💥Tarun Kumar Kanchanचुनौतियों का पहाड़ और काँटों भरा ताज
A mountain of challenges and a crown of thorns
आज 20 नवंबर को थोड़ी
देर में नीतीश कुमार ऐतिहासिक गांधी मैदान में 10वी बार मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे।
इस समारोह में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के अलावा देश के कई मुख्यमंत्री और बड़े
नेता शामिल हो रहे हैं। उम्मीद की जा रही है कि बिहार की तीन लाख जनता भी इस मौके
पर साक्षी होंगे। नीतीश कुमार का 10वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में
शपथ लेना सिर्फ एक राजनीतिक घटना नहीं है, यह उनके लिए अग्निपरीक्षा है। यह शपथ
ग्रहण समारोह एक ऐसे 'काँटों भरे ताज' की ओर इशारा करता है, जिसके नीचे
चुनौतियों का पहाड़ इंतज़ार कर रहा है।
74 वर्षीय मुख्यमंत्री को अब केवल शासन नहीं करना है, बल्कि खाली खजाने, ₹3.5 लाख करोड़ से अधिक के रिकॉर्ड कर्ज, और 'एक करोड़ नौकरी' जैसे विशाल चुनावी वादों के बीच संतुलन साधना है। विपक्ष द्वारा उनकी नेतृत्व क्षमता पर उठाए जा रहे सवालों का जवाब उन्हें अपने काम से देना होगा। वित्तीय संकट से जूझते, सबसे कम GSDP वाले और सर्वाधिक गरीबी वाले बिहार में, क्या नीतीश कुमार जनता के भरोसे को अटूट विश्वास में बदलकर अपने आलोचकों को चुप करा पाएंगे?
🎯 जनता का भरोसा और घोषणा पत्र के वादे
नई सरकार के सामने सबसे पहली और सबसे बड़ी चुनौती है जनता के भरोसे को विश्वास
में बदलना है। NDA गठबंधन पर बिहार की जनता ने जो भरोसा जताया है, उसे ठोस नीतियों और त्वरित क्रियान्वयन
के माध्यम से सिद्ध करना होगा।
रोजगार और 'एक करोड़ नौकरी' का वादा
चुनावी घोषणा पत्र में किया गया 'एक करोड़ लोगों को नौकरी' देने का वादा
सरकार की प्राथमिकता में शीर्ष पर है। यह वादा न केवल आर्थिक, बल्कि सामाजिक
स्थिरता के लिए भी महत्वपूर्ण है।
चुनौती: वर्तमान में, बिहार में संगठित और असंगठित क्षेत्रों में नौकरियों की
संख्या सीमित है। सरकारी अनुमानों के अनुसार भी, बड़े पैमाने पर नई नौकरियों का सृजन करना
एक दुष्कर कार्य है।
उदाहरण: एक करोड़ नौकरियों के लिए अगले पाँच वर्षों में प्रति वर्ष 20 लाख नई नौकरियों
का सृजन करना होगा, जिसके लिए उद्योगों में भारी निवेश, आधारभूत संरचना का
विकास और कौशल विकास कार्यक्रमों की बड़े पैमाने पर आवश्यकता होगी। केवल सरकारी
नौकरियों के बूते यह लक्ष्य हासिल करना असंभव है।
💰 वित्तीय मोर्चे पर बड़ी मुश्किलें: कर्ज
और देनदारियाँ
बिहार की नई सरकार को एक खाली खजाने और रिकॉर्ड स्तर के कर्ज के साथ शुरुआत
करनी पड़ रही है। वित्तीय मोर्चे पर कुशल प्रबंधन एक बड़ी परीक्षा होगी।
बिहार सरकार पर रिकॉर्ड कर्ज
विभिन्न रिपोर्ट्स के अनुसार, बिहार पर कुल कर्ज रिकॉर्ड स्तर तक पहुँच चुका है, जो राज्य के सकल
घरेलू उत्पाद (GSDP) का लगभग 37% है।
कर्ज का बोझ: बिहार सरकार पर कर्ज की राशि लगभग ₹3.5 लाख करोड़ से
अधिक हो गई है (विभिन्न संस्थानों और बाज़ार से लिया गया कर्ज)। एक सूचना के
मुताबिक हर बिहारी पर 27 लाख का कर्ज है।
कर्ज का वहन: इस विशाल कर्ज पर ब्याज का भुगतान और मूलधन चुकाने के लिए एक
कुशल वित्तीय प्रबंधन योजना की तुरंत आवश्यकता है। ब्याज भुगतान पर होने वाला खर्च
विकास कार्यों के लिए उपलब्ध राशि को कम कर देता है।
चुनावी वादे—जैसे मुफ्त बिजली, महिलाओं को आर्थिक सहायता आदि—को पूरा
करने के लिए बड़े वित्तीय आवंटन की आवश्यकता होगी।
वित्तीय संकट: रिकॉर्ड कर्ज के बीच, सरकार के खजाने में बची हुई राशि बहुत कम
है, जो इन देनदारियों
को पूरा करने की राह में एक कठिन आर्थिक चुनौती है।
GSDP (प्रति व्यक्ति)
बिहार की स्थिति: यह सबसे निचले राज्यों में से एक है।
राष्ट्रीय औसत का लगभग एक-तिहाई है। इसका मतलब यदि राष्ट्रीय औसत प्रति व्यक्ति
आय ₹100 है, तो बिहार की प्रति
व्यक्ति आय केवल लगभग ₹33 ही है। यह बिहार में निम्न आर्थिक उत्पादकता और आय को
दर्शाता है।
गरीबी दर
बिहार की स्थिति: यह सर्वाधिक है (लगभग 33.7%) जबकि राष्ट्रीय औसत लगभग 21.9% है। इसका मतलब
