"मुजफ्फरपुर की शाही लीची के बागान इस बार सूने क्यों हैं? जानिए मौसम की मार, आसमान छूती कीमतों और किसानों के दर्द की एक मर्मस्पर्शी रिपोर्ट।"
मायके में ही पराई हुई लीची
मुजफ्फरपुर (बिहार) । मुजफ्फरपुर और लीची का रिश्ता महज एक फल और शहर का रिश्ता नहीं है। यह प्रेम, मिठास और एक गहरे अहसास का नाम है। यूं कहें तो मुजफ्फरपुर लीची का मायका है और यहां की 'शाही लीची' अपने बेमिसाल स्वाद और रुतबे के कारण इस साम्राज्य की निर्विवाद राजा है। लेकिन इस बार हवाओं का मिजाज बदला हुआ है। नियति की क्रूर विडंबना देखिए कि जिस शहर की मिट्टी पूरी दुनिया का मुंह मीठा कराती है, आज उसी शहर के लोग अपनी ही थाती को चखने के लिए लालायित हैं। मायके से इस बार 'शाही' बेटी की विदाई का अहसास हो रहा है।
बाज़ारों का सन्नाटा और कड़वे दाम
आमतौर पर जेठ के इस महीने में कंपनीबाग, रेलवे स्टेशन के सामने, अघोरिया बाजार, बैरिया और शहर के निकास द्वार रामदयालु नगर की सड़कें लीची की लालिमा से गुलजार रहा करती थीं। इस बार भी वहां चंद दुकानें सजी हैं, लेकिन कीमतों में वह 'कड़वाहट' है कि आम आदमी का जायका बिगड़ जाए।
जब मैंने खुद एक आम शहरी की तरह कंपनीबाग और बैरिया के दुकानदारों से मोल-भाव किया, तो उन्होंने 320 रुपए में 100 लीची का भाव सुनाया। दिल धक से रह गया। पिछले साल तक जो उम्दा लीची ₹150 से ₹200 के बीच झोली में आ जाया करती थी, उसकी कीमत दोगुनी कैसे हो सकती है? मन को भरोसा नहीं हुआ, सो दिल थामकर बिना लीची लिए ही आगे बढ़ गया।
अंकल पोजर की यादें...
कदमों को समेटते हुए मैं लक्ष्मी चौक स्थित बृज बिहारी गली की तरफ निकल गया। वहां एशियन स्कूल के पास दो ठेले दिखे। मानों तपती धूप में थोड़ी छांव मिली। वहां भाव कुछ नरम था 250 रुपए की 100 लीची। राहत की एक सांस ली। अब मैंने वहां से कितनी लीची खरीदी, यह राज ही रहने दीजिए। वरना मेरी माली हालत का सरेबाजार खुलासा हो जाएगा और आप भी जेरोम के उस मशहूर किरदार की तरह हंसते हुए कहेंगे- अंकल पोजर ने केले खरीदे थे और इन्होंने लीची!
सूने बागान: जैसे विदा हो गई घर की लाडली
जब मैंने ठेले वाले से इस बेताहाशा महंगाई का सबब पूछा, तो उसका जवाब किसी लोक-गीत के विरह जैसा था। उसने कहा— बाबूजी, इस बार पेड़ों में लीची आई ही नहीं। बागान के बागान खाली पड़े हैं।
सचमुच, इस बार मुजफ्फरपुर के बागानों को देखकर ऐसा लगता है जैसे शादी के बाद घर की लाडली बेटी ससुराल चली गई हो और पीछे पूरे घर-मुहल्ले में एक अंतहीन नीरवता, एक सूनापन पसर गया हो। जो कुछ लीची पेड़ों पर बची भी हैं, वे मौसम की बेरुखी से सुकड़ गई हैं; उनका आकार छोटा है और वो पारंपरिक मिठास भी गायब है।
मौसम की मार: आंकड़ों की जुबानी
यह सिर्फ एक भावुक अहसास नहीं है, बल्कि इसके पीछे कुदरत के बदलते मिजाज के कठोर आंकड़े हैं। मुजफ्फरपुर की शाही लीची का भूगोल मीनापुर, मुसहरी, बोचहा और कांटी जैसे समृद्ध अंचलों में फैला है, जहां लगभग 12,000 हेक्टेयर भूमि पर इसकी खेती होती है। पूरे बिहार के कुल लीची उत्पादन का 40 प्रतिशत अकेले मुजफ्फरपुर संभालता है। लेकिन इस साल की हकीकत डराने वाली है:
अकेले मुजफ्फरपुर जिला से देश दुनिया में हर वर्ष 1 लाख 25 हजार टन शाही लीची भेजी जाती थी, इस वर्ष मौसम अनुकूल नहीं होने के कारण लीची का उत्पादन बहुत कम मात्रा में हुआ है, जिससे इस बार उम्मीद जताई जा रही है कि 30 हजार टन के आसपास लीची का उत्पादन हुआ है।
इस भारी गिरावट के कारण जहां एक तरफ देश-दुनिया को स्वाद परोसने वाले किसानों की कमर टूट गई है और उन्हें भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ आम मुजफ्फरपुरवासी महंगाई की आंच में तपते हुए अपनी ही 'शाही' पहचान से दूर होता जा रहा है।
इस बार मुजफ्फरपुर की लीची आई तो है, पर खुशियां लेकर नहीं, बल्कि पर्यावरण के बदलते मिजाज की एक चेतावनी और सूने बागानों की एक मूक सिसकी बनकर।
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