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Saturday, 29 November 2025

माओवाद (Maoism) : क्या भारत का 'लाल गलियारा' अब इतिहास है? एक विद्रोही विचारधारा की कहानी

जल, जंगल, जमीन या बंदूक

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💥Tarun Kumar Kanchan

Maoism: Is India's

'Red Corridor' history? The story of a rebellious ideology

For decades, politics was spoken through the barrel of the gun in the heartland of India. An armed conflict that challenged the country's development and democracy was known as Maoism or Naxalism.
This is not just a law and order problem, but a complex tale of class struggle, caste injustice and power struggle.

भारत के हृदयस्थल में दशकों तक बंदूक की नली से राजनीति की भाषा बोली गई। एक ऐसा सशस्त्र संघर्ष जिसने देश के विकास और लोकतंत्र को चुनौती दी, जिसे हम माओवाद या नक्सलवाद के नाम से जानते हैं। यह सिर्फ एक कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह वर्ग संघर्ष, जातिगत अन्याय और सत्ता की लड़ाई की एक जटिल दास्तान है।

हमारी यह सीरीज़ इसी "लाल गलियारे" की गहराई में उतरकर उन सवालों के जवाब खोजेगी, जो आज भी अनुत्तरित हैं: क्रांति की यह आग कहाँ से भड़की? क्या यह वास्तव में गरीबों के लिए न्याय की लड़ाई थी? और, आज इस आंदोलन का भविष्य क्या है?

भाग 1:

💔 विद्रोह की गाथा: जब न्याय की तलाश ने क्रांति का रास्ता पकड़ा

मादवी हिडमा

हाल ही में, दंडकारण्य के बीहड़ जंगलों से आई खबर ने एक बार फिर लाल गलियारे को सुर्खियों में ला दिया: शीर्ष माओवादी नेता मादवी हिडमा का कथित एनकाउंटर। सुरक्षा बलों के लिए यह एक बड़ी जीत मानी जा सकती है, जो माओवादी नेटवर्क की कमर तोड़ने का दावा करती है। लेकिन हर ऐसी घटना के बाद एक शाश्वत प्रश्न उठता है: क्या माओवाद का समाधान सिर्फ बंदूक की गोली है? या, क्या इसकी असली जड़ें न्याय, भूमि अधिकार और विकास की विफलता में हैं, जहाँ असली लड़ाई लड़नी बाकी है?

यह प्रश्न भारत की आंतरिक सुरक्षा की इस सबसे पुरानी और गहरी चोट के इतिहास में छिपा है। केंद्र सरकार माओवाद को देश के लिए सबसे बड़ा आंतरिक सुरक्षा खतरा मानती है, क्योंकि यह देश के लोकतांत्रिक, संवैधानिक और सामाजिक ताने-बाने को सीधे चुनौती देता है।


💥 वैचारिक पृष्ठभूमि: माओ की विचारधारा और भारत की विद्रोही मिट्टी

माओवाद की विचारधारा सीधे चीनी कम्युनिस्ट नेता माओ त्से-तुंग के सिद्धांतों से ली गई है, जिन्होंने चीन में क्रांति का नेतृत्व किया था। इसका केंद्रीय मंत्र स्पष्ट है: राज्य की सत्ता पर कब्जा करने के लिए हिंसा और सशस्त्र विद्रोह ही एकमात्र रास्ता है।

·       दीर्घकालिक जनयुद्ध (Protracted People's War): माओ ने शहरों पर सीधे हमला करने की बजाय, एक लंबी और सतत रणनीति दी। इसके तहत, किसानों और ग्रामीण गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से सेना को कमजोर करना और फिर शहरों को धीरे-धीरे घेरना शामिल था।

·       किसानों को क्रांति का आधार: मार्क्सवाद जहाँ औद्योगिक सर्वहारा (कारखानों में काम करने वाले मजदूर) को क्रांति का जनक मानता है, वहीं माओ ने किसानों और भूमिहीन मजदूरों को क्रांति का आधार बनाया।

 भारत में आगमन: नक्सलबाड़ी से जन्मा 'नक्सलवाद'

भारत में इस विचारधारा का पहला संगठित विस्फोट 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव में हुए किसान विद्रोह से हुआ। यहीं से 'नक्सलवाद' शब्द की उत्पत्ति हुई, जो जल्द ही माओवादी क्रांति का पर्याय बन गया।


इस विद्रोह का नेतृत्व चारु मजूमदार, कानू सान्याल और जंगल संथाल जैसे नेताओं ने किया, जो भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) [CPI(M)] के संसदीय राजनीति में शामिल होने से नाराज़ थे। उनका मानना था कि CPI(M) क्रांति के मार्ग से भटक गई है। उन्होंने खुलेआम सशस्त्र क्रांति का आह्वान किया और घोषणा की कि क्रांति का मार्ग केवल माओ त्से-तुंग की विचारधारा में निहित है।

