"बिहार में गॉल ब्लैडर कैंसर के बढ़ते मामलों से जुड़ी 'कैंसर कथा'! होमी भाभा कैंसर अस्पताल, मुजफ्फरपुर की रिपोर्ट बताती है कि 85% मरीजों की 1 साल में मौत हो जाती है। पीलिया और पेचिस के एक साथ दिखने पर तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें।"
Tarun kumar kanchan
Gallbladder cancer is emerging as a "silent killer" in Bihar. People often ignore symptoms like abdominal pain, jaundice, and dysentery, thinking they are simple infections. But according to medical experts, if these symptoms appear together then it could be a sign of gall bladder cancer.
बिहार में गॉल
ब्लैडर (पित्ताशय) का कैंसर एक "साइलेंट किलर" की तरह उभर रहा है। अक्सर
लोग पेट दर्द, पीलिया (Jaundice) और पेचिस (Dysentery) जैसे लक्षणों को साधारण संक्रमण मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, यदि ये लक्षण एक साथ दिखें तो यह गॉल ब्लैडर कैंसर का संकेत
हो सकता है। समय पर पहचान न होना ही इस बीमारी में मौत का सबसे बड़ा कारण बन रहा
है।
होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र के प्रभारी डॉ. रविकांत सिंह ने इस पर चिंता जताते हुए कहा:
"गॉल
ब्लैडर कैंसर के शुरुआती लक्षण बहुत सामान्य होते हैं जैसे पेट दर्द, अपच और पीलिया। लोग इन्हें गंभीरता से
नहीं लेते और जब तक अस्पताल पहुंचते हैं, तब तक कैंसर फैल चुका होता है। महिलाओं में हार्मोनल बदलाव,
पित्ताशय की पथरी और हमारी भौगोलिक
परिस्थितियां (गंगा-गंडक बेसिन) इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं।"
डरावनी रिपोर्ट: 85% मरीजों की एक साल
में मौत
बिहार में गॉल ब्लैडर (पित्ताशय) कैंसर
एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बनकर उभरा है। होमी भाभा कैंसर अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर द्वारा किए गए एक हालिया शोध ने
स्वास्थ्य महकमे में हलचल मचा दी है। इस रिपोर्ट के अनुसार, समय पर इलाज न मिलने और लक्षणों को
पहचानने में देरी के कारण मरीजों की मृत्यु दर चिंताजनक रूप से अधिक है। होमी भाभा कैंसर
अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर
द्वारा जारी 'पापुलेशन बेस्ड कैंसर
रजिस्ट्री' (PBCR) की
रिपोर्ट ने सबको चौंका दिया है। 2018 से 2021 के
बीच किए गए अध्ययन में पाया गया कि गॉल ब्लैडर कैंसर के 40
मरीजों में से 85%
की मौत इलाज के पहले
ही साल में हो गई। बाकी बचे मरीज भी तीन साल से ज्यादा
जीवित नहीं रह सके। यह शोध प्रतिष्ठित
'ई-कैंसर जर्नल' में प्रकाशित हुआ है और इसे आगे के
परीक्षण के लिए ICMR (इंडियन
काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) को भेजा गया है।
पीलिया और पेचिस : खतरे का पहला संकेत
अक्सर
लोग पीलिया (Jaundice) और
पेचिस (Dysentery) को
साधारण संक्रमण मान लेते हैं। लेकिन इस रिपोर्ट का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह है कि यदि पीलिया और पेचिस एक साथ हों, तो यह सीधे तौर पर गॉल ब्लैडर कैंसर का
संकेत हो सकता है।
महिलाओं में तेजी से फैल रहा गॉल ब्लैडर कैंसर
