google.com, pub-9395330529861986, DIRECT, f08c47fec0942fa0 Kanchanwani कंचनवाणी: संत कुमार माट्साब: स्मृतियों के झरोखे से एक निश्छल व्यक्तित्व

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Friday, 13 February 2026

संत कुमार माट्साब: स्मृतियों के झरोखे से एक निश्छल व्यक्तित्व

 
शिक्षक दिवस विशेष संस्मरण कंचनवाणी

यह एक अत्यंत भावुक और जीवंत संस्मरण है। डॉ. रोहिताश्व दुबे जी ने संत कुमार दुबे उर्फ माट्साब के व्यक्तित्व को जिस बारीकी और आत्मीयता से उकेरा है, वह दिल को छू लिया। समर्पित शिक्षक, जिनके 'कंगारू खेल', लोकगीत और ताश की महफिलों के किस्से आज भी जीवंत हैं। कंचनवाणी पर पढ़िए जीवन के अनछुए पहलुओं को समेटती यह अनूठी कहानी।

डॉ रोहिताश्व दुबे 

लेखक: डॉ. रोहिताश्व दुबे (अवकाश प्राप्त अध्यापक, बी.आर.ए. बिहार विश्वविद्यालय)

जमुई । संत कुमार माट्साब के स्मरण मात्र से ही एक ऐसा संपूर्ण जीवन वृत्त स्मृति पटल पर कौंध जाता है, जिसे याद कर मन सुकून से भर जाता है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था जिसने जीवन भर सबको हंसाया, कभी किसी को रुलाया नहीं।


बचपन की यादें और शिक्षा का सफर
मुझे याद है जब वे दसवीं-ग्यारहवीं के छात्र थे और मैं प्राथमिक कक्षा में था। उन्हें खाकी पैंट पहनकर हाई स्कूल जाते देखना आज भी याद है। मैट्रिक पास करने के बाद ही वे गांव के मिडिल स्कूल में शिक्षक के रूप में सेवा देने लगे। अरुण के घर में सुबह-सुबह बच्चों को पढ़ाना। मां मुझे भी भेज देती थी। मेरा वहां पढ़ने जाना, जीवन के वे शुरुआती पाठ थे जो आज भी जेहन में ताजा हैं। उनकी शादी की थोड़ी थोड़ी याद है। संभवतः 1959-60 में उनकी शादी हुई थी।
अभी हाल में गिद्धौर होते हुए देवघर जा रहा था तो मेरा ध्यान एक पुराने परित्यक्त विद्यालय भवन पर गया। सहसा स्मरण हो आया, अरे वह वही शिक्षक शिक्षा स्कूल है जहां एक जमाने में उमेश माट्साब और संत कुमार माट्साब ने ट्रेनिंग किया था। हमलोग किसी समारोह में लोटन (उनकी ससुराल, जो जमुई जिला में है) गए हुए थे, वहीं से प्लान बना कि वह स्कूल चला जाए जहां ये लोग उस समय ट्रेनिंग कर रहे थे। क्लास होते, खाना बनते सब देखा था।
मैं 1963-64 में मिडल स्कूल में था। स्वाभाविक था उस दौर की 'नई तालीम' और अनुभव से लैस होकर जब वे लौटे, तो स्कूल का परिवेश ही बदल गया। उन्हें खेल-कूद का इंचार्ज बनाया गया और फिर शुरू हुआ गतिविधियों का एक अनूठा दौर।


