श्मशान के रास्ते पर अमानवीय ताला: समाज में बढ़ती वो वहशीपन, जहां मुर्दे को भी दो गज जमीन नसीब नहीं | जब दलित समाज ने सड़क पर चिता सजाकर मानवता को जगाया - हाजीपुर की हृदय विदारक रिपोर्ट।
हाजीपुर में अतिक्रमण के चलते श्मशान का रास्ता रोके जाने पर दलित समाज ने सड़क पर किया वृद्ध महिला का दाह संस्कार। पढ़ें यह मार्मिक रिपोर्ट, जो सामाजिक अन्याय और अतिक्रमण की समस्या को उजागर करती है।
In Hajipur, the Dalit community performed the last rites of an elderly woman on the street after encroachment blocked the way to the cremation ground. Read this poignant report, which highlights the problem of social injustice and encroachment.
सोंधो अंधारी गाछी चौक, गोरोल (हाजीपुर, बिहार) की यह घटना सिर्फ एक दाह संस्कार की कहानी नहीं है; यह हमारे समाज की आत्मा पर लगे एक गहरे घाव का प्रमाण है। यह सवाल उठाती है कि कैसी वैनस्यता हमारे दिलों में घर कर गई है कि एक मृत शरीर को अंतिम संस्कार के लिए अपने ही गाँव के श्मशान घाट तक ले जाने का रास्ता भी छीन लिया जाता है। दलित समाज की वृद्ध महिला झपसी देवी की मौत के बाद जो दृश्य दुनिया के सामने आया, वह न केवल अत्यंत मार्मिक खबर है, बल्कि सामाजिक न्याय की विफलताओं पर एक करारा प्रहार भी है।
इस घटना की पृष्ठभूमि में है अतिक्रमण की बेमानी और मन में बसी संकीर्णता। एक ओर वह ज़मीन का टुकड़ा है, जिस पर सालों से गांव के श्मशान तक जाने का रास्ता था, और दूसरी ओर कुछ लोगों की निजी ज़मीन हथियाने की लालसा। जब मानवता और ज़मीन के स्वामित्व के बीच चुनाव आया, तो ज़मीन ने क्रूरता की चादर ओढ़ ली।
मार्मिक घटनाक्रम: गुरुवार की दोपहर, जब श्मशान की राह अवरुद्ध हुई
गुरुवार की दोपहर सोंधो गांव के दहौर मांझी की वृद्ध पत्नी झपसी देवी (Jhapasi Devi) का निधन हो गया। हर गुजरते क्षण के साथ, परिवार का दुख गहराता जा रहा था। मांझी टोला के लोगों ने, हृदय में भारीपन लिए, गांव के सदियों पुराने श्मशान घाट की ओर शव यात्रा शुरू की। यह सिर्फ एक अंतिम यात्रा नहीं थी, बल्कि रीति-रिवाजों और पूर्वजों की परंपरा का पालन था।
जब दुख आक्रोश में बदल गया
लेकिन, श्मशान तक पहुंचने से ठीक पहले, वह मंज़र सामने आया जिसने उनके दुख को आक्रोश में बदल दिया। मुख्य सड़क से श्मशान तक जाने का रास्ता पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया गया था। रास्ते में पड़ने वाली ज़मीन के मालिकों ने अपनी 'निजी संपत्ति' की आड़ में एक ऐसी दीवार खड़ी कर दी थी, जिसे लाश भी पार नहीं कर सकती थी।
'जब भी लोग शव ले जाने का प्रयास करते हैं, तो श्मशान जाने के रास्ते में पड़ने वाले ज़मीन के मालिक इस पर रोक लगा देते हैं।' यह सिर्फ एक वाक्य नहीं है, यह वर्षों से चली आ रही पीड़ा का निचोड़ है।
चौराहे पर चिता: आक्रोश, लाचारी और सामाजिक कलंक का प्रतीक
रास्ता रोके जाने से शव यात्रा में शामिल लोग स्तब्ध रह गए। उनके सामने दो विकल्प थे: या तो अपमान सहकर वापस लौट जाएं, या इस सामाजिक अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाएं। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। यह निर्णय क्षणिक आवेश का नहीं था, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी सहे जा रहे तिरस्कार और लाचारी का विस्फोटक परिणाम था।
दलित समाज के लोगों ने फैसला किया कि अब वे दबेंगे नहीं। आक्रोशित लोगों ने शव को वापस मोड़ लिया और उसे सीधे सोंधो अंधारी गाछी चौक पर शिवमंदिर के सामने बीच सड़क पर रख दिया।
असीम अपमान, लाचारी और क्रोध
क्या आपने कभी सोचा है कि एक बेटे या बेटी के लिए अपने माता-पिता के शव का दाह संस्कार सड़क पर करने का मतलब क्या होता है? यह असीम अपमान, लाचारी और क्रोध का मिश्रण था। बीच सड़क पर, जहाँ लोगों की चहल-पहल होती है, वहीं चिता सजाकर दाह संस्कार किया गया। धुएं का वह गुबार सिर्फ लकड़ी के जलने का नहीं था, वह जलते हुए सामाजिक ताने-बाने और नष्ट होती मानवता का धुआँ था।
