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Saturday, 13 December 2025

पटना पुस्तक मेला 2025: विचारों का महाकुंभ, किताबें आज भी ज़िंदा हैं | एक विस्तृत रिपोर्ट

 


💥Tarun Kumar Kanchan

Patna Book Fair 2025 has proved that the relevance of books has not ended, but has deepened. This grand literary and cultural Mahakumbh organised at Gandhi Maidan this year has emerged as not just an event but a living proof that the culture of reading is still the soul of the society

 परिचय : सांस्कृतिक संजीवनी का केंद्र गांधी मैदान

 मोबाइल, सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट के इस चरम युग में, जब हर कोई 'स्क्रॉल' कर रहा है, तब पटना पुस्तक मेला 2025 ने यह साबित कर दिया है कि किताबों की प्रासंगिकता खत्म नहीं हुई है, बल्कि और गहरी हुई है। गांधी मैदान में आयोजित यह भव्य साहित्यिक और सांस्कृतिक महाकुंभ इस वर्ष केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रमाण बनकर उभरा है—कि पढ़ने की संस्कृति आज भी समाज की आत्मा है।

थीम : इस बार (2025) का विषय वेलनेस – ए वे ऑफ लाइफ और कथाकार अवधेश प्रीत को समर्पित होना था।

भाग 1 : स्वछंद पाठक का एक दिन | पुस्तक प्रेम की व्यक्तिगत यात्रा

हर सच्चे पुस्तक प्रेमी के लिए
, किताबों पर खर्च किया गया पैसा "खर्च" नहीं, बल्कि 'निवेश' होता है। और कई वर्षों के बाद जब यह अवसर मिलता है, तो इसकी संतुष्टि अतुलनीय होती है।

मेरे लिए दिन शुक्रवार अपराह्न, पटना पुस्तक मेला, गांधी मैदान में बिताया गया एक दिन, कई बेहतरीन क्षणों को समेटे हुए था। यह उन क्षणों में से था, जहाँ मन पूरी तरह स्वछंद था। वहाँ कोई भाग-दौड़ नहीं थी, केवल किताबों का साथ था। करीब 3 बजे जैसे ही 20 रुपए का टिकट लेकर मेला परिसर में इत्मीनान से प्रवेश किया, चारों ओर एक नई ऊर्जा का संचार महसूस हुआ।

 मेरा पहला काम था एक चक्कर लगाना। स्टॉलों के बैनरों को पढ़ना और माहौल को समझना। यह तय करना कि ज्ञान के किस सागर में पहले डुबकी लगाई जाए। दर्जनों किताबों की दुकानों को खंगालने, किताबों को पलटने और उनकी गंध लेने का अनुभव बड़ी संतुष्टि देने वाला था। इस दौरान ढेर सारी किताबें ख़रीदीं, और किताबों पर किया गया यह खर्च कई वर्षों के बाद एक पाठक की तृष्णा को शांत कर रहा था।

 साहित्यिक हस्तियों से मुलाक़ातें : एक प्रभावी संवाद

पटना पुस्तक मेला केवल खरीदारी का केंद्र नहीं
, बल्कि विचारों के आदान-प्रदान का मंच है। मेला परिसर में कई स्टेज बने हुए थे, और इन्हीं मंचों पर विचारों की गंगा बह रही थी।

'गरदा' का लोकार्पण और अकु श्रीवास्तव जी से कटसी : पहले स्टेज पर जो कार्यक्रम देखा, वह था हिन्दुस्तान के पूर्व संपादक श्री अकु श्रीवास्तव जी की पुस्तक 'गरदा' का लोकार्पण। पूरे कार्यक्रम को इत्मीनान से सुनने के बाद, उनसे मिलने का अवसर मिला। यह कटसी मीटिंग कम समय के लिए हुई, लेकिन अत्यंत प्रभावी रही। इस दौरान उनके साथ सीनियर जर्नलिस्ट श्री अशोक कुमार जी और श्री कमलेश जी भी मौजूद थे। इस साहित्यिक गहमागहमी के बीच, पत्रकार ध्रुव कुमार से भी अनौपचारिक मुलाकात हुई, जिसने दिन को और यादगार बना दिया।

बदलाव के सारथी: वो पल जो दिल को छू गया

पुस्तकों की खरीदारी के बीच, मेरी नज़र सेंटर फॉर रीडरशिप डेवलपमेंट (CRD India) के मंच पर चल रही एक संगोष्ठी पर पड़ी, जिसने तुरंत मेरा ध्यान खींचा। संगोष्ठी का मुख्य विषय था, 'बदलाव के सारथी'

माइक से संबोधित करतीं नसीमा खातून

इस संगोष्ठी की मुख्य वक्ता नसीमा खातून थीं, जो एक सेक्स वर्कर की बेटी हैं। उन्होंने अपने संबोधन में एक सेक्स वर्कर के बच्चे की जिस वेदना का वर्णन किया, वह दिल को छू गया। उनके शब्द केवल कहानी नहीं थे, बल्कि सामाजिक रूढ़ियों और व्यक्तिगत संघर्षों का एक शक्तिशाली बयान थे। यह क्षण पुस्तक मेला के सांस्कृतिक और सामाजिक सरोकार को रेखांकित करता है।

