💥Tarun Kumar Kanchan
The 2025 Bihar Assembly Elections have shattered all previous voter turnout records. This time, a historic 67.10% voter turnout was recorded, a 9.81% increase from 57.29% in 2020. This unprecedented increase isn't just a statistic; it's a clear sign of a major shift in Bihar politics.
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 का रिकॉर्ड-तोड़ उच्च मतदान सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक चेतना का स्पष्ट प्रमाण है। 67.10% मतदाताओं की भागीदारी ने न केवल 2020 के पिछले रिकॉर्ड को ध्वस्त किया है, बल्कि यह भी स्थापित कर दिया है कि अब बिहार की राजनीति में केवल जातिगत समीकरण साधने वाले छोटे दलों की 'पिछलग्गू' वाली राजनीति का दौर समाप्त हो चुका है। इस बार मतदाता ने जात-पात की बेड़ियों से ऊपर उठकर, अपने रोजी-रोजगार, सुरक्षा, विधि-व्यवस्था और राज्य के उत्तरोत्तर विकास को महत्व दिया है। यह चुनाव परिणाम आने से पहले ही एक बड़ा संकेत दे रहा है कि बिहार अब केवल 'जंगलराज और सुशासन' की गुत्थियों में नहीं फँसा है, बल्कि वह आर्थिक तरक्की और महिला सशक्तिकरण के नए एजेंडे पर वोट कर रहा है। इसी बीच, जनसुराज जैसी नई पार्टियों का उदय और पारंपरिक वोट बैंक में बिखराव, यह बताता है कि किंग मेकर कौन होगा, इसकी असली अग्निपरीक्षा 14 नवंबर को चुनाव परिणाम के साथ शुरू होगी।
सियासी पंडितों के समीकरण बिगड़े
बंपर वोटिंग के इन आंकड़ों ने कई सियासी पंडितों के समीकरण बिगाड़ दिए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बिहार का मतदाता इस बार 'जाति' के जाल से बाहर निकलकर 'विकास', 'रोजगार' और 'सुरक्षा' के मुद्दों पर अपना 'Decision' (निर्णय) सुना चुका है? 14 नवंबर को आने वाले नतीजों से पहले, आइए इस 'हाई-वोल्टेज' चुनाव का पूरा विश्लेषण करते हैं।
📉 बदलता
बिहार: क्या जातिगत समीकरण हो रहे 'Irrelevant'?
एक समय था जब बिहार की राजनीति पूरी तरह
से जाति और सामाजिक समीकरणों पर टिकी थी। लेकिन 2025 का यह चुनाव एक नई कहानी कहता दिख रहा
है।
· छोटे दलों पर संकट: बिहार की कई छोटी
पार्टियां, जिनका वजूद ही जातिगत
गोलबंदी पर टिका था, इस
बार अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करती दिखीं।
· विकास बना मुद्दा: मतदाताओं ने स्पष्ट
कर दिया है कि उन्हें सिर्फ अपनी जाति का नेता नहीं, बल्कि राज्य का विकास करने वाला नेतृत्व
चाहिए। वे सिर्फ 'पिछलग्गू'
बनकर रहने वाले दलों को खारिज कर रहे
हैं।
· प्राथमिकताएं बदलीं: इस बार का मतदाता सिर्फ
जाति नहीं, बल्कि 'Rojgaar' (रोजी-रोजगार),
'Suraksha' (सुरक्षा) और एक बेहतर
'Law & Order' (विधि
व्यवस्था) की मांग कर रहा है। महिला सशक्तिकरण और समान अवसर की मांग भी प्रमुखता
से उठी है।
🚀 जनसुराज
की 'धमाकेदार' एंट्री: क्या प्रशांत किशोर बनेंगे 'King
Maker'?