खेल, प्रहसन और 'कंगारू' की छलांग
माट्साब बच्चों को केवल किताबी ज्ञान नहीं देते थे, बल्कि खेल-खेल में जीवन सिखाते थे। उनके सिखाए खेल जैसे 'रुमाल झपट्टा' जिसमें चारों तरफ गोल बैठकर एक लड़के को किसी के पीछे रुमाल रखने कहा जाता। उसके इंटेलीजेंस पर निर्भर करता था यह जानना कि उसके पीछे ही रुमाल रखा गया है और वह उठ जाए, वरना उसकी पीठ पर धम धम (हल्के से) होने लगता। दूसरा खेल वृत्त में बैठे रहकर ही एक बढ़िया सा गाना गाते। उनके गाए गीत आज भी कानों में गूंजते हैं:
"लंबे-लंबे ताड़ के पेड़ लागे हैं हजार रे... धड़ है इसका मोटा धड़, झुपे हनुमान रे..."
उनका एक प्रहसन तो मैं आज भी अपने मित्रों को सुनाता हूं:
"मुक्का मार बताशा फोड़ूं, तोड़ूं कच्चा सूत।
मक्खी का भुजदण्ड उखारूं, मैं सच्चा रजपूत।।"
मनोरंजन का आलम यह था कि वे स्वयं 'कंगारू' बनकर बच्चों को छलांग लगाना सिखाते थे। जैसा कि बतलाया जा चुका है ट्रेनिंग से लौटने के बाद माट्साब तरह के खेल छात्रों को खेलाया करते। उनमें से एक ऑस्ट्रेलियन पशु कंगारू से संबंधित था। वे स्वयं कंगारू बनकर छात्रों को बताते कि कंगारू कैसे छलांग लगाता है। इसके लिए क्लास रूम में ही दो टेबल का प्रबन्ध किया जाता। एक टेबल से दूसरे टेबल पर छलांग लगाते थे। हमलोगों का खूब मनोरंजन होता था।
इसी सिलसिले में एक बार स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस पर मिडल स्कूल के गेट के बाहर केरवा आम के नीचे आयोजन में मास्टर साहब ने सांस्कृतिक कार्यक्रम के तहत कंगारू का खेल दिखाया था, जिसमें एक टेबल से दूसरे टेबल पर कूदने पर टेबल के उलटने की नौबत आ गई थी। खैर बाल -बाल बच गए थे।
कर्तव्यनिष्ठा और सहजता
वे काम के प्रति भी उतने ही समर्पित थे। मुझे याद है, उन दिनों इंटरनल असेसमेंट सिस्टम लागू था। संपूर्ण परीक्षा का आधा अंक असेस्मेंट पर आधारित होता था। स्कूल में रिज़ल्ट निकालना था, मगर टेबुलेशन का काम अभी हो नहीं पाया था। संत कुमार माट्साब मुझे रात का खाना खाकर स्कूल चलने कहा। एक बजे रात तक असेस्मेंट के अंकों का टेबुलेशन सम्पन्न किया था।
खेल के मैदान पर भी उनकी सहजता देखते ही बनती थी। माट्साब नियमित रूप से ढिबरा पर फुटबाल खेल में भी शामिल होते थे। एकबार गेंद के बजाय देवनारायण भगत ने उनके पैर में जोर से मार दिया था। माट्साब ' है ...' कहते पैर पकड़ते हुए बैठ गए थे। फणींद्र ने कहा था," चोटा (चोट) जोर से लगले"। हम लोगों को अन्दर से हँसी भी आ रही थी। देवनारायण अफसोस व्यक्त करने लगा। जानबूझकर तो उसने नहीं ही मारा था। माट्साब अगले ही पल उतनी ही सहजता से उठ खड़े हुए। उनके भीतर किसी के प्रति कोई द्वेष नहीं था।



