The first phase of the Bihar Assembly elections, scheduled for November 6,
has reached its peak of drama, populism and political rhetoric in the final
phase of campaigning.
केंद्रीय नेतृत्व का मेगा शो: मोदी और शाह की
आक्रामकता
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में चुनावी अभियान को धार दी। पटना में उनका भव्य रोड शो केंद्र में रहा। यह रोड शो न केवल शक्ति प्रदर्शन था, बल्कि यह संदेश देने की कोशिश थी कि भाजपा और एनडीए गठबंधन राज्य की सत्ता में वापसी के लिए प्रतिबद्ध हैं। रोड शो में उमड़ी भीड़ ने यह दर्शाया कि मोदी का करिश्मा अभी भी बरकरार है। उनकी रैलियों में विकास, परिवारवाद पर हमला, और जंगलराज की वापसी के डर जैसे मुद्दे हावी रहे।
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| रविवार को देर शाम पटना में रोड शो के दौरान सड़क पर भव्य स्वागत और लोक लुभावन सड़क की सजावट |
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| पटना में रोड शो के दौरान उत्साहित लोग, जो यह बता रहा है कि मोदी का जादू अब भी जनता के सिर पर चढ़ा हुआ है। इस उत्साह को देखकर पटना के सारे एनडीए उम्मीदवार मुस्कुरा रहे हैं। |
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| बिहार के वैशाली में सभा को संबोधित करते केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह |
राहुल गांधी का 'मछली मारो' अभियान: लोक-संपर्क की नई शैली
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने चुनाव प्रचार में एक बिल्कुल ही अलग और अप्रत्याशित शैली अपनाई। उनका एक स्थानीय तालाब में कूदकर मछली पकड़ना या 'मछली मारना' एक ऐसा वीडियो बना, जिसने सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोरीं। यह कृत्य, चाहे सहज हो या नियोजित, आम आदमी से जुड़ने और अपनी छवि को "सूट-बूट की सरकार" के विपरीत स्थापित करने का प्रयास था। राहुल गांधी की रैलियों का मुख्य फोकस बेरोजगारी, महंगाई और किसानों की समस्याओं पर रहा। उन्होंने केंद्र और राज्य की एनडीए सरकारों को इन्हीं मुद्दों पर घेरा। उनकी 'मछली मारो' वाली छवि ने युवाओं और ग्रामीण मतदाताओं के बीच एक सकारात्मक जुड़ाव बनाने की कोशिश की, जो कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक से बाहर के हैं।
तालाब में उन्होंने नौकायन का आनंद लिया। मछलियां पकड़ीं और तैराकी करते भी नजर आए। उनका यह आम जनता वाला रूप देखकर मौके पर मौजूद ग्रामीण और युवा उत्साहित रहे।
तेजप्रताप यादव का 'महाभारत': पौराणिक संदर्भों में सियासी जंग
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| राजद के सुप्रीमो लालू प्रसाद के बड़े पुत्र तेजप्रताप यादव अपने प्रत्याशी के समर्थन में सभा को संबोधित करते। इस दौरान उन्होंने जनता से श्रीकृष्ण के संदर्भों का उल्लेख किया। |
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता और लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव हमेशा की तरह अपने अनोखे अंदाज़ में नज़र आए। उन्होंने अपने भाषणों में अक्सर चुनावी लड़ाई को 'महाभारत' का रूप दिया। उनके पौराणिक कथाओं और पात्रों के संदर्भ, विशेषकर खुद को अर्जुन या अन्य शक्तिशाली पात्रों के रूप में पेश करना, उनके समर्थकों के बीच चर्चा का विषय बना रहा।
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| एक फैशन शो के दौरान तेजप्रताप यादव |
तेजप्रताप का यह आध्यात्मिक-सह-राजनीतिक ड्रामा आरजेडी के युवा समर्थकों को भावनात्मक रूप से जोड़ने और उन्हें उत्साहित करने का एक तरीका था। हालांकि, उनके बयान अक्सर विवादों में भी रहे, जिसने पार्टी के लिए मीडिया कवरेज तो सुनिश्चित की, लेकिन चुनावी गंभीरता पर भी सवाल खड़े किए।
तेजस्वी यादव का 'शपथ ग्रहण' ऐलान: अति-आत्मविश्वास या चुनावी चाल?
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| लालू प्रसाद के छोटे बेटे तेजस्वी यादव, जिन्होंने गत लोकसभा चुनाव के दौरान नवरात्रि पर हिन्दू वोटरों को मछली खाकर दिखाया था। |
महागठबंधन का नेतृत्व कर रहे तेजस्वी यादव ने प्रचार को एक नया आयाम दिया। उन्होंने न सिर्फ अपने पक्ष में मतदान की अपील की, बल्कि खुलकर मुख्यमंत्री पद के शपथ ग्रहण की तिथि घोषित करके एक अति-आत्मविश्वास का प्रदर्शन किया। यह घोषणा एक चुनावी चाल के तौर पर देखी जा रही है, जिसका उद्देश्य महागठबंधन के पक्ष में सकारात्मक माहौल बनाना और उनके समर्थकों में उत्साह भरना है।
तेजस्वी का प्रचार अभियान मुख्यतः 'नौकरी, नौकरी, नौकरी' के इर्द-गिर्द केंद्रित रहा। उन्होंने बिहार के युवाओं को सरकारी नौकरियों का वादा करके एक बड़ा दांव खेला। उनकी रैलियों में उमड़ रही भीड़ ने महागठबंधन को एक मजबूत चुनौती के रूप में स्थापित किया है। उनके बयानों ने युवाओं और दलित-पिछड़े वर्ग को मुख्य रूप से आकर्षित किया है।
कुल मिलाकर: मुद्दों से ज़्यादा 'तमाशा'
पहले चरण का चुनाव प्रचार इस बात का गवाह है कि जनता के वास्तविक मुद्दों (बेरोजगारी, पलायन, स्वास्थ्य, शिक्षा) के साथ-साथ नेताओं के निजी अंदाज़ और नाटकीयता ने भी एक बड़ी भूमिका निभाई है। एनडीए ने विकास, स्थिरता और राष्ट्रीय गौरव को अपनी पिच बनाया। महागठबंधन ने बदलाव, नौकरी और सामाजिक न्याय को अपना हथियार बनाया। लेकिन, रोड शो की चमक, तालाब में मछली पकड़ने का ड्रामा, महाभारत की कथाएँ और शपथ ग्रहण की तारीख़ों का ऐलान - इन सबने मिलकर इस चुनाव प्रचार को एक ऐसा 'तमाशा' बना दिया है, जिसमें दर्शक (मतदाता) अपनी-अपनी पसंद के नेता को देखने आए हैं, और अब निर्णायक घड़ी नज़दीक है।
6 नवंबर को तमाशे का परिणाम ईवीएम में कैद होगा
यह चुनाव प्रचार एक हाई-वोल्टेज ड्रामा था, जिसने बिहार की राजनीति को एक बार फिर देश के केंद्र में ला खड़ा किया है। अब 6 नवंबर को मतदाता इस 'तमाशे' का परिणाम ईवीएम में कैद करेंगे।
- तरुण कुमार कंचन
सभी फोटो सोशल मीडिया से
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