जैसे महाराष्ट्र, तमिलनाडु) को भी संघर्ष करना पड़ता है।

यह लक्ष्य मुख्य रूप से तीन स्रोतों से आ सकता है:

सरकारी नौकरियाँ (Direct Jobs)

राज्य सरकार ने हाल में शिक्षक, पुलिस और अन्य विभागों में लाखों नियुक्तियाँ की हैं। यह सराहनीय है।


 * व्यवहार्यता: यदि सरकार अगले 5 वर्षों में 10 लाख (1 मिलियन) अतिरिक्त नियुक्तियाँ भी करती है, तो यह लक्ष्य का केवल 10% है। सरकारी नौकरियों की संख्या सीमित होती है और वे 1 करोड़ का लक्ष्य पूरा नहीं कर सकतीं।

 विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र (The Engine)

बड़े पैमाने पर नौकरियों का एकमात्र विश्वसनीय स्रोत विनिर्माण क्षेत्र है, क्योंकि यह एक साथ लाखों अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को अवशोषित करता है।

 * चुनौती: वर्तमान में GSDP में विनिर्माण की हिस्सेदारी केवल 15% है। 1 करोड़ नौकरियां देने के लिए इस हिस्सेदारी को तेजी से बढ़ाकर 25-30% तक ले जाना होगा। इसके लिए नीतीश सरकार के सामने चुनौतियां ज्यादा बड़ा हैं।

   * ₹75,000 करोड़ से अधिक के प्रस्तावित निवेशों को तेजी से ज़मीन पर उतारना होगा (Source 2.4)।

   * उद्योगपतियों को सस्ती बिजली, सिंगल-विंडो क्लीयरेंस और भूमि अधिग्रहण में अत्यधिक सरलता देनी होगी।

   * निवेश को कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण (लीची, मखाना), चमड़ा और आईटी जैसे श्रम-प्रधान (Labour Intensive) क्षेत्रों पर केंद्रित करना होगा।

 

स्व-रोजगार, MSMEs और सेवा क्षेत्र (The Multiplier)

अधिकांश नौकरियां (लगभग 80%) छोटे और मझोले उद्यमों (MSMEs) और स्व-रोजगार से आएंगी।

 * सफलता की कुंजी: सरकार को 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना'  जैसी योजनाओं के तहत आसान ऋण और पूंजीगत सब्सिडी को इतना बढ़ाना होगा कि लाखों उद्यमी (Entrepreneur) पैदा हों।

   * स्किलिंग (Skill Development): युवाओं को केवल भत्ता (जैसे मुख्यमंत्री स्वयं सहायता भत्ता योजना) देने के बजाय, उन्हें आईटी, प्लंबिंग, इलेक्ट्रिकल और लॉजिस्टिक्स जैसे क्षेत्रों में बाजार की मांग के अनुरूप कुशल बनाना होगा।

सफलता के लिए आवश्यक आर्थिक क्रांति

'एक करोड़ नौकरी' का वादा केवल तभी पूरा हो सकता है जब नई सरकार वित्तीय दृढ़ता और प्रशासनिक इच्छाशक्ति दिखाए:

 * वित्तीय अनुशासन: मुफ्त वादों (Freebies) पर राजकोषीय घाटे को नियंत्रण में रखते हुए (जो पहले से ही खतरनाक स्तर पर है), पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) को औद्योगिक बुनियादी ढांचे के निर्माण पर केंद्रित करना होगा।

 * कानून व्यवस्था (Rule of Law): औद्योगिक निवेश तभी आएगा जब राज्य में सख्त कानून का राज हो और निवेशकों में सुरक्षा का भाव हो।

 * पलायन का उलटफेर: सरकार को ऐसी नीतियाँ बनानी होंगी जो पलायन कर चुके कुशल कारीगरों को वापस बिहार आने और अपने गृह नगरों में छोटे उद्यम शुरू करने के लिए प्रोत्साहित करें।

निष्कर्ष और अंतिम निर्णय

'एक करोड़ नौकरी' का लक्ष्य अत्यंत महत्वाकांक्षी है, लेकिन यह असंभव नहीं है।

शपथग्रहण के बाद मुख्यमंत्री
 नीतीश कुमार को शुभकामानाएं
 देते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

इसे पूरा करने के लिए केवल सरकारी भर्तियों पर निर्भरता छोड़कर
, बिहार को अपनी सेवा-आधारित अर्थव्यवस्था को तेजी से उत्पादन-आधारित अर्थव्यवस्था में बदलना होगा। यदि सरकार अगले पाँच वर्षों में विनिर्माण क्षेत्र की हिस्सेदारी को 25% तक बढ़ाने में सफल होती है और लाखों युवाओं को उद्यमी बनने के लिए वित्तीय सहायता देती है, तो यह वादा बिहार के आर्थिक इतिहास में सबसे बड़ी क्रांति साबित हो सकता है।

यह लक्ष्य हासिल करना 'आर्थिक चुनौती' नहीं, बल्कि 'आर्थिक युद्ध' जीतने जैसा है।

यह भी पढ़ें - चुनौतियों का पहाड़ और कांटों भरा ताज

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