🔴 फैलाव और उद्देश्य: जहाँ विकास की रोशनी नहीं पहुँची

शुरुआत में, आंदोलन का उद्देश्य गरीब किसानों और भूमिहीन मजदूरों को जमींदारों के उत्पीड़न से मुक्त कराना था। यह आंदोलन तेजी से पूर्वी और मध्य भारत के उन खनिज-संपन्न और सघन वन क्षेत्रों में फैला, जिन्हें आज 'लाल गलियारा' कहा जाता है। इन क्षेत्रों में माओवादियों को पैर जमाने का मौका मिला क्योंकि यहाँ:

1.     सामाजिक-आर्थिक असमानता चरम पर थी।

2.     भूमि अधिकारों की उपेक्षा और आदिवासियों का विस्थापन व्यापक था।

3.     दशकों की सरकारी उपेक्षा, अशिक्षा और खराब शासन ने माओवादियों को 'न्याय' और 'अधिकार' के नाम पर समानांतर शासन (जनताना सरकार) स्थापित करने का अवसर दिया।

2004 में, इस आंदोलन के दो प्रमुख गुट, पीपुल्स वार ग्रुप (PWG) और माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (MCC) का विलय हो गया, जिससे आज का सबसे शक्तिशाली संगठन भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) - CPI (Maoist) बना।


🔫 माओवादी विचारधारा: बंदूक संस्कृति का महिमामंडन

माओवादियों के लिए, बंदूक केवल एक हथियार नहीं है, बल्कि क्रांति, न्याय और सत्ता का प्रतीक है। वे सशस्त्र संघर्ष और हिंसा को ही क्रांति का एकमात्र अनिवार्य रास्ता मानते हैं। वे चीन के कम्युनिस्ट नेता माओत्से तुंग की विचारधारा से प्रेरित हैं, जिसका मुख्य सूत्र है: "सियासी सत्ता बंदूक की नली से निकलती है" (Political power flows through the barrel of the gun)

·       चारु मजूमदार का आह्वान: नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रणेता चारु मजूमदार इस विचार के सबसे बड़े प्रस्तावक थे। उन्होंने किसानों को हथियार छीनने और जमींदारों का सिर कलम करने की वकालत की।

o   उनके विवादास्पद विचारों में से एक यह था: "एक समय आएगा जब युद्ध नाद होगा: जिसने वर्ग शत्रु के रक्त से अपना हाथ नहीं रंगा है, वह कम्युनिस्ट नहीं कहा जा सकता।"

अभय (प्रतिबंधित भाकपा (माओवादी) की केंद्रीय कमेटी के प्रवक्ता) 

o   एक प्रेस बयान में, उन्होंने हथियारबंद संघर्ष को त्यागने की बात को नकार दिया था, जबकि संगठन के भीतर एक धड़ा शांति और आत्म-समर्पण की बात कर रहा था।

o   उन्होंने स्पष्ट किया कि वे हथियार नहीं छोड़ेंगे

·       अंतिम उपाय के रूप में हिंसा: माओवादी मानते हैं कि गरीबी, अन्याय, शोषण से मुक्ति पाने और अपने अधिकारों को 'छीनकर' लेने का एकमात्र अंतिम तरीका हिंसा है। वे भारतीय राज्य को उत्पीड़क मानते हैं, जिससे बातचीत या लोकतांत्रिक प्रक्रिया संभव नहीं है।

⚖️ आलोचना और विमर्श

माओवादियों की यह विचारधारा, जो हिंसा को अंतिम समाधान मानती है, भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के साथ सीधा टकराव पैदा करती है। आलोचक कहते हैं:

·       जन-विरोधी: माओवादी अक्सर स्थानीय आदिवासियों को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल करते हैं और विकास कार्यों (सड़क, स्कूल) को ध्वस्त करके उन्हीं समुदायों को मुख्यधारा से काट देते हैं, जिनके लिए वे 'लड़ने' का दावा करते हैं।

·       उत्पीड़न का नया रूप: जहाँ वे जमींदारों के उत्पीड़न के खिलाफ खड़े हुए, वहीं वे खुद अपने नियंत्रण वाले क्षेत्रों में जबरन वसूली (लेवी), बाल सैनिकों की भर्ती और तानाशाही करते हैं।

·       विकास बनाम बंदूक: दक्षिणपंथी विचारधारा और सरकार का मत है कि विकास, लोकतंत्र और सुशासन ही इस समस्या का असली समाधान है, न कि बंदूक।


अब सवाल यह है...

क्या यह 'बंदूक की क्रांति' वास्तव में गरीबों को न्याय दिला पाई? या फिर इसने, अपने विस्तार के क्रम में, संघर्ष को कहीं अधिक खूनी और जटिल बना दिया?

⏭️ आगे क्या?


यह सिर्फ शुरुआत है। अगले भाग में हम देखेंगे कि कैसे बिहार और अन्य राज्यों में यह वर्ग संघर्ष की आग धीरे-धीरे जातिगत नरसंहार में बदल गई। हम यह भी जानेंगे कि कैसे माओवाद ने पुलिस और सुरक्षा बलों को अपना जानी दुश्मन बना लिया और इस टकराव ने एक दशक तक देश को झकझोर कर रख दिया।


जुड़े रहिए हमारी इस सीरीज़ से
, और जानिए उस 'क्रांति' की पूरी कहानी जिसने भारत के इतिहास पर एक गहरा घाव छोड़ा है।

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