मेरे पिता और आदर्श शिक्षक श्री संत कुमार दुबे का 86 वर्ष की आयु में निधन। जमुई के सिकंदरा क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने वाले एक मानिंद व्यक्तित्व के प्रेरक जीवन, अनुशासन और अंतिम संघर्ष की भावुक कहानी। पढ़िए कंचनवाणी पर एक विशेष संस्मरण।
तरुण कुमार कंचन
ओम व्यास की पंक्तियां — "पिता हैं तो दुनिया के सारे खिलौने अपने हैं।" आज जब पिता श्री संत कुमार दुबे जी का साया सिर से उठा है, तो अहसास हो रहा है कि खिलौने तो दूर, यह पूरी दुनिया ही अब पराई और असुरक्षित लगने लगी है। वह भरोसा, जो उनके होने मात्र से मिलता था, अब एक गहरे सन्नाटे में तब्दील हो गया है।
विपदा की घड़ी और पिता का वो 'चमत्कार'
अभी कुछ ही समय बीता है जब मैं अपने जीवन के सबसे काले दौर से गुजर रहा था। लाखों की कोशिश और दिन-रात की भाग-दौड़ के बावजूद मेरी पत्नी रीना कंचन कैंसर की बेरहम पकड़ से दूर होती जा रही थी। घर में मातम जैसा सन्नाटा था। पिता जी स्वयं अल्जाइमर और ढलती उम्र की व्याधियों से जूझ रहे थे। वे सुध-बुध खो चुके थे।
लेकिन एक दिन जो हुआ, वह ईश्वर के साक्षात दर्शन जैसा था। बेसुध पड़े पिता जी अचानक बिस्तर से उठ बैठे। उनकी आँखों में वही पुरानी चमक और आवाज़ में वही शिक्षक वाली खनक लौटी।
उन्होंने मुझे देखा और दृढ़ता से कहा— "तुम चिंता मत करो। मैं अभी जिंदा हूँ। तुम्हें जो जरूरत होगी, मैं पूरी करूँगा।"
इतना कहकर वे फिर बिस्तर पर लेट गए। कमरे में बैठे सगे-संबंधी और मैं, सब अवाक थे। वह इंसान जो खुद चलने में असमर्थ था, वह अपने बेटे को पूरी दुनिया से लड़ने का हौसला दे रहा था। आज देवघर के अस्पताल में उनकी अंतिम सांस के साथ मेरा वही 'अंतिम भरोसा' भी चला गया। अब कौन कहेगा कि 'मैं अभी जिंदा हूँ'?
अनुशासन का वो दिव्य ज्ञान
पिता जी केवल पिता नहीं, एक कालजयी शिक्षक भी थे। उनके प्यार की थपकियाँ जितनी कोमल थीं, उनके शब्दों के वाण उतने ही सटीक। बात 1982-83 की है, जब मैं सिकंदरा हाईस्कूल का अल्हड़ किशोर था। 15 जनवरी का दिन था, कुंडग्राम (भगवान महावीर की जन्मस्थली) की पहाड़ियों पर मेला लगा था।
गांव की एक महिला जो रिश्ते में दादी लगती थीं । उनके साथ निकलते वक्त मैंने उत्साह में सब्जी का बर्तन थाम लिया था। मेले की भीड़ में दादी बिछड़ गईं और मैं अपने साथियों के साथ 'जन्मस्थान' के जंगलों में चला गया। घंटों इंतजार के बाद, जब भूख लगी, तो हम साथियों ने मिलकर वह सब्जी चट कर दी। शाम को जब घर लौटा, तो रास्ते में पिता जी मिले। उन्होंने कोई डांट-फटकार नहीं की, बस मेरी आँखों में आँखें डालकर एक वाक्य कहा:
"तुमसे ऐसी उम्मीद ना थी और ना है।"
वे शब्द आज 40 साल बाद भी मेरे कानों में गूँजते हैं। उन सात शब्दों ने मुझे वह अनुशासन और नैतिक बोध दिया, जिसे दुनिया की कोई किताब नहीं सिखा सकती थी। उन्होंने मुझे सिखाया कि जिम्मेदारी का अर्थ केवल बर्तन उठाना नहीं, बल्कि उस भरोसे को निभाना है जो किसी ने आप पर किया है।
विदाई एक युग की
31 जनवरी को फर्श पर गिरने के बाद से वे संघर्ष कर रहे थे। आज सोमवार को 86 वर्ष की आयु में उन्होंने विष्णुलोक की यात्रा प्रारंभ की। जमुई और सिकंदरा में उन्होंने हज़ारों बच्चों का भविष्य संवारा। लछुआड़ मध्य विद्यालय से उनकी सेवानिवृत्ति केवल कागजी थी, वे आजीवन शिक्षक रहे।
मेरे भाई यतीन्द्र, सत्येंद्र व अमरेंद्र और हमारी बहनें बिंदु, सिंधु और निधि उसी संस्कार की पूंजी पर खड़ी हैं जो उन्होंने हमें दी।
पिता जी, आपकी शारीरिक कमी हमेशा खलेगी, लेकिन विपदा में आपकी वह आवाज— "मैं अभी जिंदा हूँ"— ताउम्र मेरा संबल बनी रहेगी।
श्रद्धांजलि:
पूज्य पिताजी को विनम्र श्रद्धांजलि। ईश्वर उनकी पुण्यात्मा को शांति प्रदान करे।
विवरण:
नाम: श्री संत कुमार दुबे
परिचय: अवकाश प्राप्त शिक्षक, समाजसेवी
आयु: 86 वर्ष
निधन तिथि: सोमवार
निधन स्थान: सदर अस्पताल, देवघर
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वरिष्ठ पत्रकार तरुण कुमार कंचन के पिता
सबल बीघा मध्य विद्यालय जमुई
लछुआड़ मध्य विद्यालय सेवानिवृत्त शिक्षक
जमुई के आदर्श शिक्षक
पिता पर भावुक संस्मरण
अमरेंद्र कुमार दुबे पत्रकार
देवघर सदर अस्पताल समाचार


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