पार्टी के नेताओं का मानना है कि बिहार
की जनता ने उन्हें एक बड़े 'Alternative' (विकल्प) के तौर पर स्वीकार किया है।
उनका संकल्प 'बिहार को बिहारी
नजरिया' से देखने और राज्य की
छवि बदलने का है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने विश्वास जताया है, "जनता के समर्थन को देखकर हम उत्साहित
हैं। हम निश्चित रूप से इस बार 'King Maker' (किंग मेकर) बनेंगे।"
📊 पारंपरिक
'वोट बैंकों' में सेंध: तेजस्वी और सहनी की राह
मुश्किल?
एग्जिट पोल के अनुमान और जमीनी रिपोर्ट
एक और बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रही है: पारंपरिक वोट बैंकों में बिखराव।
· RJD
को झटका: माना जा रहा है कि
महागठबंधन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव की जीत भी 'dubious' (संदिग्ध) है। इसका मुख्य कारण यादव
वोटों के एक बड़े हिस्से का बिखरना माना जा रहा है।
· VIP
की नैया: यही हाल वीआईपी नेता
मुकेश सहनी का भी दिख रहा है। मल्लाह मतदाताओं में भी स्पष्ट बिखराव देखा गया। एक
स्थानीय मतदाता के शब्दों में, "मल्लाह को कोई 'Misguide'
(मिसगाइड) नहीं कर सकता।" यह दिखाता
है कि मतदाता अब किसी एक नेता के बंधक नहीं रहे।
🔥 सहयोगी
दलों की 'अग्निपरीक्षा':
NDA के 'Small Partners' कितना दिखाएंगे दम?
यह चुनाव एनडीए के सहयोगी दलों—लोजपा
(आर), हम (सेक्युलर) और
रालोमो—के लिए भी एक 'Litmus Test' (अग्निपरीक्षा) है।
· दूसरे चरण में इन दलों की सर्वाधिक 25
सीटों पर चुनाव हुए हैं।
· पहली बार एनडीए में पांच पार्टियां
(जदयू और भाजपा समेत) शामिल हैं।
· 14
नवंबर को यह स्पष्ट हो जाएगा कि ये 'Allies' (सहयोगी
दल) गठबंधन को कितना लाभ पहुंचा पाए और क्या वे अपना वोट सफलतापूर्वक 'Transfer'
(ट्रांसफर) करा सके।
📈 'सुशासन'
बनाम 'जंगलराज': आर्थिक तरक्की और सुरक्षा बने 'Key
Issues'

Nitish-Tejaswi
इस बार यह स्पष्ट दिखा कि बिहार ने 'जात-पात' से ऊपर उठकर वोट किया है।
· आर्थिक मुद्दे हावी: लोगों ने रोजगार,
नौकरी, मुफ्त अनाज और मुफ्त बिजली जैसी
कल्याणकारी योजनाओं के आधार पर वोट दिया।
· वादों का असर:
जहां कुछ मतदाता
तेजस्वी यादव के सरकारी नौकरी के वादे से आकर्षित हुए, वहीं प्रवासी मजदूरों पर प्रशांत किशोर
की 'बिहार में रोजगार'
की घोषणा का भी असर दिखा।
· सुरक्षा की चाहत: हालांकि, सबकी एक चिंता समान थी: राज्य को
सुरक्षा और बेहतर विधि-व्यवस्था देने वाला नेता चाहिए। मतदाता 'सुशासन' और 'जंगलराज' की पुरानी गुत्थियों के बीच अपना भविष्य
तय करता दिखा।
🦸♀️ 'अबला' नहीं, 'शक्ति': महिला वोटर बनीं निर्णायक 'X-Factor'
· योजनाओं का प्रभाव: जीविका योजना,
महिला उद्यमी योजना (जिसके तहत सीधे
खाते में 10,000 रुपये
मिले) और पंचायत व निकायों में आरक्षण का सीधा प्रभाव दिखा।
· स्पष्ट रुझान:
अधिकांश महिलाओं का
मानना था कि वर्तमान सरकार (नीतीश और मोदी) ने उनके लिए बेहतर काम किया है।
· यह 'साइलेंट वोटर' का समूह इस बार 'लाउड' था और माना जा रहा है कि इन्होंने ही
चुनाव की दिशा तय कर दी है।
📊 चुनाव
2025: आंकड़ों की कहानी (At
a Glance)
· कुल मतदान: 67.10%
· पहले चरण में: 65.08%
· दूसरे चरण में: 69.12%
· 2020
से वृद्धि:
+9.81% (एक बड़ी छलांग)
· सर्वाधिक मतदान (जिला): कटिहार (79.1%)
🏁 निष्कर्ष:
14 नवंबर का इंतजार,
किसकी होगी जीत?