- अध्ययन के लिए मुजफ्फरपुर के शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ मुरौल, सकरा,
कांटी, मोतीपुर और मुसहरी जैसे ग्रामीण इलाकों को चुना गया।
- सर्वाधिक प्रभावित: महिलाओं में स्तन कैंसर के बाद गॉल
ब्लैडर कैंसर सबसे तेजी से फैल रहा है।
· मरीजों का आंकड़ा: 2021-22 में अस्पताल में 207 मामले सामने आए, जिनमें 75.4% महिलाएं थीं।
- आयु वर्ग: प्रभावित पुरुषों की औसत आयु 54 वर्ष और महिलाओं की 52 वर्ष देखी गई है।
· क्षेत्रवार प्रभाव: मुजफ्फरपुर के अलावा
पूर्वी चंपारण और सीतामढ़ी के मरीज भी भारी संख्या में इस अस्पताल पहुंच रहे हैं।
बिहार की भौगोलिक स्थिति और 'गंगा-गंडक' का प्रभाव
· बिहार के संदर्भ में यह शोध और भी
महत्वपूर्ण हो जाता है। टाटा मेमोरियल सेंटर मुंबई के सहयोग से हुए इस शोध में
बताया गया है कि गंगा और गंडक बेसिन की भौगोलिक परिस्थितियां और वहां के पानी में
मौजूद तत्व इस कैंसर के प्रसार में भूमिका निभा रहे हैं। पटना स्थित महावीर कैंसर संस्थान की
रिपोर्ट्स भी पुष्टि करती हैं कि बिहार के पानी में भारी धातुओं की मौजूदगी
पित्ताशय के कैंसर का एक बड़ा कारण हो सकती है।
रिपोर्ट की चेतावनी
पटना स्थित महावीर कैंसर संस्थान की रिपोर्ट भी मुजफ्फरपुर के आंकड़ों की पुष्टि करती है।
संस्थान के विशेषज्ञों के अनुसार, बिहार और उत्तर
प्रदेश के इस 'बेल्ट' में गॉल ब्लैडर कैंसर के मामले दुनिया में सबसे अधिक पाए जाते हैं।
"पित्ताशय की पथरी (Stone) को नजरअंदाज करना सबसे बड़ी भूल है। यदि मरीज को पीलिया के
साथ बार-बार पेचिस या पेट खराब होने की शिकायत हो रही है, तो इसे तत्काल गंभीरता से लेना चाहिए।"
लक्षण जिन्हें न
करें नजरअंदाज:
- पीलिया और पेचिस का मेल: यदि पीलिया के साथ लगातार पेट खराब
रहे या पेचिस हो।
- लगातार पेट दर्द: दाहिने हिस्से के ऊपरी भाग में दर्द
रहना।
- अचानक वजन कम होना: बिना किसी कारण के वजन गिरना और भूख
न लगना।
- पित्ताशय की पथरी: लंबे समय से स्टोन का होना कैंसर का
रिस्क बढ़ाता है।
क्यों हो रही हैं इतनी मौतें?
शोध के अनुसार, 46.9% मरीजों में कैंसर तब पता चला जब वह शरीर के अन्य अंगों में फैल चुका था
(मेटास्टेसिस)। चिंता की बात यह है कि करीब 77% मरीज इलाज शुरू करने के बाद फॉलो-अप (दोबारा जांच) के लिए
अस्पताल ही नहीं लौटे।
रोकथाम और सरकारी
पहल
1. स्क्रीनिंग: बिहार सरकार के सहयोग से अब मॉडल
अस्पतालों से लेकर PHC स्तर
तक कैंसर स्क्रीनिंग अभियान चलाया जा रहा है।
2.
जागरूकता: यदि पित्ताशय में पथरी (Stone) है, तो उसे हल्के में न लें। समय पर सर्जरी
कैंसर के खतरे को टाल सकती है।
3.
त्वरित जांच: पीलिया के साथ पेट में लगातार भारीपन
महसूस होने पर तत्काल विशेषज्ञ डॉक्टर से संपर्क करें।
याद रखें:
गॉल ब्लैडर कैंसर ला-इलाज नहीं है,
लेकिन इसकी पहचान का 'गोल्डन पीरियड' शुरुआती लक्षण ही हैं। डॉ. रविकांत सिंह
के अनुसार, समय पर जांच और
जागरूकता ही बिहार में इस मौत के आंकड़े को कम कर सकती है। उन्होंने कहा कि यदि
लक्षण दिखें, तो झोलाछाप डॉक्टरों
के चक्कर में पड़ने के बजाय तत्काल कैंसर विशेषज्ञ से संपर्क करें।
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