बिहार की लगभग एक-तिहाई आबादी (33.7%) गरीब है, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह संख्या लगभग पाँच में से एक (21.9%) है। यह उच्च
निर्धनता को इंगित करता है। एलएलएम
मानव विकास सूचकांक (Human
Development Index - HDI)
बिहार की स्थिति: यह निचले पायदान पर है।
इसका मतलब, स्वास्थ्य, शिक्षा और जीवन स्तर (मानव विकास के मुख्य मापदंड) के मामले
में बिहार अन्य राज्यों और राष्ट्रीय औसत से बहुत पीछे है। यह मानव संसाधन विकास
में महत्वपूर्ण अंतराल को दर्शाता है।
यह डेटा दर्शाता है कि बिहार आर्थिक
उत्पादन, गरीबी उन्मूलन और
मानव विकास के मानकों पर भारत के सबसे पिछड़े राज्यों में से एक है। बिहार के
लोगों का जीवन स्तर (Life Standard) अन्य प्रमुख राज्यों की तुलना में काफी
नीचे है। GSDP कम होने के कारण विकास कार्यों और सामाजिक सुरक्षा पर खर्च करने की क्षमता
सीमित हो जाती है। नई सरकार को समावेशी विकास दर बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करना
होगा।
🏥 स्वास्थ्य और कानून व्यवस्था पर तत्काल
ध्यान
स्वास्थ्य सुविधा की स्थिति
बिहार में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति (Healthy facilities) चिंताजनक बनी हुई
है।
चुनौतियाँ: डॉक्टर-जनसंख्या अनुपात राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। ग्रामीण
क्षेत्रों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) और जिला अस्पतालों में सुविधाओं और
उपकरणों की भारी कमी है। महामारी की स्थिति में यह कमी और भी उजागर हो जाती है।
अपराध पर काबू पाना और 'जंगल राज' की धारणा
कानून व्यवस्था को मजबूत करना और अपराध दर को नियंत्रित करना एक महत्वपूर्ण
चुनौती है। इसलिए 'जंगल राज' की धारणा को खत्म करने के लिए सख्त उपाय आवश्यक हैं।
उदाहरण: विधानसभा चुनाव में बाहुबली कहे जाने वाले अनंत सिंह और ओसामा जैसे
लोगों का विधानसभा में पहुँचना, और हाल ही में दुलारचंद यादव की हत्या के बाद फैली सनसनी, यह दर्शाती है कि
कानून व्यवस्था को लेकर अभी भी जनता में चिंता का माहौल है। सरकार को पुलिस तंत्र
में सुधार और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना होगा।
🤝 सामाजिक चुनौतियाँ: जाति और आर्थिक
विषमता
जाति/समुदाय की बढ़ती खाई
जातिगत समीकरणों को साधते हुए विभिन्न जातियों और समुदायों के बीच बढ़ती खाई
को पाटना और सांप्रदायिक सौहार्द्र कायम रखना महत्वपूर्ण है।
जाति विद्वेष और सामुदायिक विवाद: हाल-फिलहाल में बिहार में जाति विद्वेष और
सामुदायिक विवाद के कई छोटे-बड़े मामले रिपोर्ट किए गए हैं, जो सामाजिक एकता
के लिए खतरा हैं।
उदाहरण: सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर जातिगत तनाव के मामले, जैसे कि भूमि
विवाद से जुड़े अंतर-जातीय संघर्ष, अक्सर सामने आते रहे हैं। नई सरकार को
सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की नीति पर काम करना होगा।
आर्थिक विषमता और गरीबी रेखा
क्षेत्रीय असमानताएँ और गरीबी एक बड़ा मुद्दा है।
गरीबी रेखा के नीचे: बिहार में 33.7% लोग अभी भी गरीबी रेखा (BPL) के नीचे गुजर बसर
कर रहे हैं, जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के शासनकाल में, सरकार ने कई
कल्याणकारी योजनाएँ चलाई हैं, जिससे गरीबों को कुछ लाभ मिला है, लेकिन गरीबी का
प्रतिशत अभी भी बहुत अधिक बना हुआ है। सरकार को आर्थिक विकास के लाभों को समाज के
सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचाना होगा ताकि गरीबी का यह प्रतिशत तेजी से कम हो
सके।
नीतीश कुमार की 10वीं बार की यह पारी आसान नहीं है। यह 'काँटों से भरा ताज' है। उन्हें न केवल
अपने विरोधियों को अपनी कार्यक्षमता से चुप कराना होगा, बल्कि खाली खजाने, भारी कर्ज, और जनता की
उम्मीदों के बीच संतुलन भी बनाना होगा। इन चुनौतियों का सामना करने के लिए नई सरकार
को पहले 100 दिनों में ही ठोस
आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों की शुरुआत करनी होगी।
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जिम्मेदारी के साथ चलती है चुनौतियां
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