रिकॉर्ड तोड़ मतदान, महिलाओं का अभूतपूर्व उत्साह, जाति के बंधनों का टूटना और विकास का
मुख्य मुद्दा बनना—इन सभी ने बिहार चुनाव 2025 को ऐतिहासिक बना दिया है।
अब सबकी नजरें 14 नवंबर को होने वाली मतगणना पर टिकी हैं।
असली तस्वीर (Real Picture) तभी
साफ होगी कि बिहार की जनता के 'Pulse' (नब्ज) को कौन सी पार्टी सही से पकड़ सकी और किसने कितना असर
दिखाया।
लोगों की खोज
बिहार चुनाव 2025: रिकॉर्ड तोड़ मतदान, जाति का अवसान, अब सिर्फ 'विकास' पर वोट!
द एंड ऑफ कास्ट पॉलिटिक्स? बिहार 2025 में महिला शक्ति और रोजगार ने तय की दिशा!
किंग मेकर 'जनसुराज' की एंट्री: क्या बदल गया बिहार का सियासी समीकरण?
तेजस्वी के वोट बैंक में सेंध, सहनी हुए 'मिसगाइड': 14 नवंबर को किसका पलड़ा भारी?
रिकॉर्ड 67.10% वोटिंग: बिहार की जनता ने 'सुशासन' और 'जंगलराज' में किसे चुना?
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बदलता बिहार: अब जाति नहीं, रोजी-रोजगार है सबसे बड़ा मुद्दा।
छोटे दलों के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न: क्या बिहार में खत्म हो रही 'Micromanagement' की राजनीति?
पारंपरिक 'वोट बैंक' की दीवारें टूटीं: RJD और VIP क्यों हुए कमजोर?
जनसुराज और नए फैक्टर
जनसुराज की 'धमाकेदार' उपस्थिति: प्रशांत किशोर का दावा, हम बनेंगे 'King Maker'!
बिहार को 'बिहारी नजरिया': क्षेत्रीय पार्टी के रूप में जनसुराज का दंभ।
आर्थिक विकास
जाति से ऊपर 'आर्थिक तरक्की': क्यों इस बार 'कल्याणकारी योजनाओं' पर पड़े वोट?
प्रवासी मजदूरों पर PK की घोषणा का असर: सुरक्षा और विधि-व्यवस्था की चाहत।
सुशासन vs जंगलराज: मतदाता अभी भी गुत्थियों में उलझे?
महिला शक्ति :
'अबला नहीं, शक्ति': महिला वोटरों का रिकॉर्ड तोड़ शक्ति प्रदर्शन!
जीविका और आरक्षण का सीधा प्रभाव: किसके पक्ष में गया महिला वोटरों का स्पष्ट रुझान?
निष्कर्ष
अग्निपरीक्षा का परिणाम: सहयोगी दलों (LJP(R), HAM, RLMO) का प्रदर्शन कितना रहा निर्णायक?
काउंटडाउन शुरू: 14 नवंबर को खुलेगा पिटारा, कौन दिखा सका कितना असर?
-तरुण कुमार कंचन



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ReplyDeleteJay ho women power
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