यह दृश्य न केवल हाजीपुर के इतिहास में, बल्कि सामाजिक बहिष्कार और अतिक्रमण के खिलाफ संघर्ष की कहानियों में भी दर्ज हो गया।
पीढ़ीगत पीड़ा और न्याय की अधूरी लड़ाई
आक्रोशित समुदाय के सदस्यों ने अपनी व्यथा व्यक्त की। भिखन मांझी, गजेंद्र मांझी, जगदीश मांझी, राम मांझी, किशन मांझी, देवकी मांझी और अन्य लोगों ने एक स्वर में कहा कि जब भी हम लोगों के साथ इस तरह की घटना घटती है, श्मशान जाने का रास्ता रोक दिया जाता है।
उन्होंने बताया कि यह पहली बार नहीं हुआ है। इससे पहले भी शंभू मांझी की मां चनरी देवी के शव को लेकर लोग इसी रास्ते से जा रहे थे, तब भी उन्हें जाने नहीं दिया गया था। इस तरह का मामला कई बार हो चुका है।
शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं
यह बयान दिखाता है कि यह एक आकस्मिक घटना नहीं, बल्कि एक पैटर्न है—दलित समाज के प्रति सामाजिक दुर्व्यवहार का एक व्यवस्थित सिलसिला। एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ जीवित रहते हुए तो सम्मान से वंचित रखा ही गया, लेकिन मरने के बाद भी शांति से अंतिम संस्कार का अधिकार नहीं दिया गया। श्मशान घाट का रास्ता रोकना सिर्फ एक भौतिक बाधा नहीं है, यह सामाजिक समरसता के मार्ग पर लगाया गया अवरोध है।
कानून और व्यवस्था की चुप्पी: अतिक्रमण का काला साया
यह अत्यंत दुखद है कि यह समस्या इतनी पुरानी होने के बावजूद स्थानीय प्रशासन द्वारा इसका स्थायी समाधान नहीं निकाला गया। अतिक्रमण की यह बेमानी इतनी गहरी है कि वह कानून की चौखट को भी पार कर जाती है।
शासन की निष्क्रियता और उदासीनता
सवाल यह है कि एक श्मशान घाट का रास्ता कोई व्यक्ति या समूह कैसे अवरुद्ध कर सकता है? क्या स्थानीय अधिकारियों को इस अतिक्रमण की जानकारी नहीं थी? यह घटना स्थानीय शासन की निष्क्रियता और उदासीनता को उजागर करती है।
हालांकि, घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया। बीडीओ पंकज कुमार निगम और सीओ दिव्या चंचल ने संयुक्त रूप से मौके का मुआयना किया। उन्होंने यह आश्वासन दिया कि सड़क की साफ़-सफ़ाई करा दी गई है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि श्मशान जाने में हो रही परेशानी सहित सभी पहलुओं की जांच कराई जाएगी और आगे शव के दाह संस्कार में परेशानी नहीं हो, इसकी व्यवस्था भी की जायेगी।
समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की
यह एक राहत भरी बात है कि प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई का आश्वासन दिया है, लेकिन यह कार्रवाई कितनी स्थायी होगी, यह देखना बाकी है। समस्या केवल रास्ता साफ़ करने की नहीं है; समस्या ज़मीन के स्वामित्व के विवाद और अतिक्रमण की है, जिसका निपटारा कानूनी रूप से आवश्यक है। इस मार्मिक घटना ने जो घाव दिए हैं, वे केवल जांच-पड़ताल और सड़क की साफ़-सफ़ाई से नहीं भरेंगे।
मानवता की कसौटी पर हमारा समाज
हाजीपुर की यह घटना, दलित समाज के संघर्ष और मानवता की विफलता का एक काला अध्याय है। एक ऐसे देश में, जहाँ सदियों से 'मुक्ति' और 'मोक्ष' को जीवन का अंतिम लक्ष्य माना जाता है, वहाँ एक गरीब और वंचित समाज के सदस्य को सड़क पर जलने के लिए मजबूर होना पड़ा।
यह रिपोर्ट समाज, सरकार और हर नागरिक के लिए एक आईना है। सामाजिक न्याय केवल किताबों और संविधान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि श्मशान के रास्ते तक भी पहुंचना चाहिए। सरकार को न केवल तुरंत और कठोर कार्रवाई करनी चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस देश के हर नागरिक, चाहे वह किसी भी जाति या वर्ग का हो, को सम्मान के साथ जीने और मरने का अधिकार मिले।
जब तक हर श्मशान घाट का रास्ता सुरक्षित और खुला नहीं होगा, तब तक हम एक सभ्य समाज होने का दावा नहीं कर सकते। झपसी देवी की सड़क पर सजी चिता हमें हमेशा याद दिलाएगी कि अतिक्रमण केवल ज़मीन का नहीं होता, वह मानवता का भी होता है।
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मानवता को शर्मसार करनेवाली बेहद पीड़ादायक खबर
ReplyDeleteबहुत ही निंदनीय खबर
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