google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: एक गांव की करुण पुकार | A village's cry of sorrow

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Friday, 10 October 2025

एक गांव की करुण पुकार | A village's cry of sorrow

करुण पुकार
एक गांव जो कभी उत्साह और उमंग से लबरेज रहता था, आज उदास और निराश है। वह गांव कोई और नहीं, बल्कि हमारा गांव सबलबीघा है, जो बिहार के जमुई जिला में अवस्थित  है।
                  सबलबीघा का बाहरी भाग

 चकाचक सड़क
गांव में प्रवेश से पहले आपको मैं अपने गांव की मुख्य सड़क के बारे में बताता हूं। सड़क पुरानी है, जिस पर नई गिट्टी और अलकतरा डाला गया है। सड़क चकाचक दिख रही है। यह सड़क सबल बीघा को एक तरफ जिला मुख्यालय जमुई से जोड़ती है, जबकि दूसरी तरफ 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर का जन्मस्थल लछुआड़ है। यह सड़क गांव से दक्षिण दिशा में है। गांव से पश्चिम दिशा में बहुआरा नदी बहती है। नदी बहुत छोटी है, मगर खासियत यह है कि इस नदी में सालोभर पानी बहता रहता है। इस नदी पर लोगों की ऐसी कुदृष्टि पड़ी या यह कहें कि विकास की काली छाया से आच्छादित है। कई छोटे छोटे बांध बनाए गए हैं और बालू को कंक्रीट के जंगल बनाने में लगाए जाने लगे। स्वभावतः नदी सकरी होती चली जा रही है। उस पर नदी के किनारे घर बनाए जा रहे हैं।  इसे ही कहते हैं एक तो करेला दूजे नीम चढ़ाय।
गांव का प्रवेशद्वार
यह सड़क गांव का बाहरी इलाका है। यहीं से  हम गांव में प्रवेश करते हैं। इस जगह का नाम है धरहरिया। यही गांव का बस स्टैंड है। सामने सड़क पर एक स्वागत द्वार बना है। यह सच है कि गांव के नाम से बड़ा मुखिया जी ने अपना नाम लिख रखा है । जैसा देख रहे हैं कि मुखिया जी का नाम है, अंजनी कुमार मिश्रा। वह एक समझदार युवक हैं । उनके नेतृत्व में गांव प्रगति के पथ अग्रसर है। आशा करता हूं और बेहतर काम करेंगे। हालांकि इस बार मैंने उन्हें अपना मत नहीं दिया था क्योंकि मेरा इमोशन कहीं और जुड़ा था जबकि मेरी शुभकामनाएं उनके साथ थी।

गांव की सीमा पर इंटरमीडिएट स्कूल
अब गांव की ओर चलते हैं। गांव की सीमा पर ही इंटरमीडिएट स्कूल है। नई बिल्डिंग बनी है। कंस्ट्रक्शन शानदार दिख रहा है। पढ़ाई के बारे बहुत कुछ नहीं कह सकता हूं,  लेकिन सच है कि इस गांव में प्राइवेट स्कूल भी कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं।
 यह गांव सामाजिक रूप से बहुत ही समृद्ध है। 
14 जातियों के लोग मिलजुल कर रहते हैं इस गांव में
इस गांव में हिंदू - मुस्लिम की 14 जातियों के लोग मिलजुल कर रहते हैं।  कभी इस गांव को आदर्श गांव घोषित किया गया था, मगर हो न सका। खैर अब इस गांव में वह सभी सुविधाएं हैं, जिसका हकदार यह बहुत पहले से था। गांव में बिजली, पानी और अच्छी सड़क की सुविधा है, मगर सेहत सुविधा में बहुत पीछे है। अभी भी आरएमपी के भरोसे सबलबीघा गांव के बाशिंदे हैं।  

खेल का एक मैदान नहीं है
                                  सबलबीघा का शिव मंदिर 
                                                सबलबीघा मस्जिद 

