google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: आग में फूल खिलाने वाले अग्निपुष्प

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Monday, 5 May 2025

आग में फूल खिलाने वाले अग्निपुष्प

                    महेंद्र झा अग्निपुष्प (फाइल फोटो)
बहुत ही मिलनसार, मददगार और जनसरोकार जुड़े व्यक्तित्व थे अग्निपुष्प जी। पटना में दैनिक जागरण खुलने के बाद मेरी मुलाकात उनसे हुई। उसके बाद उन्होंने पत्रकारिता के साथ सांसारिकता में भी मुझे परिपक्व किया। अग्निपुष्प जी होंगे किसी के लिए वरिष्ठ कवि, बड़े पत्रकार और वैचारिक प्रतिबद्धता के प्रतीक, मगर मेरे लिए अभिभावक  थे।
छोरा कल फिर आयो 
शनिवार 3 मई को कोलकाता में उन्होंने अपने पुत्र के घर अंतिम सांस ली। बताया गया कि वे काफी समय से बीमार थे।  मुझे याद है कि सन1999 व 2000 का समय जब मैं पटना में रहता था। उनसे बड़ी घनिष्ठता हो गई। हर दिन मैं उनके घर जाया करता था। उनसे आर्यावर्त अखबार के सुनहरे दिनों की कहानी सुना करता था।  उनके लिखे पुस्तक को पढ़ता था और सांसारिक बातें करते थे। इस बीच कई बार चाय और नाश्ता भी हो जाया करता था। उनके घर से जब मैं निकलने लगता था, तब एक बात जरूर कहते थे, छोरा ! कल फिर आयो।  वो शब्द अब भी मेरे कानों में गूंज रहा है। ऐसा लगता है कि वे कहीं आसपास हैं और मुझे आवाज दे रहे हैं।
कुछ वर्षों संपर्क में नहीं थे 
यह सच है कि विगत कुछ वर्षों से मुझे उनके बारे में कुछ भी सूचना नहीं थी कि वे कहां  हैं और कैसे हैं?  ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि मैं धीरे धीरे पारिवारिक जीवन में फंसता गया और पुराने  संबंध छूटते गए।  दूसरी बड़ी बात यह रही कि काम के सिलसिले में शहर बदलना पड़ा। वे सोशल मीडिया से दूर रहे, इसलिए कोई संपर्क नहीं रहा। अचानक उनके निधन की सूचना मिली तो मैं अंदर तक हिल गया । ऐसा लगा कि पत्रकारिता जीवन का एक अभिभावक खो दिया हूं। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे और अग्नि में फूल खिलाने वाले अग्निपुष्प जी को शांति प्रदान करे।
नीमतला घाट पर संस्कार
अग्निपुष्प जी का रियल नाम महेंद्र झा था। उनका जन्म 1950 में दरभंगा के तरौनी गांव में हुआ था। उनकी शिक्षा कोलकाता में हुई। उसके बाद उन्होंने पहले दरभंगा और फिर पटना को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। नक्सलबाड़ी आंदोलन के दौर में उन्होंने सक्रिय भागीदारी निभाई । कल सूचना मिली कि कोलकाता के नीमतला घाट पर महेंद्र झा अग्निपुष्प जी का अंतिम संस्कार हुआ है। इसके साथ भले ही वे पंचतत्व में विलीन हो गए, मगर उनकी स्मृति, उनका लेखन, उनकी विचारशीलता - ये सब हमारे बीच जीवित रहेंगे। ॐ शांति ॐ।

तरुण कुमार कंचन 

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