 

भाग 2 : रिकॉर्ड और ब्रेकिंग सफलता : पटना पुस्तक मेला 2025 के आंकड़े

 पटना पुस्तक मेला 2025 अपने आप में एक घटना थी, जिसने डिजिटल चुनौतियों के सामने पढ़ने की आदत की जीत का उद्घोष किया। आयोजकों और प्रकाशकों से मिले आँकड़े इस महाकुंभ की भव्यता को दर्शाते हैं:

कुल आगंतुक - 15 लाख से अधिक लोग

किताबों की बिक्री-    20 लाख से ज्यादा किताबें

स्टॉलों की संख्या-    300 से अधिक स्टॉल

आयोजित कार्यक्रम - 50 से ज्यादा संगोष्ठियाँ, विमोचन

 यह स्पष्ट है कि पटना पुस्तक मेला अब केवल व्यापारिक आयोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और साहित्यिक महाकुंभ बन चुका है। मेले का क्रेज कम होने के बजाय काफी अधिक रहा है और कई मायनों में इसने पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं।

🚀बढ़े हुए क्रेज के प्रमाण

रिकॉर्ड तोड़ उपस्थिति (Footfall):  पहले सप्ताहांत में ही एक लाख से अधिक आगंतुक पहुंचे। केवल एक रविवार को ही लगभग 70,000 से 80,000 दर्शक पहुंचे, जो पिछले वर्षों की तुलना में भारी वृद्धि है।

बिक्री में उछाल (Surge in Sales):  प्रमुख प्रकाशकों ने अपनी बिक्री में 20% से 25% तक की वृद्धि दर्ज की, जिसे कई लोगों ने पिछले पांच सालों में सबसे बेहतरीन प्रतिक्रिया बताया है।

युवाओं की भागीदारी (Youth Engagement):  स्कूली बच्चों के लिए 'स्कूल उत्सव' जैसे कार्यक्रमों ने पढ़ने की आदत को बढ़ावा दिया। कॉलेज के छात्रों की दैनिक उपस्थिति भी पिछले साल की तुलना में 500 से बढ़कर 3,500-4,000 तक पहुँच गई।

 भाग 3 :  चर्चा का केंद्र और किताबों की विविधता

 पटना पुस्तक मेला 2025 में हर विचार, हर भाषा और हर विधा की मौजूदगी थी। 300 से अधिक स्टॉलों पर हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी, संस्कृत, भोजपुरी, मैथिली और अन्य भाषाओं की किताबों ने मेले को बहुभाषी स्वरूप दिया।🏆

'मैं' की 15 करोड़ की चर्चा: विचारों की कीमत

इस वर्ष मेले में जिस पुस्तक ने सबसे अधिक चर्चा बटोरी
, वह थी वरिष्ठ कथाकार रत्नेश्वर की पुस्तक 'मैं'। यह किताब न केवल अपने साहित्यिक महत्व के कारण, बल्कि 15 करोड़ रुपये की कीमत को लेकर चली चर्चा की वजह से भी सुर्खियों में रही।

राजकमल प्रकाशन से जुड़े एक प्रतिनिधि के अनुसार, यह कीमत बाज़ार मूल्य नहीं, बल्कि प्रतीकात्मक और वैचारिक मूल्यांकन के रूप में सामने आई। संदेश स्पष्ट था, विचारों की कीमत पैसों से नहीं आंकी जा सकती। इस चर्चा ने पाठकों में किताबों के प्रति जिज्ञासा बढ़ाई । यह किताब ज्ञान की परम अवस्था का आविष्कार होने के दावे के साथ आकर्षण का केंद्र बनी रही। हालाँकि बिक्री के लिए इसकी केवल तीन प्रतियाँ ही उपलब्ध थीं।

उर्दू साहित्य: शायरी और ग़ज़ल का जीवंत संसार

मेले की एक बड़ी विशेषता रही—उर्दू साहित्य की सशक्त मौजूदगी। उर्दू स्टॉलों पर ग़ालिब, इक़बाल, फ़ैज़, मंटो, इस्मत चुगताई और समकालीन उर्दू लेखकों की किताबों की अच्छी मांग रही। उर्दू स्टॉल के प्रतिनिधियों ने यह साबित किया कि उर्दू के पाठक कम नहीं हुए हैं, बल्कि नई पीढ़ी उससे जुड़ रही है। उर्दू-हिंदी अनुवादित पुस्तकों को भी खासा पसंद किया गया।

 धार्मिक साहित्य: आस्था और ज्ञान का संगम

धार्मिक साहित्य के स्टॉलों पर सुबह से शाम तक भीड़ देखी गई। गीता, रामायण, महाभारत, पुराण, सूफ़ी साहित्य, इस्लामी इतिहास और आध्यात्मिक पुस्तकों की बिक्री उल्लेखनीय रही। यह भीड़ दर्शाती है कि पाठक आज भी आध्यात्मिक पुस्तकों को गंभीरता से पढ़ते हैं और आस्था तथा ज्ञान के संगम की तलाश में हैं।