गांव में मंदिर हैं तो मस्जिद भी है। कालीमण्डा है तो इमामबाड़ा भी है।  यहां कर्बला भी है। शमशान है कब्रिस्तान है, मगर दुखद है कि बच्चों के लिए एक खेल का मैदान नहीं है। हमसे पहले की पीढ़ी के पास खेल का मैदान था, लेकिन उस मैदान पर ऐसे दुष्ट दबंगों की नजर पड़ी कि उस पर कब्जा कर बेच दिया गया। हालांकि उस वक्त के युवा इसका विरोध किया था। भले ही वह पीढ़ी अब वृद्ध हो चली है, मगर यह कहानी दुख के साथ वीरतापूर्ण सुनाते हैं।  
             ढ़ीबर पर सबलबीघा में भूतों की झोपड़ियां
हमारी पीढ़ी ढ़ीबर को खेल का मैदान बना लिया था। उसी मैदान पर हम फुटबॉल खेलते थे और क्रिकेट भी। बाद में वह पूरी तरह कब्रिस्तान हो गया। बच्चों से वहां खेलने का अधिकार भी छीन लिया गया। अब इस जगह न केवल सुपुर्देखाक किया जाता है, बल्कि भूत भी भरने लगे हैं। यहां झोपड़ियों की बस्ती बस गई है। इसमें भूत पूरे परिवार के साथ रहता है और आपको बताऊं कि अंधविश्वास ऐसा भरा पड़ा है कि इन झोपड़ियों में केवल सबलबीघा के ही भूत नहीं रहते हैं, बल्कि आसपास के कई जिलों के भूत यहां बसे हैं। उन्हें लगता है कि उन पर जो काली छाया है या उनकी जो बीमारियां हैं , यहां रहने से खत्म हो जाएगा।  हालांकि यह जांच का विषय है कि यहां होता क्या है? और ये लोग आते कहां से हैं? कितने लोगों के सिर से काली छाया की आफत दूर हुई है?
                               ढ़ीबर पर काला जादू से अभिशप्त महिला

                              कंक्रीट की हो गईं गालियां, रात में रोशनी 
आइए, अब जानते हैं गांव की आंतरिक स्थिति के बारे में। गांव की गलियां कंक्रीट की हो गई हैं। फर्राटे से इस पर गाड़ियां दौड़ती हैं। अब गली की कीच कीच खत्म हो गई। रात में गालियां उजाले में चमचमाती रहती हैं,  मगर घुप अंधेरे में भी लगनेवाले चौपाल खत्म हो गए हैं। अब डॉक्टर साहेब श्री गणेश दत्त दुबे जी की अब कोई राजनीतिक विवेचना नहीं होती और न ही डॉक्टर श्री छेदी दुबे जी का कोई राजनीतिक पूर्वानुमान होता है। भूखन के बारे में बातें बंद हो गईं। अरुण वाजपेई की चुहलबाज़ी खत्म हो गई। ठहाकों की गूंज सुनाई नहीं देती। मालिक जी श्री हरिहर दुबे जी की कुर्सी का जमघट खत्म हो गया। कानी कुत्तिया किसके घर से रोटी चुराई अब इसकी जानकारी नहीं मिलती। पहले किसके घर में सब्जी में क्या बनी है, शाम तक  सबको जानकारी हो जाती थी। जब मैं 9वीं - 10वीं में पढ़ाई कर रहा था, तब गांव में प्रतिदिन शाम के वक्त कालीमंडा के प्रांगण में भजन - कीर्तन का आयोजन होता था। उसमें श्री फणींद्र मिश्र, श्री नित्यानंद दुबे, श्री शिवकुमार दुबे, श्री विष्णुकांत बाजपेई और श्री उम्दानंद दुबे की महती भूमिका रहती थी। श्री उम्दानंद दुबे जी के ढोलक की आवाज जब गूंजती थी तो गांव की गलियां भी झूमने लगती थी।
                                       सबलबीघा का कालीमंडा 
कृष्ण जन्माष्टमी और गणेश पूजनोत्सव मनाने के लिए कोई खींचतान नहीं है। खेल का मैदान नहीं है तो किशोर क्लब का भी कोई टशन नहीं है।