आस्था और विश्वास का संबल
माट्साब को कुछ पारंपरिक मंत्र-विद्या की भी जानकारी थी। यद्यपि मैं इन चीजों पर व्यक्तिगत रूप से बहुत भरोसा नहीं करता, लेकिन जैसा कि कहा गया है—'विश्वासो फलदायकम्'। मेरे बेटे सोनू (अभिनव आनन्द) का प्रारम्भिक 2-3 वर्ष गांव में बीता। जब थोड़ा ज्यादा रोया तो मैया (मां ) परेशान हो जाती थी और वह संत कुमार माट्साब के पास दौड़े-दौड़े जाती और अपनी व्यथा सुनाती। माट्साब आकर कुछ मंत्र पढ़ते हुए माथा पर हाथ रख देते बस सब बलैया रफूचक्कर। मैया की सब चिंता दूर। यह क्रम बराबर चलता रहता। सोनू से चर्चा करते हुए हमलोग आज भी आनंदित हो जाते हैं। इससे माँ को परम शांति मिलती थी।
ताश की महफ़िल और 'घी में मूंछ'
संत कुमार माट्साब की चर्चा हो और ताश की चर्चा नहीं हो ऐसा हो नहीं सकता। सबल बीघा में ताश के वे केंद्र थे। ताश के खेल में बहुत लोग शामिल होते थे जैसे - नुनुभाई (डॉ छेदी दुबे), महेन्द्र दुबे, रामदेव दुबे, जयकांत दुबे, त्रिपुरारी दुबे, राजेन्द्र मिश्र आदि। हमारी पीढ़ी के लोग भी शामिल होते थे। गर्मी में किसी के बंगले पर, जाड़े में धूप में चटाई बिछाकर या पुआल पर। माट्साब खा पीकर ताश लेकर खिलाड़ियों की तलाश में निकल पड़ते। उस दिन उनकी स्थिति दयनीय सी दिखती जिस दिन लोग जमा नहीं होते। ताश खेलने का तरीका भी उनका अजूबा था। सिर्फ दो रंग के भरोसे 22-23 की बोली लगा बैठते। काला पान की तिग्गी का सीट निकल जाता। जब उनका गोधा (खेल का साथी) खीज व्यक्त करता तो कहते, जमीन बिक रही है क्या? जब रंग की तीन पत्ती आ जाती तो हाल पूछने पर मूंछ पर ताव देते हुए कहते,"घी में मूंछ है '। सुना है, किसी की प्रिय वस्तु को उसकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्राद्ध में तर्पण किया जाता है। क्या बानो ( माट्साब का बेटा) ऐसा करेगा?
अंतिम मुलाकात: स्मृतियों का धुंधलका
अक्टूबर 2023 में जब मैं उनसे मिलने गया, वे होश-बेहोश की स्थिति में थे। देवघर में सुरेश दुबे के श्राद्ध के दिन (उसी दिन मिथिलेश, कमलेश की मां का भी निधन हुआ था) मैं माट्साब से मिलने गया था। कभी होश में रहते कभी बेसुध हो जाते। जब मैं मिलने पहुंचा तो वे होश में नहीं थे। मगर बात करते -करते वे होश में आ गए। उन्हीं का गाना "लम्बे लंबे ताड़ के पेड़... सुनाने पर उन्होंने आगे का हिस्सा स्वयं पूरा कर दिया ।
उनकी आंखों में सुनहरे अतीत की चमक थी, पर होंठों पर एक दर्द भरी सच्चाई— "अब उ जमाना नै लौटते हो" (अब वह जमाना नहीं लौटेगा)
गत 30 नवम्बर 2025 को मैं फिर उनसे मिलने गया था। धूप में बैठे ठीक लग रहे थे। उनकी जीवनसंगिनी (भौजी) भी वहीं पास बैठी थीं। मगर माट्साब चेतना शून्य थे। लिखकर अपना नाम दिया तब भी पहचान नहीं पाए। बहुत पीड़ा हुई। पास में बैठी भौजी झुंझला गईं। उस झुंझलाहट में भी एक गहरा दुख और रुदन छिपा था। मुझे इतना संतोष है कि उनसे अंतिम दर्शन मेरा हो गया।
शायर की ये पंक्तियां उन पर सटीक बैठती हैं:
कल तो कहते थे कि उठकर चल नहीं सकते।
आज हिम्मत यह कि आप दुनिया से उठकर चल दिए।।
संत कुमार माट्साब भौतिक रूप से भले ही चले गए हों, पर उनकी निश्छलता, वे खेल, वे गीत और वह 'घी में मूंछ' वाली मुस्कान हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेगी। उनकी स्मृति को कोटिश: नमन 🌹 🙏


 
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Keywords
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भीमराव अंबेडकर बिहार विश्वविद्यालय मुजफ्फरपुर, शिक्षक की यादें, पुराने दिनों के खेल, संस्मरण लेखन, सबल बीघा की यादें, ग्रामीण शिक्षक का जीवन, प्रेरणादायक जीवन गाथा।
संत कुमार माट्साब: एक शिक्षक और मार्गदर्शक


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