करियर का जलवा: प्रतियोगी परीक्षाओं की पुस्तकें

छात्रों के लिए पटना पुस्तक मेला किसी खजाने से कम नहीं था। UPSC, BPSC, SSC, रेलवे, बैंकिंग और शिक्षक भर्ती से जुड़ी पुस्तकों और पत्रिकाओं का सबसे अधिक दबदबा रहा। प्रकाशकों के अनुसार, कुल बिक्री का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा प्रतियोगी परीक्षा से जुड़ी पुस्तकों का था, जिसने छात्रों के बीच इसके महत्व को स्थापित किया। सिविल सेवा की तैयारी करानेवाले कोचिंग संस्थान  'दृष्टि' में  भी अच्छी खासी भीड़ दिखी।

अन्य आकर्षण:

नई वाली हिंदी : दिव्य प्रकाश दूबे और सत्य व्यास जैसे युवा और समकालीन हिंदी लेखकों की किताबें भी युवाओं के बीच काफी पसंद की गईं।

लोक साहित्य : बिहार की स्थानीय संस्कृति, खासकर मैथिली लोकगीतों और क्षेत्रीय साहित्य की पुस्तकों ने भी पाठकों को आकर्षित किया।


आर्ट गैलेरी की एक तस्वीर


आर्ट गैलरी : इस वर्ष आर्ट गैलरी की मौजूदगी ने यह दिखाया कि साहित्य और दृश्य कला एक-दूसरे के पूरक हैं।

 


भाग 4 : विचारों का मंच और पटना पुस्तक मेला का इतिहास

 पटना पुस्तक मेला 2025 केवल किताबों का क्रय-विक्रय नहीं था, बल्कि यह विचारों का मंच भी था, जहाँ साहित्यिक संगोष्ठियाँ, कवि सम्मेलन और समकालीन विषयों पर परिचर्चाएँ हुईं।📚

पटना पुस्तक मेला का इतिहास (CRD India):

शुरुआत: पहला पटना पुस्तक मेला वर्ष 1985 में आयोजित किया गया था।

आयोजक : इसका आयोजन सेंटर फ़ॉर रीडरशिप डेवलपमेंट (CRD India) द्वारा किया जाता है।

नियमितता : शुरुआत में यह हर दूसरे वर्ष आयोजित होता था, लेकिन वर्ष 2000 से इसका आयोजन प्रत्येक वर्ष होने लगा।

गांधी मैदान से संबंध : यह मेला आमतौर पर गांधी मैदान में ही आयोजित होता है, और यह मैदान इसकी पहचान बन चुका है। (केवल 1999 से 2002 के बीच पाटलिपुत्र कॉलोनी मैदान में बदला गया था)।

अंतर्राष्ट्रीय पहचान : यह मेला भारत के विभिन्न प्रकाशकों के साथ-साथ अमेरिका, ब्रिटेन और सिंगापुर जैसे देशों के प्रकाशकों को भी आकर्षित करता है।

निष्कर्ष: डिजिटल युग में किताबों की रिकॉर्ड तोड़ वापसी

पटना पुस्तक मेला 2025 एक शक्तिशाली संदेश देकर गया है कि डिजिटल क्रांति के बावजूद, कागज और स्याही का आकर्षण आज भी अटूट है। यह आयोजन पढ़ने की संस्कृति का जीवंत प्रमाण है।

 

रत्नेश्वर की 'मैं' के वैचारिक मूल्यांकन से लेकर नसीमा खातून के भावनात्मक उद्बोधन तक; उर्दू शायरी के जीवंत संसार से लेकर प्रतियोगी परीक्षा की पुस्तकों के दबदबे तक, हर पहलू ने इस मेले को विचारों, संस्कृति और चेतना का उत्सव बना दिया। पटना पुस्तक मेला केवल एक आयोजन नहीं है, बल्कि बिहार और पूर्वी भारत के साहित्यिक जीवन की सांस्कृतिक संजीवनी है, जो हर साल पाठकों को मोबाइल से हटाकर ज्ञान के महासागर की ओर लौटने के लिए प्रेरित करती है।

 

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4 comments:

  1. 16 दिसंबर तक चलेगा पटना पुस्तक मेला। आप सब जरूर लाभ उठाएं

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  2. इन बहुमूल्य खज़ानों को एक जगह पिरो कर हमें इनकी खूबसूरत झलक दिखाने के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया सर.. इस बार फिर से मनु भंडारी जी के साथ प्रेमचंद जी को घर लाने का मौका मिला..साथ मे राहुल संस्कृत्यायन साहब भी.. 🎉🥳🖋️📚🩷😊🙏

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  3. अच्छा कवरेज किया है तरुण सर आपने।
    आपका इंटरेस्ट किसमें है कोई बुक खरीदी है क्या आपने?

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