                                      गांव छोड़ रहे खेतिहर जमीन के मालिक
भादो का महीना है। इस मौसम में हर घर से शाम में पट पट की  आवाज निकलती थी। हर घर में मकई भुट्टा पकाए जाते थे। कभी कभी रात का खाना यही हो जाता था, मगर इस बार ऐसा दिखाई नहीं दिया।  पूछताछ में जानकारी मिली कि अब लोग भिट्ठा (उपजाऊ जमीन) में कोई मकई नहीं लगाता है। कोला - खिड़की (किचेन गार्डन) में भी इस बार मकई नहीं दिखी। हालांकि इस बार धान  की खेती एक बार मुस्कुराने का अवसर दे रहा है। इसका एक बड़ा कारण यह रहा कि खेतिहर जमीन के मालिक गांव छोड़ रहे हैं। रोजी रोजगार के खातिर या बच्चों की पढ़ाई- लिखाई के खातिर। कुछ भी हो, मगर लोग गांव छोड़ रहे हैं। बंटाई के भरोसे गांव की खेती बची है। खेतों में अब हल नहीं चलते हैं। ट्रैक्टर से खेतों की जुताई होती है। बैल बेकार हो गए हैं। इसलिए लोग उसे खुला छोड़ देते हैं। ये अनुपयोगी पशु फसलों को बर्बाद कर देते हैं। पानी की कमी है। इस क्षेत्र में सिंचाई के लिए कोई नहर नहीं है। भूजल स्तर गिर जाने के कारण कुएं में भी पानी है।  गांव के चारों तरफ यहां के किसानों ने 10 या 20 फुटिया कुआं खुदवा रखा था। अब वे बेकार हो गए हैं। कुओं की दीवारें गिर गई हैं। ऐसे पूर्वजों ने गांव में खेती के लिए आहर (तालाब) का जाल बिछा रखा था। अब वे आहर भी बेकार हो गए हैं। उसमें पानी संग्रहण की व्यवस्था नहीं है।  

लोग समझते की कोई जमीन बेचने आए हैं 
इस बार मुझे यह बात अजीब लग रही थी  कि कोई दूबेजी गांव आए हैं, तो जरूर ही कोई जमीन ही बेचेंगे। ऐसा मान लेते हैं?  कई लोगों ने इस बारे में मुझसे भी पूछ लिया।

अब भी है बुढ़वा कुआं
                                  सबलबीघा का बुढ़वा कुआं 
अब बात करते है गांव के सबसे पुराने कुएं की। यह है हमारे गांव का सबसे पुराना कुआं। इसे बुढ़वा कुआं के नाम से लोग जानते हैं। यह कुआं कम से कम 7-8 पीढ़ियों  को देखा है। यह कुआं कभी पीने के पानी का एकमात्र साधन था। हिंदू मुस्लिम सभी यहीं से पानी ले  जाते थे। बताते हैं कि इस कुएं की निर्माता वर्तमान मुखिया अंजनी मिश्र के पिता राजेंद्र मिश्र की नानी श्रीमती इंद्रा देवी जी थीं। अब यह कुआं सिर्फ पूजा पाठ के लिए रह गया है। उसे संरक्षित किया जा रहा है। अभी हर घर में पानी की निजी व्यवस्था है साथ में सरकारी नल कल है।

                                आधी बस्ती हो गई खाली
                                   गांव में गिरता हुआ मेरा घर
गांव में ब्राह्मणों का दबदबा था। खेती-बाड़ी के साथ नौकरी- पेशा से भी ब्राह्मण जुड़े थे । सनातनी आस्थावान थे, मगर किसी मंदिर में पुजारी या कर्मकांड नहीं करते थे। अब भी नहीं करते हैं। समाज में हो रहे बदलाव का असर ब्राह्मणों पर खूब पड़ा। आधी बस्ती खाली हो गई। लोग नौकरी पेशा के लिए घर छोड़कर बाहर चले गए । मोहल्ला का मोहल्ला खाली हो गया।  दरवाजे पर ताले लटक गए। अब वही ताला हमें घर में घुसने तक नहीं दे रहा है क्योंकि गांव की आँखें थक चुकी हैं, बूढी हो चुकी हैं। अब वह बाहर से आए लोगों को पहचान भी नहीं कर पा रही है । कई घर गिर चुके हैं हालांकि कुछ अच्छे घर भी बने हैं फिर भी अब गांव निराश है, उदास है। गांव की गलियां अब भी बाहर गए बेटों को तलाश रही है। करुण पुकार कर रही है। आइए गांव, उन्हें बचाइए।
 धन्यवाद।
🔥 तरुण कुमार कंचन 

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